Thursday, 16 April 2015

मेरी प्यारी माँ …की ……

में और मेरी प्यारी माँ …की ……
दोस्तों मेरा नाम राहुल हे. मेने अभी १२ पास किया हे. मेरी माँ का नाम रेखा हे जिसकी उम्र ४२ साल हे . हमारा ज्वेलरी का धंधा हे.मेरे परिवारमे में ,भाई जो मुझसे छोटा हे ,पापा ,दादी ,दादा, और मेरी प्यारी माँ.हम बरोदा में रहते हे.धंधा अच्छा चलता हे .ज्वेलरी के घहनो पे पेसो का सूत से लेन देन का धंधा हे.जो काफी बढ़िया चलता हे.बरोदा के आलावा दूर ४५की.मी. एक गाव में भी दुकान लगाईं हे.बरोदा की दुकान दादाजी और माँ सँभालते हे .गाँव की दुकान पे पापा जाते हे ..कभी कभी माँ या मेभी गाव की दुकान पे जाते हे.
गाव की दुकान एक तालाब के किनारे पर हे. पीछे की खिडक खोलने पर तालाब दिखता हे .दुकान में काउंटर बनाया हुआ हे एक तरफ की दो कुर्सी पे माँ और पापा या में बैठते हे .सामने ग्राहक के लिए बेंच लगाईं हे.बेंच के ऊपर एक आयना लगा हुआ हे . आयने में खिड़की के बाहर का नजारा दिखता हे .पप्पा को बड़े ऑर्डर के लिए बरोदा रुकना होता हे तो में और माँ गाव की दुकान पे चले जाते हे .माँ हमेशा मुझे पापा वाली खुर्सी पे बैठाती हे वो दूसरी कुर्सी पे बैठती हे .में एक रोज पापा के साथ दुकान पे गया तो माँ वाली कुर्सी पे बेठा तब पता चला आइनेमे वहां से पीछे का नाजारा क्या दिखता हे .? वहां से तालाब के किनारे मुतने आने वाले लोगो का नजारा दिखता था.मेरा दिमाग घूम गया जाने कितने लोगो का….लं. मा. देखती रहती होगी…. में समज गया माँ क्यों इस्सी कुर्सी पे क्यों बैठती हे? दुबारा माके साथ जब गाव जाना हुआ तो में साथ में एक छोटा सा स्टैंड आयना ले गया, आज भी माँ ने मुझे उसी कुर्सी पे बेठने को कहा में वहां बेठा साथमे वो छोटा आयना भी काउंटर पे रख दिया जो माँ की नजरो में नहीं आये लेकिन मुझे सामने वाले आयने का नजारा साफ दिखे.जब भी कोई मुतने आता तो माँ गोर से उसका लं.. देखती. एक आदमी आया जो मुतने बजाय अपना लं.. निकल कर हाथ में ले कर खड़ा रहा और खिड़की और देख कर सहलाने लगा.माँ का चहेरा लाल हो गया ..अपने कपडे ठीक करते हुए माने चूत पे दो तिन बार हाथ लगा दिया ..मानो जोर से रगड दिया … वो आदमी अपना खड़ा लं.. दिखा कर चला गया ..मेने ध्यान से देखा की वो हमारी दुकान पे अक्सर आता जाता रहता हे.पापा के साथ भी बैठता थ और पापा गप्पे बजी करते रहते थे. कई लोग मुतने आये और अनजाने में माँ को लैंड दिखा कर चले गये.
श्याम हो ने आई थी दुकान बंद करने को माँ ने कहा .में कुर्सी से उठा ही था की माने कहा रुको थोडा बैठते हे मेरी नजर आयने पर गई तो पीछे एक गध्धे का जोडा सेक्स कर रहा था .गधधा अपना लम्बा लैंड निकले गध्धि पे चढ़ रहा था. जेसे ही लैंड चूत को छू ता गध्धि आगे हो जाती,एसा दो- तिन बार हुआ लेकिन गध्धे ने सेट कर के एसा धक्का मारा आधा लैंड गध्धि की चुतमें चला गया…गध्धि हों-हों.ची..हों-हों..ची..करने लगी और आगे दोड़ने लगी.गध्धा भी अपना लैंड घुसाए दो पेरों पे दोड़ने लगा. हों-हों.ची..हों-हों..ची..करने लगा.माँ के चहेरे पे स्माइल आ गई. में उठा और खिड़की से बाहर देखने लगा माँ ने पूछा क्या हुआ? मेने कहा -माँ दो गध्धे आपसमे गध्धा पचीसी खेल रहे हे .माँ अनजान बन के खिड़की के पास आई और हसने लगी .. पूछा- क्या कहा तुमने? मेने कहा – दो गध्धे आपसमे गध्धा पचीसी खेल रहे हे..माँ जोर से हंस पड़ी..इतने में गध्धा-गध्धि शांत हो गये गधि ने – गध्धे का लम्बा लैंड पूरा अपनी चूत में ले लिया था.गध्धा हांफ रहा था ..शायद उसका माल निकलने वाला था .वो जोर से उछला पूरा लैंड घुसा दिया इसबार गध्धि ने कोई शोर नहीं किया शांति से खड़ी रही …और गध्धे ने अपना लैंड बाहर निकल लिया .अभी भी उसके लैंड से माल टपक रहा था.में और माँ सारा नजारा देखा रहे थे.माँ ने अपना हाथ दो पेरो के बीच दबाया हुआ था.जेसे ही मेंने देखा माँ ने हाथ हटा लिया. मेने कहा माँ गध्धा पचीसी पूरी हो गई. चलो अब चले?? माँ ने कहा चलो.
में और मेरी प्यारी माँ …की…….
मेने कहा माँ गध्धा पचीसी पूरी हो गई. चलो अब चले?? माँ ने कहा चलो.
मेने दुकान बंद की और बाइक लेके निकल गये.आज मुझे माँ की चूचीया अपनी पीठ पे महसूस हो रही थी.कभी कभी ब्रेक लगानी पड़ती तो माँ के बोल चूची काफी दब जाती मुझे गुदगुदी हो जाती.कभी-कभी तो एसा लगता की माँ जान बुजकर एसा कर ही हे. सडक पे जारहे थे माँ ने कहा बेटे कही रुकना मुझे ….जाना हे. मेने एक जगह बाइक रोक दी.माँ सडक के किनारे एक जाडी के पीछे गई और मुतने लगी.सर्रर्रर की आवाज आई में अपने आपको रोक नहीं पाया और देखने की कोशिश की माँ की चूत नहीं दिखाई दी पर जांगेऔर चूत से निकलती पानीकी धार जरुर देखने को मिली.क्या जांगे थी?? कदम लिस्सी ..गोरी मुलायम.माँ उठने वाली थी ,में वहांसे हट गया.और मुतने लगा माँ मेरी और देख रहीथी, पर मेने भी एसा ही किया सिर्फ पानी की धार दिखाई,अपना लंड नहीं दिखने दिया.फिर हम वहां से चल दिए.घर आ गये कोई बात नहीं हुई. एक दो दिन बित गये .मुझे माकी जांगे और मूत की धार ने बेचेन कर दिया था.में माँ की चूत के बारे में सोचता रहता.
एकदिन घरमे किचन से कुछ गिरने की आवाज आई.मे दोड़ता चला गया. देखा माँ गिर पड़ी थी और पापा उठा रहे थे.शायद माँ के पाँव में चोट आई थी तो मेने भी हेल्प की.खाना तैयार हो गया था तो दादाजी और पापा खाना खाके चले गये.दादी गर पे नहि थी, वो चाचा के घर अहमदाबाद गई थी.घर पे में और माँ दोनों अकेले ही थे. इतने में पापा का फोन आया की :- में गाव जा रहा हु .एक ग्राहक को शादी के घहने देने हे.दादाजी दुकान पर थे.माँ अपने रूममें लेटी हुई थी.में माँ के पास गया बोला मम्मी तबियत तो ठीक हे ना? माँ ने कहा- हाँ पर पेर में थोडा दर्द हो रहा हे. मेने कहा- क्या में मालिस कर दू ? माँ-हाँ,कर दे तो अच्छा लगेगा.माँ ने पेटीकोट पहन रखा था. में पैर की मालिस करने लगा. पेटीकोट घुटनों तक उठाया हुआ था.माँ के गोरे पैर देखकर मुझे मजा आया में मालिस करने लगा.माँ आखे बंद करके लेटी हुई थी.में मालिस करते -करते जंगो तक पंहुचा गया पेटीकोट और ऊपर उठाया .. वाह क्या मस्त जांगे थी गोरी मुलायम मख्खन जेसी.मेरा लंड खड़ा हो गया.माँ शायद सो गई थी.मेने पेटीकोट और ऊपर उठा दिया.माँ ने लाल रंग की पेंटी पहनी हुई थी.चूत का उभार साफ दिखाई देता था.मेने एक दो बार उपर से ही चूत को छुआ मजा आ गया मेने सोचा माँ की चूत देख ही लेता हु पर चड्डी उतारने की हिम्मत नहीं हु शायद माँ की नींद टूट जाये और में पकड़ा जाऊ.? माँ के पैर खुले हुए थे तो में बीच मे बेठ गया और पेंटी को चूत से साईंड में कर के चूत देखने लगा.चूत की चमड़ी बहुत ही मुलायम थी.थोड़ी काली थी पर चूत के अन्दर का हिस्स एकदम लाल गुलाबी था.अब मुझसे रहां नही जाता था, पर एक बात मेने नोट की माँ की चूत से पानी जेसा चिपचिपा तरल निकल रहा था. मेने उंगुली पे महसूस किया फिर उसे सुंघा क्या मस्त खुशबु थी.मेने अपना लंड निकला और सुपाड़ा माँ की चूत पे रगड़ ने लगा .माँ की चूत से और पानी छुट रहा था.मेने अपना लंड तिन चार बार घिसा फिर खड़ा हो गया.माका पेटीकोट ठीक किया और बाथरूम में चला गया और माँ की चुदाई के बारे में सोच कर मुठ मारली, और अपना पानी निकल दिया.मुझे बहुत अच्छा लगा.में माँ को चोदने की सोचने लगा.थोड़ी देर बाद माँ भी उठ गई और बाथरूम की और चली गई
 

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