Friday, 15 May 2015

मेरी पहली मांग भराई

सभी पाठकों को मेरा प्रणाम !



मेरी उम्र बीस साल की है, मैं बी.ए प्रथम वर्ष की छात्रा हूँ। वैसे तो मेरे इस वक़्त कई बॉयफ्रेंड हैं और मैं सबको एक साथ सम्भालना भी जानती हूँ। हर किसी को उसकी जगह पर रखना मुझे खूब आता है। क्या करूँ बचपन भी एक चालू से माहौल में बीता, फिर स्कूल में ही चालू लड़कियों से मेरी दोस्ती हो गई। वो लड़कियाँ कहती होंगी कि उनकी मेरे जैसी चालू लड़की से दोस्ती हो गई। ऐसे ही चलती है जिंदगी ! खूब मजे करने चाहिएँ, यह हुस्न, यह मदमस्त जवानी, ये नशीली आंखें ! अब ही मौका है कि इनके नशे में किसी भी मर्द को हलाल कर दो, यह वक़्त होता है छाती से चुन्नी सरका कर किसी मर्द के सोये नाग को उठाने का, यही उम्र है जब अपनी चूचियों से किसी का शिकार कर डालो, पतली कमर लचका कर मर्दों की अपने पर फ़िदा करवाने का और फिर बंद कमरे में हुस्न का खेल, जवानी का खेल, जिस्मों का मेल-जोल सब कुछ जवानी में ही होता है।


यह सब मेरा अपना ख़याल है और मैं इस पर चलती भी हूँ।


जैसे जैसे जवानी ने दस्तक देनी शुरु की, तैसे तैसे मेरा ध्यान लड़कों में लगने लगा, मेरी दिलचस्पी अपनी तरफ देख उनकी हिम्मत बढ़ने लगी। पहले तो आते जाते कोई कुछ बोल देता, कोई कुछ, कोई कहता- देख कितनी छोटी है अभी साली फिर भी नैन-मटक्का करने से बाज नहीं आती ! देख साली कैसे बल खा-खा कर चलने लगी है ! कोई कहता देख तो यार, आग निकलेगी आग !


ऐसे करते करते सोलहवां, सतरहवां, अठरहवां पूरा किया, मुझे पर जवानी कहर की चढ़ी है भी, उम्र से पहले मेरी छाती कहर बनने के लिए तैयार हो चुकी थी, लड़कों की बातें सुन-सुन कर अब कुछ कुछ होने लगता, मैं मुस्कुरा देती, उनके हौंसले बढ़ने लगे और फिर :


एक दोपहर कड़ी गर्मी थी, उस दिन स्कूल से जल्दी छुट्टी हो गई, उस दिनों हम गाँव में रहते थे, मेरी जवानी उफान पर थी। बहुत गर्मी थी, कुरता पसीने से भीग मेरी जवानी से चिपका हुआ था। स्कूल जाने के दो रास्ते थे।


एक था आम पक्की सड़क से दो मिलोमीटर की दूरी थी, पर मैं अपनी सहेलियों के साथ पैदल चली जाती थी क्यूंकि उनको अपने मनचले आशिकों से यारी को परवान चढ़वाने का मौका भी मिल जाता था।


दूसरा रास्ता कच्चा ज़रूर था, बारिश के मौसम में बिलकुल बेकार था, खेतों से होकर निकलता था जिससे स्कूल एक किलोमोटर ही पड़ता था। जिस दिन किसी सहेली को ज्यादा परवान चढ़ना होता, उस दिन वो उस रास्ते चली जाती।


मेरे पीछे आने वाले लड़कों की गिनती कम नहीं थी, हाँ कम नहीं थी।


मैं भी उनकी बाँहों में झूलना चाहती थी लेकिन काफी देर से खुद को बांध रखा था, मेरे सबसे ज्यादा पीछे आने वालों में से जो युवक था उसका नाम था लल्लन ! वो गाँव के मुखिया का बेटा था।


मैंने शुरु से ही किसी लड़के की किसी भी बात को काटा ना था, इसलिए उनकी हिम्मत बढ़ चुकी थी।


उस दिन में कड़ी दोपहर स्कूल से जल्दी निकली, अकेली थी, बाकी सब मौके का फायदा उठा अपने यारों से मिलने गई।


मैंने छोटे वाले रास्ते से घर आने की सोची, बहुत गर्मी थी तेज़ तेज़ चल रही थी पसीने से कुर्ती भीग गई, आधे रास्ते आई कि किसी ने मेरी कलाई पकड़ मुझे खेत में खींच लिया।


इससे पहले में कुछ देखती, सम्भलती, मैं लल्लन की बाँहों में थी, उसने मेरे होंठों पर अपना हाथ रख मुझे चुप करवा दिया, बोला- बहुत प्यार करता हूँ तुझे !, तू है कि कुछ न कहकर भी सब कुछ कह देती है, मुस्कुरा देती है लेकिन उसके बाद सब ठन्डे बस्ते में डाल देती है। आज अपने को नहीं रोक पाया।


उसने मेरी गाल की चुम्मी ले डाली। मुझे अजीब सा लगा, उसका हाथ मेरी भीग चुकी कुर्ती पर रेंगने लगा, मुझे लगा जैसे मेरी छाती में कसाव सा आने लगा, उसने होंठों से हाथ हटाया और अपने होंठ रख दिए।


मैं चुप थी, कुछ नहीं बोल पाई। उसके जोश में बढ़ावा आया, खुल कर होंठ चूसने लगा और साथ मेरी कुर्ती में हाथ घुसा दिया। उसने मेरा हाथ पकड़ा और खेत के और अन्दर ले जाने लगा।


प्लीज़ लल्लन छोड़ दो ! मुझे घर जाने दो !


प्लीज़ आरती, आज मुझे मत रोको ! क्या तुम मुझ से प्यार नहीं करती? क्या तू जिंदगी भर मेरी होकर नहीं रहना चाहती?


करती हूँ लल्लन ! लेकिन ऐसे हमें किसी ने देख लिया तो?


इतनी दोपहर कौन साला घर से निकलेगा? यह तो हम जैसे आशिक ही ऐसे मौकों का फायदा उठातें हैं मेरी जान !


वो मुझे खेत के काफी अंदर ले गया, वहाँ फ़सल काटने के बाद उसकी बची हुई घास की ढ़ेरी लगी हुई थी, मुझे बाँहों में लेकर उसने मुझे वहीं लिटा दिया और मेरे ऊपर लेट मेरे होंठ चूसने लगा।


उसने मेरी कुर्ती मेरे बदन से अलग कर दी, आराम से एक तरफ़ रख दी ताकि गंदी ना हो !


यह क्यों उतारी?


चुप मेरी जान !


उसने मेरी ब्रा खोल दी और मेरे मम्मे दबाने लगा।


हाय ! यह मुझे क्या हो रहा है? मैं खुद को आराम से उसको सौंप रही थी !


उसने अपनी टीशर्ट उतार दी। जब मेरी नंगी छाती उसकी मरदाना छाती से घिसी तो मेरे अंदर आग भड़क उठी, मैं वासना से तपने लगी।


उसने मेरा एक चुचूक मुँह में लिया तो मैं उछल पड़ी- हाय ! मत करो ना ! मुझे अब जाने दो ! यह सब बाद में भी हो सकता है।


उसने मुझे बाँहों से आज़ाद किया, बोला- ठीक है !

जैसे कि मैंने बताया था कि किस तरह गाँव के मनचले मेरे और मेरी बिगड़ी हुई सहेलियों के आगे-पीछे मंडराते थे और हम भी उनका हौंसला बढ़ाने में कसर नहीं छोड़ती थी। यही कारण था कि सबका हौंसला हमारे प्रति बढ़ चुका था।


खैर !


उस दिन तो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि लल्लन मुझे इस तरह दबोच लेगा, मैं तो अपनी मस्ती में खोई घर लौट रही थी अकेली ! ऊपर से गर्मी थी, लेकिन लल्लन ने तो मानो उस दिन घर से निकलते वक़्त धार लिया था कि आज आरती की जवानी के रस में खुद को भिगोना ही भिगोना है।


उसने मुझे बाँहों में लेकर खूब चूमा, मेरी कुर्ती उतार दी फिर उसने ब्रा खोल मेरे अनछुए चुचूकों को चूसा और फिर जमकर मेरे होंठों का रसपान किया। इस सब के बीच मैंने कई बार उसको अपने से अलग करने की नाकाम कोशिश भी की लेकिन अलग नहीं हो पाई और वो मेरे बदन के साथ मन आई करता रहा। पहली बार किसी लड़के का, किसी मर्द का स्पर्श पाकर मैं भी उत्तेजित हो गई थी और सब मर्यादा भूल उसको अपना जिस्म सौंपने तक चली गई थी। लेकिन आखिर मैंने उससे अलग होने को कहा तो ना जाने वो कैसे मान गया, मुझे खुद समझ नहीं आई कि इतना ज़बरदस्त मौका उसने कैसे छोड़ दिया।


ना जाने कब उसने मेरा नाड़ा ढीला करके उसका एक सिरा पकड़ लिया था, बोला- ठीक है जाओ ! मेरी जान जाओ ! लेकिन कब तक और कहाँ तक भागोगी? आखिर तो लल्लन की होना पड़ेगा !


हाँ ! हाँ ! पक्का ! मैं जैसे ही उठी, मेरी सलवार खुल कर नीचे गिर गई और मेरे नाड़े का एक छोर लल्लन ने पकड़ रखा था।


हाय ! यह क्या हो गया राम जी?


बोला- राम जी यहाँ नहीं हैं जान ! यहाँ तेरे लल्लन जी हैं !


मैंने दोनों हाथ अपनी नंगी जांघों पर रख दिए तो ऊपर से नंगी हो गई।


करती तो क्या !


सच में मैं तो पूरी तरह से उसके बुने जाल में फंस चुकी थी। जैसे ही ऊपर से नंगी हुई, बोला- क्या माल है तू आरती !


उसको छुपाया तो बोला- कितनी मुलायम और गोरी जांघें हैं तेरी !


उसने उन पर हाथ रख कर सहला दिया- हाय, प्लीज़ छोड़ो मुझे !


उसने सलवार पकड़ पीछे रख दी और मुझे अपने ऊपर खींच लिया। उसने अपनी पैंट उतार दी, सिर्फ अंडरवीयर में था और उसका तंबू बन चुका था।


हाय राम जी ! आपने क्यूँ उतार दी?


तेरे लिए आरती रानी ! तेरे लिए ! तूने मुझे अपना हुस्न दिखाया, अपनी जवानी दिखाई ! तो मेरा फ़र्ज़ बनता है अपनी मर्दानगी दिखाने का ! दोनों ही सिर्फ एक-एक वस्त्र में थे।


उसने मुझे पकड़ अपने नीचे डाल लिया और वो मुझ पर हावी होने लगा।


मैं भी पिघलने लगी।


आखिर एक जवान लड़की एक जवान मर्द के साथ एकदम नंगी, वो भी ऐसी जगह पर !


उसने जम कर मेरे मम्मे चूसे, मेरे चुचूक काटे, कभी कभी मेरा पूरा अनार अपने मुँह में लेकर निचोड़ देता, उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और अपने कच्छे में घुसा दिया।


जैसे ही मैंने उसको छुआ, मेरे तन-बदन में जवानी की आग भड़क उठी, उसने मेरी पैंटी भी उतार फेंकी।


और जैसे ही उसका हाथ मेरी तपती चूत पर आया, हाथ लगते मैं भड़क उठी।


हाय साईं ! यह क्या कर रहे हो?


तेरी जवानी लूटने की ओर पहला कदम बढ़ाया है !


मत करो ना ! मैं मर जाऊँगी ! अगर ना छोड़ा तब भी, और अगर छोड़ भी दिया तब भी !


वो कैसे?


अगर मैंने तुझे चूत मारने दी तो मेरा सुहागरात को कुंवारापन लेकर सेज पर जाने का सपना ख़त्म और अगर ना करने दिया तो अब मर जाऊँगी।


छोड़ो ना जान ! बस चुपचाप रहो !


उसने लौड़ा निकाल लिया और पहले खुद सहलाया फिर मुझे दिखाते हुए बोला- देख मेरा लौड़ा ! असली मर्द का संपूर्ण लौड़ा !


मैंने पकड़ा तो वो फड़फड़ा उठा।


हाय यह तो उछल रहा है?


तेरी जवानी है ही ऐसी मेरी जान !


उसने मेरी गर्दन पर हाथ रख नीचे की तरफ दबाव दिया- चूमो इसको मेरी जान !


नहीं नहीं ! इसको चूसते नहीं हैं !


जान सब चूसती हैं, अपनी सहेली से पूछना ! बता देगी ! चलो !


जैसे मैंने मुँह खोला, उसने मुँह में घुसा दिया और आगे-पीछे करने लगा।


मुझे उसका स्वाद अच्छा लगा तो आराम से चूसने लगी, मुझे उसका लौड़ा चूसने में बेहद मजा आ रहा था।


फिर उसने मुझे लिटा मेरी टाँगें खोल बीच में बैठ कर अपनी जुबान मेरी चूत पर लगा दी और चाटने लगा, जीभ घुसा-घुसा कर छेड़ने लगा तो मैं पागल हो गई और गांड उठाने लगी।


वो जान गया था कि मुझे किस चीज की ज़रूरत है।


उसने तुरंत अपना लौड़ा मेरी गुफा के मुँह पर रख दिया और धीरे से धक्का लगाना चाहा पर लौड़ा फिसल गया।


मैं पागल होने लगी- घुसा दो ना !


हाँ ! हाँ ! अभी घुस जाएगा मेरी जान !


लल्लन, मुझे कभी छोड़ना मत !


कभी नहीं ! कभी नहीं ! अब तो तेरी जवानी आये दिन और निखरेगी।


उसने थूक लगाया दुबारा टिकाया, मैंने हाथ नीचे लेजा कर पकड़ लिया।


इस बार उसने जोर देकर धक्का मारा, मानो मेरे कंठ में हड्डी फंस गई हो !


दर्द के मारे मेरी आवाज़ निकलनी बंद हो गई थी, मैं तड़फ रही थी, हाथ पैर चलाने की पूरी कोशिश की, उसने तो दूसरे धक्के में पूरा अन्दर घुसा दिया।


मैं रोने लगी।


बोला- नहीं जा रहा था तो जोर लगाना पड़ा ! बस अभी देखना, मेरी आरती खुद कहेगी लल्लन चोद और चोद !


बड़ी मुश्किल से बोली- मैं जिंदा बचूंगी तो तब ही कहूँगी ना ! मुझे छोड़ दे !


साली खेत में पहला मिलन हुआ, जब सब कुछ हो गया अब छोड़ कैसे दूँ? अब तो बस चोद दूंगा।


फाड़ दी मेरी चूत तूने !


हां फाड़ दी !


रुकने के बाद आधा निकाल फिर घुसा दिया। उसे राहत मिली। देखते ही आराम से घिसने लगा मेरी चूत की दीवारों से घिस घिस कर घुसने लगा।


तस्वीर बदल चुकी थी, सच में मेरी गांड हिलने लगी, कमर खुद गोल गोल हिलते हुए लौड़े का मजा लेने लगी।


उसकी चुदाई में एकदम से तेज़ी आई और लल्लन मुझे जोर-जोर से चोदने लगा और फिर आखिर उसने मेरी कुंवारी चूत को मरदाना रस से भिगो दिया।


सारा दर्द मिट गया था, हम दोनों हांफने लगे थे।


मजा आया ना आरती?


हाँ बहुत आया !


बहुत दिनों से तुझे अपनी बनाने की ताक में था, आज मौका मिल गया।


उठो भी अब ! चलो लेट हो जाऊँगी !


हाँ हाँ बस !


दोनों खड़े हुए, अपने अपने कपडे पहने, कुर्ती डालते वक़्त उसने दुबारा मुझे दबोच लिया और मेरे मम्मे पीने लगा। बोला- एक बार और चोदने दे ना !


अरे बाबा नहीं ! अब तो मैं तेरी हूँ।


उसने छोड़ दिया, वो पिछले रास्ते निकल गया। मैंने सलवार का नाड़ा कस कर बांधा और किताबें उठा घर आ गई।


मैं अब कुंवारी नहीं थी, लल्लन ने मुझे चुदाई का स्वाद चखा दिया।


अब तो मौका मिलते में खेत चली जाती और वहाँ लल्लन मुझे मन मर्ज़ी से रौंदता।


इन दिनों ही मेरी नज़रें पास के गाँव के सरपंच के लड़के लाखन से दो से चार होने लगीं और आखिर एक दिन उसने पारो के ज़रिये, पारो मेरी पक्की सहेली, हमराज़ थी, मुझे संदेशा भेज दिया। वैसे भी मुझे महसूस हुआ कि लल्लन कुछ बदला सा था, तो मैंने भी बेवफा बनने में वक़्त नहीं लगाया और लल्लन के रहते ही लाखन का न्योता स्वीकार कर लिया।

1 comment:

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