Saturday, 10 October 2015

पापा प्लीज........

पाँच मंजिले मकान के प्रथम तल के एक कमरे में सुबह के 5 बजे की अलार्म बजते ही बेड पर कुनमुनाती हुई अपना हाथ बढ़ा अलार्म बंद की और फिर चादर तान के सो गई...ये है रूपा...घर में सबकी लाडली...घर में सबसे सुंदर जो थी...

तीनों भाई तो अपने पापा पर गए काले सम्राट...पर रूपा अपने मम्मी के रंग पर चली गई...दूध की तरह सफेद रंग, तीखे और बड़ी बड़ी आँखें,लाल सुर्ख होंठ, लम्बी गर्दन, कमर तक रेशमी बाल,ललाट पर बिंदी की जगह चंदन लगाना,नाक में छोटी सी नथुनी, सुडौल और तराशा हुआ बदन....

ऊपर से नीचे तक नजर हजारों बार फिरा लो रूपा पर , पर शायद ही किसी बार आप बिना तारीफ के रह सको...जब कॉलेज के लिए अपने दोस्त के साथ घर से निकलती तो रास्ते भर ना जाने कितने दिल घायल होते और ना जाने कितनी आहें निकलती....

पर इन सब से बेखबर रूपा बस अपने काम से मतलब रखती...इसी वजह से वो आज तक कुंवारी कली की तरह खिल रही थी...रूपा को अपने आशिकों की खबर ना थी ऐसी बात नहीं थी...रूपा अपने सुंदर बदन के साथ साथ तेज और संतुलित दिमाग की भी मालकिन थी...

पर रूपा दिलफेंक आशिकों को अच्छी तरह जानती थी कि ऐसे लड़के अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकते हैं...और दूसरी बात
रूपा के पापा शहर के सबसे अमीर बिजनेस मैन हैं और उनकी शहर में अच्छी धाक है तो किसी की हिम्मत नहीं होती कि उनसे कोई पंगा ले...

रूपा की दोस्त भी सिर्फ और सिर्फ एक ही थी...कनक...जो कि थी तो दूर गाँव की पर उनके पिता इसी शहर में बैंक की नौकरी करते थे तो अब यहीं शिफ्ट हो गए थे...कनक भी दिखने में काफी सुंदर थी और पढ़ने में भी तेज तो इस वजह से दोनों में गहरी दोस्ती हो गई...

दोनों साथ हो तो सगी बहन जैसी लगती थी पर सच्चाई तो कुछ और ही थी...हाँ, इन दोनों में एक फर्क जरूर थी...कनक जहाँ चालू टाइप की बिंदास गर्ल थी तो वहीं रूपा सीधी-साधी शरीफ लड़की...फिर भी इन दो ध्रुवीय में कैसे इतनी गहरी दोस्ती हो गई...समझ से परे....

कनक स्कूल दिनों से आज तक पता नहीं कितने बॉयफ्रेंड बदले, वो खुद गिनते वक्त भूल जाती...हाँ, अपने बॉयफ्रेंड संग बिताए हर पल का बखान वो रूपा को जरूर सुनाती और रूपा भी सुन के मस्त होती...

पर कनक साथ में ये भी कहती कि रूपा, तुम मेरी तरह बन के मस्ती की मत सोचना...जब भी जिंदगी तुम्हें ऐसे मौके दे तो पहले अपने दिल की सुनना और फिर दिल जो कहे, बस वैसी ही करना...

यहीं पर रूपा कनक की कहनी से छिटक के बाहर आती तो उसे अपने मम्मी-पापा भैया-भाभी के दिल में अपने प्रति भावना आ जाती है और कनक की तरह मस्ती करने की सोचती भी नहीं...क्योंकि वो कभी भी ये नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से उसके फैमिली वालों पर कोई उंगली उठाए....

अब हम रूपा के कमरे से निकल दूसरे कमरे में चलते हैं...क्योंकि इसी तल के दूसरे कमरे में रूपा के मम्मी पापा गहरी नींद में सो रहे हैं...इनके रूम में 6 बजे अलार्म बजती है...रूपा के पापा कालीचरण और मम्मी पुष्पा...

कालीचरण अपने नाम की ही तरह बिल्कुल काला, जबकि पुष्पा दूध की धुली एकदम गोरी चिट्टी और बेमिसाल हुस्न की मल्लिका...कोई देख ले तो एक बार चौंक जरूर जाए कि आखिर कैसे...

इनकी कहानी भी अजीब है...बात तब की है जब कालीचरण अपने जीवन के 24वे साल में प्रवेश किया था...और तब वह कालीचरण नहीं, कालिया था...बदमाश कालिया...

बदमाश भी कोई ऊंचे दर्जे का नहीं था..बस अपने इसी शहर का नामी बदमाश था...और वो अपने गिरोह का सरगना था...काम मुसाफिरों के अटैची उड़ाना चाहे वो जैसे दे...मतलब मार खा कर या चाकू से घायल होकर या नशा का शिकार हो कर...

पर आज तक कालिया कभी मर्डर नहीं किया था और ना ही करना चाहता था... वो कहता था कि दो दिन अपना पेट भरने के लिए किसी की जिंदगी भर की पेट नहीं काट सकता...शायद यही अच्छाई उसे आज एक सफल व्यक्ति बना दिया..

एक दिन रात के करीब आठ बजे की बात है...वो अपने चार दोस्तों के साथ आखिरी बस के आने का वेट कर रहा था कि कोई फंसे तो आज की रात रंगीन हो जाएगी...पेट तो भर ही चुका था बस गले को गीली करना बाकी थी....

कुछ ही पलों में दूर से हॉर्न बजाती तेज गति से बस दनदनाती हुई आती नजर आई...नजर पड़ते ही सबने अपने-अपने पोजीशन ले लिए...और सबकी नजर बस से उतरने वाली मुसाफिर पर जम गई...

अगले ही पल बस अपनी जगह पर जा खड़ी हो गई...कालिया और उसका दोस्त साँस थामे नजरे गड़ाए बस की गेट पर देख रहा था...पहला यात्री...हाथ में बस एक फाइल पकड़े परेशान दिखता उतरा...दूसरा...हाथ में एक झोला और उसके अंदर एक टिफिन जिसकी हैंडल झोले से बाहर निकली थी...

उसके बाद दो और उतरे जो विद्यार्थी थे...कालिया विद्यार्थी की तरफ तो देखता भी नहीं था...अंगूठा छाप वालों की क्या हसरत होती है वो अच्छी तरह जानता था क्योंकि वो खुद अंगूठा छाप था...ऐसे में वो किसी को तंग कर पढ़ाई रूकवाने की जुर्रत कतई नहीं करना चाहता था...

तभी बस से एक लड़की बड़े से सूटकेस लिए उतरती नजर आई...सबकी नजर एकटक सूटकेस पर जम गई...नीचे उतरते ही उसने सूटकेस के हैंडल बाहर खींची और सूटकेस खींचती हुई बाहर की तरफ चल पड़ी...

दिखने में तो ये स्टूडेंट लग रही थी और इसी वजह से सब कालिया की तरफ देखने लगे कि क्या करें? कालिया अपना दिमाग लड़की के कदम से दस गुनी तेज चलाने लगा...जब लड़की कालिया और उसके साथी को क्रॉस कर रूकी और अपने फोन से किसी को कॉल करने लगी....

कालिया हल्की रोशनी में खड़ी उस लड़की के होंठ पर नजर गड़ाए पढ़ रहा था कि वो क्या बात कर रही है...अचानक उसके होंठो पर मुस्कान आई और वो अपने साथियों को इशारा कर दिया...

और अगले ही पल लड़की सड़क पर गिरी चीखने लगी," आहहहब.....चोर...चोर...मेरा सूटकेस....कोई पकड़ो....." पर जब तक कोई बस स्टैंड के अंदर कोई पहुंच पाता तब तक सब के सब फरार हो चुके थे... 

करीब दस मिनट के अंदर ही वहां शहर के एस.पी. साहब पहुंच गए...ओह...ये तो एस.पी. की इकलौती बेटी थी जिसे कालिया ने लूटा था...पूरे शहर में कोहराम मच गया और रातों रात पूरे शहर से एक-एक लफंगे को पूछताछ के लिए दबोच लिया गया...

पर कालिया और उसके साथी कहाँ गायब हो गया, किसी को मालूम नहीं...रात भर कड़ी पूछताछ के बाद बाकी सब को छोड़ दिया और पूरी की पूरी पुलिस टीम फरार कालिया के पीछे पड़ गई...

उधर कालिया जब सुटकेस को तोड़ा तो उसके अनुमान के तहत ढ़ेर सारे जेवर,कुछ रूपए और कीमती कपड़े मिले...सब खुशी से फूले नहीं समा रहे थे...पर उसे मालूम नहीं था कि पुलिस उसके पीछे पड़ गई है....

सारे चीजों को आपस में बाँटने के बाद जब वो सूटकेस को पैरों से मार कर दूर धकेला तो सबकी नजर सूटकेस से बाहर निकल कर छिटकती कुछ पेपर पर नजर पड़ी...कालिया को कुछ शक हुआ और वो पेपर उठा लिए...

पढ़ना तो आता नहीं था जो देखता कि ये किस चीज की पेपर है...वो कुछ सोच पेपर को मोड़ कर जेब में डाला और चल पड़ा...शहर से बाहर की तरफ जाते देख कालिया का एक साथी पूछा,"भाई, अपन लोग किधर जा रहे हैं..."

"अबे शाले, भेजा काम नहीं करता है क्या? इतना बड़ा माल मारा है तो वो लड़की ऐसे चुप रहेगी क्या...पुलिस में कम्प्लेन लेके जाएगी...और फिर हम सब की धुलाई और जेल दोनों मिलेंगे...कुछ दिन दूसरे शहर चल फिर सारे माल को ठिकाने लगा वापस आएंगे...तब तक बात भी ठंडी पड़ जाएगी और सबका गुस्सा भी...मतलब पकड़े गए तो सजा भी हल्की ही मिलेगी...चल अब.."

कालिया भले ही दूर भागने की कोशिश कर रहा था पर वह जानता था कि बच नहीं पाएगा....बचने के लिए उसे कोई नायाब तरीका सोचना ही पड़ेगा...वो तरीके खोजने की सोच में आगे बढ़ रहा था...

अगले दिन वह दूसरे शहर में न्यूज में पढ़ा कि वो लड़की एस.पी. बेटी थी तो सबको ऐसा महसूस हुआ जैसे पिछवाड़े में बम फूट गया...सबके पसीने पर पसीने छूट रहे थे कि बेटा, अब तो खैर नहीं...कोई और होती तो कुछ चांस भी थे कम सजा की पर अब....

शाम तक कालिया सोचता रहा...आखिर उसने जोखिम से भरा एक रास्ता खोज ही लिया और बाहर निकल फोन बूथ पर जा धमका और फोन लगाने लगा...

वो अपने शहर किसी साथी को फोन कर कुछ पूछताछ कर अपने कुछ सवाल उसे कह दिया और कल सुबह तक जवाब के लिए हुक्म दे दिया...वापस आ सब रात भर वहीं रहने की सोच खा पीकर सो गया...

अगले दिन तय समय पर कालिया फोन घुमाया और बातचीत खत्म कर अपने साथ आए सभी को कह दिया कि आगे उन सब को क्या करना है...

दोपहर बाद कालिया के सब साथी कालिया के कहे अनुसार दूर गुप्त जगह कह भिजवा दिया और खुद वापस अपने शहर की तरफ निकल पड़ा...और सबको यह भी कह दिया कि वो सब बस अपने एक साथी के सम्पर्क में रहेगा और मैं उससे सम्पर्क में रहूंगा और जब तक मैं ना कहूँ तुम लोग इधर फटकोगे भी नहीं...

शाम के 5 बजे तक कालिया अपने शहर आ पहुँचा और अपने उसी फोन वाले साथी के गुप्त स्थान पर जा पहुँचा...

साथी,"भाई,सारा बंदोबस्त कर दिया हूँ और वो लड़की अपने कपड़े खरीदने मार्केट अपने मम्मी के साथ आई है...कल आपने उसके सारे कपड़े ले लिए थे सो....." इतनी बात कहते वो हँस पड़ा जिसे सुन कालिया भी अपनी हंसी रोक नहीं पाया...

"अच्छा, ठीक है..तुम अपना नम्बर चेंज मत करना...मैं बूथ से तुम्हें फोन करता रहूँगा...खुद फोन तो रखना नहीं है...शाला ये वैज्ञानिक लोग भी ना सुविधा तो करता है पर उतना ही खतरा भी पैदा कर देता है..."कालिया उसे समझाते हुए कहा..

और फिर कुछ और बात कर कालिया निकल पड़ा...बाहर निकलते ही एक 4 व्हीलर ठीक उसके आगे रूकी और कालिया तेजी से उसमें बैठ गया और चल पड़ा...छोटे मोटे चोरी करने वाला कालिया आज बचने के लिए बड़े काम को अंजाम देने चल पड़ा था...

कालिया अपने ड्राइवर साथी से पूछा,"किस जगह शॉपिंग कर रही है वो..."

उसने जवाब दिया और गाड़ी चलाने में मशगूल हो गया...जहाँ एस.पी. की बेटी शॉपिंग कर रही थी उधर भीड़ कुछ ज्यादा थी तो कालिया उससे पहले ही अपनी गाड़ी सड़क किनारे रोक ली...

"उसकी गाड़ी कौन सी है..?" कालिया उस तरफ गाड़ी के अंदर से ही झांकते हुए पूछा..

"भाई, वो सामने लगी है..."ड्राइवर साथी ने एक सफेद रंग की गाड़ी की तरफ इशारा करते हुए बोला...

"छोटे अपना काम किया..."कालिया अपने कमर से तमंचे निकाल उसके अंदर की गोलियाँ देखते हुए बोला...

"भाई, वो छोटे सामने गोलगप्पे खा रहा है...काम हो गया है..."उसने सड़क के दूसरे तरफ देखते हुए बोला..उसकी बात सुन कालिया भी उधर मुड़ा...छोटे ने गोलगप्पे की प्लेट रखते हुए काम हो गया का इशारा कर दिया ड्राइवर की तरफ....

कालिया,"..उसे निकल जाने बोल दो.."

ड्राइवर उसे जाने की इशारा करते हुए बोला,"वो अपने लोग का ही वेट कर रहा था..."

और फिर दोनों एक साथ उस सफेद गाड़ी की तरफ नजर जमा दिया और बीच बीच उस एस.पी. की बेटी को भी खोज रहा था...पर वो यहां से दिख रही किसी भी जगह नहीं थी...

तभी ड्राइवर का फोन घिनघिनाने लगा...वो जल्दी से रिसीव कर कान में लगाया...उधर की आवाज सुन वो कालिया की तरफ देखते हुए बोला,"भाई, एस.पी. की बेटी बिल पे कर निकलने वाली है..."

कालिया "हम्म्म्म्म..."करते हुए घड़ी पर नजर डाली तो 7 बजने वाले थे...अंधेरा पूरी तरह छा गई थी...वो आखिरी बार तमंचे पर नजर डाला और उसे अपने एक हाथ में कस के थाम लिया और सामने एस.पी. की बेटी के आने का इंतजार करने लगा....
कुछ ही पलों में एस.पी. की बीवी और बेटी आती नजर आई...साथ में दो कांस्टेबल उनके पीछे हाथ में सामान पकड़े चला आ रहा था...कालिया की नजर उसे देखते ही चमक पड़ी...ड्राइवर कालिया की तरफ देखते हुए शेल्फ लगा दी...

उन दोनों के गाड़ी के निकट पहुँचते ही गाड़ी का ड्राइवर झट से बाहर निकला और गेट खोल दिया...तब तक दूसरी तरफ से एक और पुलिस का जवान गाड़ी से उतरा और खड़ा हो गया...

कुल तीन जवान थे और एक ड्राइवर...कालिया अपने पैनी नजर उन पर डाले वक्त का इंतजार कर रहा था...

दोनों मां-बेटी के बैठते ही दो कांस्टेबल गाड़ी के पीछे डिक्की में घुस गया जबकि जवान ड्राइवर के बगल में बैठ गया...तब तक ड्राइवर भी अपनी जगह ले गाड़ी को स्टॉर्ट कर दिया...

गाड़ी जैसे ही बढ़ी, अगली दोनों टायर फिस्स करती हुई अपनी सारी हवा बाहर कर दी और गाड़ी झटके लेती वहीं पर जम गई...ये देख कालिया और उसके साथी कुटिल मुस्कान से मुस्कुरा पड़े...

ड्राइवर तुरंत बाहर निकल गाड़ी की दशा पर झल्लाता हुआ कुछ बड़बड़ाने लगा...जवान और कांस्टेबल भी तब तक उतर गया और टायर देख ड्राइवर से पूछताछ करने लगा...

फिर जवान ने एस.पी. की बीवी से उतरने की हालत बयां करते हुए बताया...दोनों मां बेटी उतर कर साइड हो गई...एक टायर होती तो बदल भी सकता था फौरन पर दो थे तो बिना बनवाए नहीं होने वाला था....

गाड़ी से उतरते ही एस.पी. की बेटी फोन लगा दी...शायद पापा को बता रही थी और दूसरी गाड़ी मंगवा लेगी....ये देख कालिया थोड़ा परेशान जरूर हुआ क्योंकि दूसरी गाड़ी एस.पी. के घर से आने में करीब दस मिनट लगेंगे और कोई गाड़ी आसपास हुई तो 2-3 मिनट काफी हैं....

रिस्क लेने की सोच कालिया गाड़ी आगे बढ़ाने का इशारा कर दिया...गाड़ी कोई 40-50 गज की दूरी पर थी...5-7 गज ही गाड़ी बढ़ी थी कि एस.पी. की बेटी फोन बंद कर दी और सड़क के दूसरी तरफ नजर दौड़ाती मम्मी से कुछ कहने लगी...

ये देखते ही कालिया के रोंगटे खड़े हो गए और "धीरे.." कहते हुए एस.पी. की बेटी की नजर का पीछा किया...उस जगह नजर पड़ते ही कालिया हंस पड़ा...वो गोलगप्पे वाला था...

कालिया कांस्टेबल की तरफ नजर किया तो दोनों बैठ कर ड्राइवर को टायर खोलते देख रहा था जबकि जवान वहां पर नहीं था...तभी एस.पी. की बेटी गोलगप्पे वाले की तरफ बढ़ गई जो कि सड़क के उस पार खड़ा था...

तभी कालिया "जल्दी लो उसके पास...." कहते हुए लगभग चीख पड़ा...और पलक झपकते ही कालिया की गाड़ी सड़क के बीचोंबीच पहुँच चुकी एस.पी. के बेटी की बगल में जा कर रूकी...

एस.पी.की बेटी डर से लगभग चीखती हुई रूकी और जबतक कुछ समझती, कालिया उसकी बांह पकड़ अंदर खींच लिया और फिर उससे भी दुगुनी गति से गाड़ी चल पड़ी...

पीछे कांस्टेबल और ड्राइवर कुछ समझ के चिल्लाता, तब तक कालिया दूर जा चुका था...जवान ऐन मौके पर नदारद हो गया था जो कम से कम फायरिंग भी करके रोकने की कोशिश करता...
ये खबर जैसे ही एस.पी. को लगी, वो तो सर पकड़ कर बैठ गया कि ये क्या मुसीबत आ गई मेरी बेटी के साथ...पर ये सोचने का नहीं, कुछ करने का वक्त था...

उसने अपने दिल को संभाला और फौरन एक्शन में आ गया...आधे घंटे में शहर क्या; पूरे डिस्ट्रिक के बॉर्डर को सील कर दिया...और पूरे जिले के पुलिस को कुत्ते के माफिक दौड़ा दिया....

पर असली कुत्ता और इस बनावटी कुत्ते में कुछ तो फर्क होता है... गाड़ी में ही कालिया ने उसके मुंह पर टेप चिपका के हाथ बाँध दिया और उसे हल्की नशे की दवा सूंघा दिया, जिसे सूंघते ही वो बेहोश हो लुढ़क पड़ी...

कालिया के साथी ड्राइवर को तुरंत फोन आ गइ कि पूरे शहर के साथ साथ जिलों को भी सील कर दिया गया है और सभी लफंगों को पागल की तरह पीट पीट कर पूछताछ कर रहा है एस.पी....

कालिया चौकन्ना हो गया और वो पाँच मिनट में ही किसी से सम्पर्क किया और बाहर निकलने के लिए पता कर लिया...हर जगह दो रास्ते होते ही हैं ये सिर्फ कहावत ही नहीं बल्कि सच्चाई है....

सो उसने दूसरे रास्ते अपनाए जो कि बिल्कुल साफ और सुरक्षित थी...आगे से कच्ची सड़क जंगल से हो के निकलती थी और सीधे बॉर्डर से 5 किमी दूर मेन रोड पर मिलती थी...

पर एक दिक्कत थी कि उस रास्ते में 4 व्हीलर नहीं जा पाती थी...और ये कालिया को फायदे ही पहुँचाती...उसने एक बाइक मंगवायी और गाड़ी चेंज कर कर दी...

4 व्हीलर को सलीके से वापस भेज दिया और बाइक पर खुद लड़की के पीछे बैठा, लड़की बीच में और एक दूसरा साथी बाइक चला रहा था...

लड़की पूरी तरह बेहोश थी तो उस पूरी मजबूती से पकड़ना पड़ रहा था...इसी मजबूत पकड़ में कालिया का हाथ अचानक से उस लड़की की चुची पर पकड़ बना लिया...

कालिया सन्न रह गया...हालांकि इससे पहले भी वो कई बार ना जाने कितनी रंडिया चोद चुका था पर इस पल की बात ही कुछ और थी...

वो दुनिया से बेखबर हो चुका था और अपने सीने पर लड़की की लुढ़की सर को एक टक से निहारने लगा...अंधेरे की वजह से चेहरा तो नहीं दिख रहा था पर बनावट जरूर पता चल रही थी...

एकदम किसी हिरोइन माफिक ना गोल, ना लम्बी बनावट.. और फिर वो इन चांद जैसे बनावट को देखते देखते काफी निकट अपना चेहरा कर लिया...

कालिया के चेहरे पर लड़की की गर्म साँसे अब पड़ रही थी और वो इन साँसों में ही मदहोश होने लगी...इन्हीं मदहोशी में कालिया के अंदर मर्द जाग गया और उसके हाथ उसकी चुची को मसलने लगा....

कड़क हाथों की मसाज पाते ही फूल सी लड़की दर्द से कुनमुना गई पर होश में नहीं आ पाई...ये देख कालिया होश में आ तुरंत अपने हाथ रोक दिए...

और फिर उसकी चुची पर हाथ चला उसकी कसावट मापने लगा...एकदम कड़क और सुडौल चुची थी...निप्पल भी मध्यम आकार की थी...कालिया तुरंत भांप गया कि ये कली तो बिल्कुल ही अनछुई है...

इस दौरान कालिया का लण्ड कब अकड़ के तोप बन गया, उसे मालूम ही नहीं चला और वो तोप लड़की की गांड़ में सलवार को भेद कर जाने के लिए तड़पने लगा...

वो किसी तरह कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा था...बाइक पर कुछ करता तो बैलेंस बिगड़ सकती थी और लेने के देने पड़ जाते...उसने लण्ड से मन हटाने के लिए बार फिर उसकी चुची सहलाने लगा और उसके चेहरे देखने लगा....

वो एक बार फिर मदहोश होता गया और उसके होंठ उसके गालों से रगड़ खाने लगी...और अगले ही पल मुंह पर चिपकी टेप को दांतों तले दबा वो हटाने लगा...और वो फिर अपने होंठों से उसके चेहरे को मापने लगा...

उसके होंठ जब लड़की की नर्म और रसीले होंठों पर पड़ी तो कालिया के अंदर भूचाल सा आ गया...आज दूसरी बार लड़की सामने आई थी पर कल जहाँ लड़की नहीं, उसके सूटकेस दिख रहे थे और आज मार्केट में खुद बचने के टेंशन में लड़की की खुबसूरती निहार नहीं पाया था...

पर इस वक्त वो सब भुला इस हूर की परी को बस अंधेरे में भी साफ साफ देख रहा था...

"कालिया भाई, मेन रोड आने वाली है...अपने आदमी से सम्पर्क कर लूँ कि वो पहुँचा या नहीं..." तभी बाइक वाला साथी बोला...

जिससे कालिया स्वर्ग की सुंदरता से बाहर आते हुए बोला,"हाँ, इधर ही रोक कर पता कर लो..." कालिया के बोलते ही बाइक रूकी और वो फोन पर बात करने लगा...

सब ठीक ठाक थी और आगे आदमी तैयार भी था तो फिर से चल दिया...अब कालिया के पास और ज्यादा वक्त नहीं था कि और इस दुनिया में खो के रहे...

सो वो मुस्कुराते हुए अंधेरे में ही उलके होंठों को चूमा और वापस अपनी वर्तमान में पहुँचने की कोशिश करने लगा...पर उसका दिल नहीं मान रहा था...

तभी अचानक से कालिया के दिमाग ने कुछ कह डाला जिससे वो शर्म से मरने लगा...क्या जो तुम कर रहे वो सही है...एक मजबूर लड़की जिसका तुमने किडनैप कर लिया उसकी इज्जत भी लोगे क्या?

बचने के लिए इसे तुम उठाए और इसी का शिकार करोगे...ये तो जीतेजी मर जाएगी..इसके माध्यम से बचना चाहते तो ठीक है...इसके बाप से सम्पर्क करना और केस नहीं करने को कह बच जाना और शायद मजबूर हो एस.पी. मान भी जाए पर इसके साथ ऐसी हरकत कर रहे ये सही नहीं है...

वो इसी तरह की बातें सुन खून के घूंट पी कर रह गया और सर को झटकते हुए ऐसी हरकत ना करने की ठान ली और फिर वापस इस दुनिया में गया...अब वो एक ही बात सोचने लगा कि किसी भी तरह इसे किसी तरह की दिक्कत नहीं होने दूंगा और इसके बाप को किसी तरह मनाने की कोशिश करूंगा कि वो केस ना करे...

हां नहीं माना तो देखा जाएगा पर इसके साथ कुछ भी गलत नहीं करूंगा...चाहे एस.पी. को ही क्यों ना उठाना पड़े...अजीब थी एक ही दिन में कालिया एस.पी. को उठाने की सोचने लग गया...
कुछ ही देर में कालिया मेन रोड के किनारे पहुंच गया...उसने बाइक से उतरा और लड़की को एक फूल की माफिक गोद में उठा लिया...और सामने खड़ी गाड़ी की तरफ तेजी से बढ़ गया...तब तक बाइक वाला भी तेजी से मेन रोड पर बाइक चढ़ा फुर्र हो गया...

कालिया बड़ी सावधानी से उसे सीट पर लिटा दिया और खुद भी अंदर चला गया...और चल पड़ा...अब रात भी बीत रही थी चौकसी तेज होने की आशंका थी...कालिया उसे किसी जगह रूकने को बोला...

करीब 1 घंटे में वो अपने ठिकाने तक पहुँच गया...फिर लड़की को सुला दिया और उसके हाथ पांव अच्छे से बांधा और खुद भी सोने की करने लग गया...पर सामने ऐसी लड़की हो जो उसके दिल को घायल कर रही हो तो भला नींद कैसे आ सकती है...

वो रात भर उसे निहारने में जगा ही रह गया...सुबह में करीब चार बजे वो उठा और वहां से निकलने की सोची...वो दूसरी ओर सो रहे साथी को जगाया और चलने बोला...

"आहहहह...मम्मी...मैं कहाँ हूँ..." तभी कालिया के कानों में लड़की की सुरीली कराह सुनाई पड़ा..वो आवाज सुनते ही उसकी तरफ फौरन पलटा...

लड़की कालिया को देखते ही चीख पड़ी...रात के अंधेरे में काला आदमी और भयानक लगता है...वो डर के मारे चीख पड़ी थी...कालिया तुरंत ही नीचे झुक अपने हाथ उसके मुँह पर रख दी जिससे उसकी आवाजें घुट कर रह गई....

इससे वो लड़की छटपटाती हुई और चिल्लाने की कोशिश करती रोने लग गई...उसे रोते देख कालिया अंदर ही अंदर घुटन महसूस कर रहा था पर ऐसी स्थिति में उस पर रहम करना खुद पर कुल्हाड़ी चलाने के बराबर थी...

"ऐ रोना बंद कर नहीं तो...यहीं पे ये...ये..देख रही है ना सीधा तेरे अंदर डाल दूंगा...समझी ना..."कालिया ना चाहते हुए भी उसे डराने के लिए अपने बंदूक उसकी आँखों के आगे लहराते हुए गुर्राया...

ये सुनते ही लड़की के और डर से बुरा हाल हो गया और वो बच्चों की तरह हल्की आवाज में सिसकने लगी...ये देख कालिया कुछ हल्का हुआ पर एक डर थी कि अगर बाहर ये शोर कर दी तो मुश्किल हो जाएगी...

कालिया," देख, ये रोना-धोना बंद करो...नहीं तो मुझे फिर से तुम्हें बेहोश करना पड़ेगा...अब हम यहां से निकलेंगे तो तुम जैसे चलना चाहोगी पसंद तुम्हारी..."कालिया थोड़ा कड़क बनने की कोशिश कर रहा था पर उसकी मासूम भरी चेहरे के सामने बन नहीं पाया...

लड़की अब थोड़ी चुप हो गई और एकटक उसकी तरफ देखने लगी...ये देख कालिया उसके पांव खोल दिए और उसकी बांह पकड़ कर बेड पर बिठा दिया...इस बार लड़की नहीं चिल्लाई...

"तुम मुझे क्यों लाए हो ?"लड़की बैठते ही कालिया से सवाल कर गई...शायद भांप ली थी कि अगर वो शांत रही हो उसे कुछ नहीं करेगा ये...तो वो जानने की कोशिश कर रहा था...

कालिया सवाल सुन ऱूक सा गया और उसकी तरफ देखने लगा...कुछ देर चुप रहाऔर फिर बोला,"मुझे तुमसे कोई दुश्मनी नहीं है पर तेरा एस.पी. बाप...." कालिया "बाप" से आगे कुछ बोलता कि बीच में ही लड़की गुस्से से बोल पड़ी..

"ऐ...पापा हैं वो मेरे...और वो तुम्हारे जैसे गंदे काम नहीं करते...समाजसेवी हैं वे, इज्जत करना सीखो..." लड़की की बातों से कालिया को हंसी छूट गई...

"हा..हा...हा...ओके...तुम्हारे पापा मेरे पीछे पड़ गए हैं...अगर ऐसा रहा तो मैं किधर रहूँगा बताओ तुम ही...हर वक्त मेरे को टेंशन होता रहता है और परसों से भागता ही रहता हूँ..." कालिया की बातों से लड़की चौंक पड़ी...

"कल से...मतलब मेरा सूटकेस तुमने ही छीना था....फिर तो ठीक हो रहा है...मैं तो अब पापा को बोलूंगी कि पापा इसे जेल मत भेजो...सीधा एनकाउन्टर कर दो...इसी ने मुझे उठाया था...देख लेना अब तुम तो गए..."लड़की तुरंत समझ गई कि यही वो चोर था तो अपने अंदर का गुस्सा बाहर करने लगी...

कालिया उसकी बातों से थोड़ा मुस्कुराया और उठ कर उसकी बांह पकड़ बाहर की तरफ चल दिया...वो ज्यादा देर नहीं करना चाहता था...

"ओए..अब मुझे कहां ले जा रहे हो..मुझे घर जाना है..."लड़की ना चाहते भी खिंचती हुई चलती बोली...जिसे सुन कालिया को थोड़ा गुस्सा आ गया...

कालिया,"ज्यादा चपर चपर की ना तो तू कभी घर का मुँह नहीं देख पाएगी...चुपचाप चल तेरे पापा जब तक मेरे केस को खत्म नहीं करेंगा तू मेरे साथ ही रहेगी...समझी ना..चल अब."

लड़की का सारा गुस्सा यूँ हवा हो गई और रोनी सूरत बनाती हुई चलने लगी...गाड़ी में उस लड़की को बिठा कालिया उसके बगल में बैठा और चल पड़ा...अब धीरे धीरे धूप भी लाल रोशनी पड़ने लग गई थी जमीं पर...

लड़की को ऐसे मुंह बना देख कालिया कुछ मायूस सा हो गया...क्योंकि वो बोलते वक्त काफी हसीन लगती थी...वो खुद पर गुस्सा भी हो रहा था कि क्यों डांट दिया...खैर सुबह की वक्त थीतो सड़के सुनसान थी...जिसमें गाड़ी पूरी रफ्तार से बढ़े जा रही थी...

कुछ देर बाद ही लड़की एक बार फिर बोल पड़ी,"मुझे बाथरूम लगी है..." कालिया चौंक सा गया...वो सोचने लगा कि सच कह रही है या फिर नाटक है इसकी...भागने की...

कालिया कुछ सोचते हुए बोला,"गाड़ी अब 3 घंटे बाद अपनी जगह पर ही रूकेगी...तब तक रोक के रखो..." ये सुनते ही लड़की भड़क पड़ी...

"नहीं, मुझे अभी जाना है...ड्राइवर गाड़ी रोको...अगर नहीं गई तो गड़बड़ हो जाएगी..." कालिया उसके बोलते हुए को देख पागल सा हो रहा था...उसे उसकी बोलने के वक्त की एक्सपरेशन काफी अच्छी लगने लगी थी...

"गाड़ी नहीं रूकेगी...जो भी गड़बड़ करनी हो गाड़ी में ही कर लो...तुम्हारी मरजी..."कालिया थोड़ा मुस्कुराते हुए उसकी तरफ टेढ़ी निगाहों से बोला...ऐसे करते लड़की का पारा और चढ़ गया...

"ठीक है...तुम्हें लग रहा है मैं बाथरूम के बहाने भाग जाऊंगी...ओके...हाथ खोलो मेरा...मैं पीछे जा के करती हूँ..." लड़की थोड़ा रूखा सा हो बोली...

"ओए...गाड़ी में मत करना...नहीं तो 100 धुलाई के और 1000 का परफ्यूम छिड़कना पड़ेगा मुझे...मालिक इसके लिए फूटी कौड़ी भी नहीं देगा..."ये सुनते ही ड्राइवर चिल्लाता हुआ चीख पड़ा...

ये सुनते ही कालिया की हंसी निकल पड़ी और लड़की भी हल्की हंसी हंस पड़ी शायद उसकी अपनी सफल होती योजना पर...लड़की को पहली दफा हंसता देख कालिया की तो जान ही निकल गई...यार इसके अंदर और कहाँ कहाँ खूबसूरती छिपी हुई है...
कालिया उसे समझाने की कोशिश के लब्जों में बोला,"हमसे ले लेना यार..मौं हूँ ना.."

"ना..ना...भाई...मुझे पता है आप तब तक दर्शन नहीं दोगे जब तक मामला खत्म नहीं हो जाता...और कितना दिन लगेगा पता नहीं...तब तक ऐसे ही नहीं रह सकता.."ड्राइवर साफ इंकार कर दिया...

"अच्छा चल, तो कोई जुगाड़ कर दे इसकी...पर ध्यान से येएएए कुछ ज्यादा दिमाग चलाना चाह रही है..." कालिया लड़की की तरफ नजर करते हुए बोला...

लड़की उसकी बात सुन गुस्से से तुनक कर मुँह फिरा ली...जिसे देख कालिया मुस्कुरा कर रह गया...

"ठीक है भाई, पास ही में एक छोटी सी झील है जो सुनसान है और वो इलाका कुछ सुनसान भी हैं तो उधर कोई डर भी नहीं है..."ड्राइवर का ये जिला था तो वो बखूबी जानता था इस इलाके को और दो नम्बरी काम में ये ज्यादा दिलचस्पी लेता था जिससे पैसे भी मनमानी और कभी कभी पार्टी साटी भी मिल ही जाती थी...

कालिया उसकी बात सुन हामी भर दिया...तभी लड़की बीच में एक बार फिर बोली,"सुनसान इलाका..नहीं नहीं मुझे उधर नहीं जाना....मुझे यहीं उ...."

"चुपऽ...."कालिया उसकी इस नौटंकी से जोर से डपटता हुआ गरजा कि लड़की दो हाथ पीछे डर से हो रोने लग गई...कालिया ये देख अपना सर पीट लिया...वहाँ पहुँचते ही कालिया हिदायत से दूसरी ओर जाने बोला...

लड़की थोड़ी डर सी गई और इस जगह कुछ चाह कर भी नहीं कर सकती थी...अगर चिल्लाती भी तो इस सुनसान में कौन सुनता जहाँ आते वक्त एक भी व्यक्ति नहीं मिला था..

वो चुपचाप वापस आ गाड़ी में बैठ गई...कालिया भी बिना कुछ कहे बैठ गया...हाँ इस दौरान कालिया उसके जिस्म को बारीकी से जरूर ताड़ रहा था...

वो लड़की बस चुपचाप बैठी रो रही थी...ये देख कालिया थोड़ा भावुक सा हो गया...वो उसे किसी तरह की कोई तकलीफ नहीं पहुँचाना चाहता था...पर हो नहीं पाता था...

"तुम्हारा नाम क्या है...?" कालिया ने उसे चुप करवाने के ख्याल से बात को बदल कर उसे भुलाना चाहता था...शायद कालिया उसका दिवाना हो गया था...

वो लड़की अपनी आंखों से उसकी तरफ आंसू बहाती उसकी तरफ देखने लगी पर बोली कुछ नहीं...कालिया उससे ज्यादा देर तक नहीं नजर मिला पाया...वो अंदर से हिल सा गया और पछताने सा लगा कि शाला ये मैंने क्या कर दिया..

कालिया,"वो तुम्हारे सूटकेस में ये एक पेपर था जो मेरे काम का नहीं है..." कालिया अब बात को दूसरी ओर मोड़ते हुए अपनी पॉकेट से निकाल कर उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा...

लड़की कभी उसकी ओर देखती तो कभी उस पेपर की तरफ...फिर अपने आंसू एक हाथ से पोंछती गुस्से से भर उसके हाथ से पेपर झपट ली...और फिर सारे पेपर उलट पलट कर देखने लगी...

"सारे तो हैं ना..."कालिया जब उसके हाथों को पेपर पलटते रहा था...जब सारे देख ली तभी कालिया अपने सवाल रख दिए...उसके सवाल सुन लड़की गुस्से से उसके तरफ पलट गई...

"मुझे पापा के पास जाना है..."लड़की रौबदार आवाजें करती हुई बोली...पर कालिया को इसमें भी उसकी सुरीली स्वर ही सुनाई दी...वो थोड़ा सा सीरीयस हो गया...

"ठीक है...हम पहुँचते ही तुम्हारे पापा से अपने आदमी को बात करने कह दूँगा...अगर वो मान गए तो तुम्हें पहुँचा दूंगा आज ही..."कालिया के बोलते ही लड़की एक बार फिर बरस पड़ी....

"शाले तुम हो ही घोंच्चू....जो भी करता है गलत ही करता है...तुम्हे लगता है मेरे पापा मान जाएंगे...कभी नहीं...वे एस.पी. हैं कोई हवलदार नहीं...तुम अगर मुझे उठाने से पहले ही सरेंडर कर माफी मांग लेते तो शायद तुम्हें कम सजा देते...पर तुम तो एक और गलती कर बैठे..." लड़की बोले जा रही थी और कालिया बक-सा बना सुना जा रहा था...

"अब तो वो यही सोचेंगे कि अगर आज तुम्हारी बात मान लेंगे तो तुम इस घिनौने काम में आगे ही बढ़ोगे और इससे भी बड़ी कांड करोगे...उन्हें मुजरिम खत्म करना होता है ना कि बढ़ाना...अब भी वक्त है मुझे वापस ले चलो...कम से कम उम्र कैद नहीं होगी इसकी गारंटी मैं देती हूँ...वरना एनकाउंटर तो फिक्स है...."कालिया को उसकी सच्चाई से परदा हटा कर भविष्य बताती हुई बोली...

कालिया कुछ सोच में पड़ गया पर वो जेल में जाना नहीं चाहता था...उसे सोचते हुए देख लड़की को लगा कि तीर सही निशाने पर लगी है...वो एक दो और बात बोलने लग गई...

"हम्म्म्म...देखो तुम कह तो सही रही है पर अब मुझसे ये नहीं हो पाएगा...मुझे उसी वक्त सरेंडर कर देना था पर उस वक्त कोई तुम्हारी तरह कोई बताया नहीं था...अब कर ही दिया हूँ तो अंजाम जो हो देखा जाएगा...ज्यादा दिन के सिए जेल नहीं जाऊंगा भले ही मारा जाऊं..."कालिया बोला..

लड़की उसकी बात सुन उसकी तरफ देखने लगी...पर बोली कुछ नहीं...वो भी समझ गई कि ये नहीं मानेगा...वो अपने इस खेल को खेलेगा ही...वो चुप हो बैठ गई और वो बस ये सोचने लगी कि उसे कितने दिन तक ये झेलना होगा और अगर पापा नहीं पहुँच पाए उस तक तो ये कुछ मेरे साथ....

ये सोचते ही वो कांप सी गई...वो अब दूसरा तरीका अपनाने की सोच रही थी...वो किस रूट से जा रही थी ये गौर से देख रही थी...रास्ते में कोई ऐसी चीज देखने की कोशिश करती जो पहचान के लिए काफी हो...

वो यहां नई आई थी तो पता तो था नहीं कि इस वक्त वे कहाँ है...बस सुनसान सड़के ही थी...वो बस हर पहचान चिन्ह को याद करती जाती और वहां पहुंचने पर किसी तरह पापा से कॉन्टैक्ट कर उन्हें सारा कहानी सुना देती ताकि पापा जल्द उसे छुड़ा लेते...
करीब दो घंटे के बाद कालिया एक स्थान पर रूका और उस ड्राइवर से फोन से किसी को फोन किया...कालिया किससे बात किया वो तो मालूम नहीं चल रहा था लड़की को पर क्या बात कर रहा था वो अच्छी तरह समझ रही थी....

वो किसी पुराने दोस्त को फोन किया था और पहले तो हाल-चाल सुनाया और सुना...फिर वो अपनी स्थिति बताते हुए कोई सुरक्षित जगह की व्यवस्था करने कहा जहाँ वो लड़की को रख सके...

कुछ ही देर में बात खत्म कर कालिया ड्राइवर को किसी नदी किनारे चलने कहा...ड्राइवर भी थोड़ा हिचका क्योंकि नदी किनारे वो अच्छी तरह जानता था इस तरफ तो कुछ भी नहीं है और है भी तो नदी से एक किमी पहले ही तक सारे गांव है...

और नदी के उस पार सिर्फ घने जंगल है जहां कोई जाता वाता नहीं है और ना ही नदी पार करने का कोई साधन है...पर वो बिना कोई सवाल किए चल पड़ा...

अपने दोस्त के बताए रास्ते को कालिया ड्राइवर से कह दिया कि किस होकर चलना है ताकि रास्ते में कोई गांव ना पड़े और ना कोई देखे...आधे घंटे में सही सलामत वो नदी तट पर पहुँच गया था...

कालिया उस ड्राइवर को समझा दिया कि अब वो चुपचाप मुझे भूल कर अपने काम में लग जाना है...और कभी पुलिस उस तक पहुँच भी गई तो बस मेन रोड पर उतारने की बात कह देना जहां से हम मेन रोड छोड़े थे..

ड्राइवर उसकी बात सुना तो जरूर पर उसका ध्यान सिर्फ इसी बात पर अटका था कि अब ये जाएंगे कहाँ और रहेंगे कहाँ? इधर तो कोई आदमी भी नहीं दिख रहा है और इतनी चौड़ी नदी में भी कोई नजर नहीं आ रहा तो ये जाएगा कहाँ...

कालिया,"ऐ लड़की , तैरना आता है?"

लड़की पहले तो मुंह बना कभी नदी की तरफ तो कभी कालिया की तरफ देखने लगी..फिर बोली,"पागल हो क्या? इतनी बड़ी नदी तैर कर पार करोगे...आधे भी नहीं जा पाओगे...और मैं तो इधर ही गटक हो जाउंगी...नई नई सिखी हूँ...मुझे नहीं मरना..."

लड़की की बात से कालिया मुस्कुरा पड़ा और बोला,"चलो अच्छा है...भागने की सोचोगी भी नहीं अगर सच में नई नई तैरना सिखी हो तो..." उसकी बात से लड़की थोड़ी मायूस हो गई कि अगर सच में उस तरफ गई तो भागना तो नामुमकिन है...बस पापा ही कुछ कर सकते हैं...

कोई पांच मिनट बाद नदी के बीचों बीच कुछ नजर आई तो ड्राइवर आँखें फाड़े उसे देखने लगा...उस घने जंगल की तरफ से एक बोट...अजीब है..वो ऐसा जंगल है जहाँ आज तक कोई गया नहीं है...ना लोकल लोग और ना सरकार की तरफ से...

कुछ ही देर में वो छोटी सी बोट किनारे पर आ पहुँची और उसमें से बिल्कुल खतरनाक टाइप का डाकू जैसा दिखने वाला आदमी कालिया की तरफ हंसते हुए हाय बोला....कालिया भी हंस के हाय बोला और लड़की को चलने बोला...

लड़की मुकुर रही थी उधर जाने से...तभी कालिया आगे बढ़ा और लड़की की बाजू एक हाथ से जकड़ा और दूसरा हाथ लड़की की चूतड़ पर लगा झटके से कंधे पर उठा लिया और ड्राइवर को बाय बोल बोट की तरफ चल दिया...

लड़की कालिया की पीठ पर लगातार घूंसे बरसा रही थी और पैर चला रही था पर कालिया को ये सब बस एक छुअन महसूस हो रही थी...कुछ ही पल में बोट नदी में कुछ दूर तक निकल गई थी तो लड़की शांत हो गई और रोने लगी...अब कुछ चाह कर भी नहीं कर सकती थी...

तो कालिया उसे नीचे उतार दिया...लड़की नीचे उतरते ही धम्म से बैठ गई और बस रोए जा रही थी...कालिया को उसका रोना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था...वो भी उसी के पास बैठ गया...

कालिया,"हाँ तो रत्ना भाई, और सब कैसा चल रहा है?" ये कालिया का बचपन का साथी था जो आज से दस साल पहले एक मर्डर करके भागा था तो आज तक गायब ही था...उसके बाद तो वो मुजरिम की दुनिया का बेताज बादशाह था...पर हाँ जहाँ कालिया मर्डर करने से हिचकता था वहीं ये रत्ना डाकू निर्दोष को मर्डर करने से डरता था...

सुपारी पर काम करवाता था पर वजह जानने के बाद...इससे उसे एक बात का काफी फायदा हुआ...कहीं भी गलत काम कोई बदमाश ही करता था तो कोई ना कोई उसके नाम का सुपारी दे डालता था और रत्ना उसका काम तमाम भी कर देता था...

मतलब दूसरा बादशाह बनने से पहले खत्म और पुलिस को भी इस नई परेशानी से निजात...पुलिस भी जानती थी कि ये काम फरार रत्ना का है पर वो भी केस दर्ज कर उसे दो चार इधर उधर घूम फिर कर खोजने की कोशिश करता और फिर बैठ जाता....

बैठने की वजह सिर्फ ये थी कि रत्ना किधर रहता ये मालूम ही नहीं चलती...और साथ में पुलिस का काम भी हल्का हो जाता था...और पैसे का इंतजाम रत्ना डाकू बड़े बड़े कारोबारी,नेता जैसे लोगों से करता था जिनका ब्लैक मनी एक समंदर की तरह हो...

इसके लिए वो अपहरण कर लेता था उसके फैमिली मेंबर को...मतलब साफ सुथरी छवि में खतरनाक डाकू...शब्दों का ताल मेल बड़ी अजीब है यहाँ पर पर सच्चाई तो यही है...

रत्ना,"एकदम झक्कास है दोस्त...बस तुम्हारी याद कभी कभी नींद खराब कर देती थी तो आज से वो भी खत्म..." और फिर रत्ना कहते हुए हँस पड़ा जिसके साथ कालिया भी हँस पड़ा...

रत्ना,"अच्छा यार, ये तो बता ये कौन है और इसे क्यों उठाया..पता है तुम जैसे ही बोला ना कि लड़की उठा लिया तो मैं तो सदमे में जाते जाते रह गया...शाला ये सिर्फ पॉकेटमारी तक रहने वाला दोस्त किडनैप का कैसे कर लिया..."
रत्ना की बात सुनते ही कालिया जोर से हँस पड़ा और हंसते हुए बोला,"यार जब मुसीबत आती है ना तो सब कुछ करने की हिम्मत आ जाती है...और मेरी मुसीबत तब आई जब इसका सूटकेस गायब किया..."

"मतलब...."रत्ना आश्चर्य से कालिया की तरफ देखने लगा...बोट अपनी गति से हिचकोले खाती बढ़ रही थी...

"मतलब ये एस.पी. की बेटी है और मुझे मालूम नहीं था...ये नई नई आई है शहर में..बस इसका बाप तब से..."कालिया इतना ही बोल सका कि लड़की सामने से चिल्ला पड़ी...

"ऐ...तुम्हें समझ नहीं आती है...मेरे पापा हैं...बार बार पता नहीं बेशर्मों की तरह...." लड़की अब रोना बंद कर दी थी...अब रोने से भी क्या फायदा? बस स्थिति को संतुलन कर उसकी रंग में रंग जानी थी ताकि प्रेशर की बजाए कुछ सटीक तरीके मिल जाए मुसीबत से निकलने की...

उसकी बात सुनते ही कालिया और रत्ना दोनों की हंसी निकल पड़ी...कालिया तो कुछ वाकिफ हो ही गया था पर रत्ना के लिए ये बड़ी अजीब लड़की दिखी...वो भी कायल हो गया इसकी हिम्मत से...

"यार ये तो तीखी मिर्ची है..."रत्ना उसकी तरफ देखते हुए बड़े ही प्यार से बोला...जिससे लड़की तुनक के मुंह फेरती पानी की तरफ निहारने लगी...

कालिया,"हाँ यार, इसके तेवर जितने तेज हैं उतनी ही खूबसूरती भी...कसम से...बड़े बड़े सुंदर बाल..,बड़ी बड़ी आँखें,सुराही के माफिक गर्दन, पतली कमर, सुडौल और बड़ी बड़ी छातीईई..ई..ई..ई..ई..."

कालिया के मुख से अंतिम शब्द निकलते ही वो किकिया सा गया...क्योंकि ये शब्द सुनते ही लड़की आंख पीली करती उसकी तरफ देखने लगी...एक पल तो रत्ना भी चौंक गया पर तुरंत ही वो ठहाके लगाने लगा...

जिससे कालिया किसी बच्चे की तरह कान पकड़ दांतों तले जीभ दबा माफी मांगते मुस्कुराने लगा...ये देख लड़की की भी हंसी निकल आती पर किसी तरह उसे अंदर ही रख दी पर अपनी नजरें दूसरी तरफ कर हल्की मुस्कान जरूर बिखेड़ दी...

उसके सामने आज पहली बार किसी ने उसकी तारीफ जो की थी...और तारीफ किसे नहीं अच्छी लगती...तारीफ सुन वो अपने दिल की खुशी रोक नहीं पाई और क्षण भर के लिए वो भूल गई कि वो किडनैप भी हुई है...

उधर कालिया भी ये देख काफी काफी खुश हुआ और उसका दिल तो बल्लियों उछलने लगा...वो रत्ना की तरफ देख कर मुस्कुराया और बोला,"यार बच गया नहीं तो..."

उसके बाद कालिया और रत्ना ने अपने बीते हुए दिनों की बात खोल दिया और बात करने लगा...कैसे वो बचपन से ही ऊटपटांग काम करता था...

कैसे मौलवी साहब की मुर्गी चुराकर पार्टी करता था और अगले दिन मौलवी साहब मुर्गी की टांगे लिए पूरे शहर ढ़िढ़ोरा पिटते कहते थे कमीना कालिया और रत्ना मेरी मेहबूबा का ये हाल कर दिया...अब अंडे कैसे खाऊंगा...

इसी तरह की बात करते करते वो किनारे तक पहुँच गया...लड़की पलट कर नदी के उस पार देखी तो पूरा जल ही जल...वो माथा पीट कर रह गई...वो दोनों भी नीचे उतरे और चल पड़े...

कुछ ही दूर झाड़ी की ओट में एक जीप खड़ी थी...रत्ना उस पर सवार हो गया...साथ ही कालिया लड़की को बैठने का इशारा कर रत्ना के बगल में बैठ गया...लड़की के बैठते ही जीप अपनी रफ्तार से जंगलों के बीचोंबीच दौड़ने लगी...

इस दौरान किसी ने कुछ बात नहीं की...करीब एक घंटे जीप पर रहने के बाद जीप एक जगह रूकी...जीप के रूकते ही चार लोग सशस्त्र पता नहीं किधर से आए और जीप के चारों तरफ खड़े हो गए...

रत्ना,"जाओ तुम लोग, ये मेहमान हैं मेरे..." रत्ना के कहते ही पलक झपकते वे सब गायब हो गए...फिर आगे बढ़ झाड़ी को हटा एक सुरंग टाइप के रास्ते से अंदर की तरफ बढ़ गया...

उसके पीछे कालिया ने लड़की को चलने कहा और खुद सबसे पीछे हो लिया...कुछ ही पलों में वो झाड़ी से बाहर निकला तो सामने देख लड़की की आँखें फटी की फटी रह गई...

इस वीरान जंगल के बीच एक शानदार भवन था...जो कि दिन में भी रोशनी से नहाई थी...आखिर क्यों ना हो घर के चारों तरफ से बड़े बड़े वृक्षों से घिरी थी जिस वजह से बाहर या ऊपर से भी नहीं लगता कि यहां घर है...

घर दो मंजिल की थी...घर के अंदर दाखिल हो तीनों ऊपरी मंजिल पर गए और ऊपर पहुँचते ही रत्ना ने कालिया को एक घर की तरफ इशारा करते हुए बोला,"इस तीखी मिर्ची को इस रूम में डाल दो,पड़ी रहेगी...बाकी तुम मेरे साथ आ जाओ..."तब तक रूम के पास पहुँच रत्ना ने रूम ओपेन कर दिया...

तभी बगल के रूम से दो खूबसूरत बिल्कुल कच्ची कली और जवानी की दहलीज पर कदम रखती हुई लड़की निकल के बाहर आई...उस पर नजर पड़ते ही कालिया और इस लड़की के तो होश उड़ गए...

वो सिर्फ बिकनी में थी..ये देख रत्ना हंसते हुए बोला,"आ गया हूँ डार्लिंग...अभी आता हूँ आपकी इच्छा पूरी करने...तुम अंदर ही रूको..." इतना सुनते ही वो दोनों वापस रूम में घुस गई...

इधर इस लड़की को शर्म से अपना मुँह घुमाना पड़ा...बोल तो कुछ नहीं सकती थी...तभी कालिया बोला,"जब तक मैं तुम्हारे पापा से बात करूँ तब तक तुम यहीं रहोगी और कोई उल्टी सीधी हरकत करने की सोचना भी मत...नहीं तो जंगल कितना खतरनाक है तुम देख ही चुकी...कोई चीज..."

"मुझे फ्रेश होनी है और नहानी भी है...पूरी शरीर गंदी हो गई है..."कालिया को बीच में ही टोकती हुई अपनी जरूरत की शुरूआत कर दी...ये देख कालिया और रत्ना मंद मंद मुस्कुरा दिया...

रत्ना,"ओके मैं कपड़े भिजवा देता हूँ...तुम अंदर अटैच बाथरूम में फ्रेश हो लेना...पता है तुम औरों की तरह जिद्दी नहीं हो इसलिए इतनी खातिरदारी कर रहा वर्ना क्या होता तुम्हारे साथ तुम सोच भी नहीं सकती.."

कहते हुए रत्ना और कालिया दोनों बगल वाले रूम में चले गए...कुछ ही देर में एक लड़की आई और इसे कुछ ड्रेस दे दिए...ड्रेस खोल के देखी तो राउण्ड नेक की टीशर्ट और शार्ट्स थी...

"कोई और ड्रेस नहीं है तुम्हारे पास...मैं अक्सर समीज पहनती हूँ...ये सब उफ्फ्फ..."ड्रेस देखते ही अपनी भौंहे सिकुड़ाती हुई बोली...

"नहीं...ये तो मैं साथ लाई थी वहीं ड्रेस हैं जिन्हे आज तक कभी पहनी ही नहीं क्योंकि यहाँ पहनने की जरूरत ही नहीं होती..."वो लड़की जवाब देती हुई हंसती हुई वापस रत्ना के रूम में घुस गई...
वो लड़की कुछ देर वहीं खड़ी कुछ सोचती रही कि तभी उसे पता नहीं क्या सूझी, आगे बढ़ी और रत्ना के रूम के पास पहुँच दरवाजे पर हाथों से धक्का दे दी...

उसकी नजर सामने पड़ते ही चीख निकल गई उसकी...इन चंद मिनटों के दरम्यान में ही दोनों लड़की की चुचियाँ नंगी हो गई थी और दोनों उन लड़की को बेड पर पटके उसकी चुची से खेल रहे थे....

चीख सुनते ही सबके सब चौंकते हुए गेट की तरफ मुड़े और इसे देख रत्ना जोर से हंसने लगा और बोला,"जा यार, अब इसे क्या हुआ...पूछ ले...मुझे तो प्यास लगी है जरा इसके रस चूसने दो..."और फिर वो उसकी चुचियों पर दांत भिड़ा दिए...

कालिया ना चाहते हुए भी उठा और गेट के बाहर आया जहाँ लड़की मुंह घुमाये खड़ी कुछ बड़बड़ा रही थी...कालिया उसे देख हौले से मुस्काते हुए बोला,"क्या हुआ.?"

"ये कपड़े मैं नहीं पहनूँगी..."लड़की वो टीशर्टस और शार्ट्स कालिया के हाथों में थमाती हुई बोली...कालिया थोड़ा आश्चर्य से कपड़े को खोल कर देखने लगा...

कालिया,"यार अब मैं तुम्हारे लिए इस वक्त दूसरी ड्रेस कहाँ से लाऊं...आज भर पहन लो कल तक मंगवा दूंगा..."कालिया की बात सुनते ही लड़की गरजती हुई बोलने लगी...

"..तो फिर मेरे कपड़े वापस करो जो चुराये थे..."लड़की की बात सुनते ही कालिया हंस दिया..फिर बोला,"उफ्फ्फ...वो कपड़े यहाँ नहीं है...वो उसी शहर में एक साथी के पास है जो कि अब तक बेच भी दिया होगा या फिर बेचने वाला होगा..."

कालिया समझाने की कोशिश करता रहा पर वो बस दूसरे ड्रेस के लिए शोर मचाए जा रही थी...ये सब देख अंदर मस्ती कर रहे रत्ना का थोड़ा मूड ऑफ हो गया और वो भी बाहर निकल गया...

रत्ना,"क्या नाटक है..?" रत्ना ने बाहर आते ही पूछा तो कालिया बोला कि ये दूसरी ड्रेस मांग रही है...ये ऐसे ड्रेस नहीं पहनती है...रत्ना उसकी बात सुन आगे बढ़ा और लड़की के बिल्कुल समीप गया और उसके बालों को जोर से पीछे की तरफ भींचते हुए बोला...

"शाली चुपचाप रहा कर इधर वर्ना ज्यादा नौटंकी की ना ये तो पाँच मिनट में तुम कुछ भी पहनने के लिए तैयार हो जाओगी...समझी ना...चल जा अब.." और कहते हुए रत्ना ने उसे हल्के से रूम की तरफ धकेल दिया...

ऐसे बर्ताव की उम्मीद नहीं थी उसे...वो पल भर में आंसू की नदी बहाने लगी और रोते हुए तेजी सेअपने रूम की तरफ भाग गई और रूम बंद कर रोने लग गई...रत्ना के इस रवैये से लड़की से ज्यादा कालिया को ठेस पहुंची थी...

उसके दिल में उसके लिए ढ़ेर सारा प्यार उमड़ रहा था...आज रत्ना पहली बार किसी के लिए इतना बेचैन हो गया जब उसके साथ ज्यादातदी की गई हो...शायद उसका दिल उसे चाहने लगा था...पर वो कुछ बोला नहीं बस चुपचाप देखता रहा...

लड़की के जाते ही रत्ना कालिया बोला,"ये जरूरी था नहीं तो हर समय ये नई नई नौटंकी शुरू कर देती...बेहेनचोद मूड की मां चोद दी...चल आ इधर..." कालिया उसकी बात सुन सिर्फ "हम्म्म्म." कर रह गया और वापस रूम में आ गया...

वो ड्रेस भी नहीं ले गई थी...कालिया वो ड्रेस एक तरफ रख दिया...तब तक रत्ना कुछ ड्रिंक्स निकाल लिया और सामने रख उन दोनों लड़की को ड्रिंक्स तैयार करने कहा....

उधर पूरा शहर कर्फ्यू की तरह लग चुका था...हर जगह गहन चेकिंग और किसी पर भी शक हो तुरंत उसे पूछताछ के लिए अंदर...इन दो दिनों में शहर के जितने भी छोटे बड़े अपराधी थे सब डर के मारे दुबके पड़े थे....

पर एस.पी. सबको उसके मांद से खींच खींच कर बाहर करता और पहले डंडे की भाषा ही बोलता....इस दौरान ने कई कालिया और उसके साथी का पूरा बायोडाटा भी रख दिया...तो एस.पी. भी अपना पूरा ध्यान कालिया गिरोह पर लगा दिया....

शहर से लेकर आस पड़ोस के हर जगह छान मारा पर कहीं भी कालिया हाथ ना लगा...अब तो एस.पी. के कामों पर ही सवाल खड़े होने लगे थे...ऐसे में एस.पी. किसी जख्मी शेर की भांति तड़प कर रह रहा था...

अब तो उसे बस आखिरी किरण पर ही उम्मीद टिकी थी और वो थी फोन...वो हर वक्त फोन सामने रख उसकी तरफ निहारता रहता कि कब फोन आए...और इसमें अगर फोन की बैट्री 5% भी कम होती ना तो वो तुरंत चार्ज पर लगा देता....

उधर कमरे में बंद उसकी बेटी का रो रोकर हाल बुरा हो गया था...करीब एक घंटे तक रोती रही और फिर वो रोते रोते ही सो गई...फ्रेश भी नहीं हुई थी...जबकि बगल में रूम में रत्ना और कालिया की पार्टी अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुकी थी....

और नशे में आने के बाद कालिया रत्ना को ये साफ साफ कह दिया," दोस्त, वो लड़की को मैं लाया हूँ और तुमसे हेल्प मांगा हूँ सिरेफ रहने के लिए...मैं तो तुम्हारे जैसे बड़े हाथ मारने वाला तो हूं नहीं जो ऐसे घर बनवा सकूं..."

रत्ना बस उसकी बात सुन सर हिला रहा था...

कालिया,"..तो दोस्त अगर मुझे यहां रहने से कोई आपत्ति है तो बोल दो..मैं कोई और जुगाड़ करूँगा..."कालिया की ये बात सुन रत्ना कुछ बोलना चाहा पर कालिया रोकते हुए "पहले मेरी बात सुन..."कह चुप करा दिया...

"और अगर कोई दिक्कत नहीं है तो मेरे लिए एक काम करना...अभी से तुम उस लड़की को कुछ नहीं कहोगे...पता है दोस्त तुम्हारी बात सो उसे कितनी चोट लगी होगी उसके दिल में...नहीं..तुम्हें नहीं पता है...पर मुझे पता है क्योंकि..." इतना कह कालिया चुप सा हो गया...वो दिल के अंदर की सच्चाई को बाहर आने नहीं देना चाहता था...

रत्ना,"..हम्म्म्म..मैं बताता हूँ...क्योंकि तू उसका दिवाना हो गया है...उसका आशिक हो गया...हा..हा...हा..शाले इसी लिए तू पीछे रह गया...यार दिल की बात हमेशा सुननी चाहिए और दिल जो कहे वही करो पर करते वक्त दिमाग लगाया करो...मैं तो बोट परही जान गया था पर मैं इंतजार करता था कि तुम खुद कहोगे पर नहीं..."

रत्ना भी अब सब कुछ उलटने लग गया,"मुझे ही कहलवाना पड़ा...चलो अच्छा ही हुआ...कम से कम बोले तो...यार मुझे ना कभी प्यार वाली फीलींग किसी को देख के आई ही नहीं पर समझता जरूर हूँ...चल अब से मैं साइड...मतलब लड़की को कभी नहीं डाटूंगा...और तुम..नहीं...बस एक बात मेरी मानना...कि...तुम अब से दिल की बात सुन उसे दिमाग से करना...ठीक है.. "

रत्ना की बात खत्म होते ही कालिया भावुक सा हो गया और बिना कुछ बोले रत्ना कोगले से लग कस लिया...कोई शब्द ही नहीं थे कालिया के पास रत्ना को कहता...बस उसकी आंखें अपने दोस्त के लिए गीली हो गया...
दोनों दोस्त की पार्टी खत्म हुई तो रत्ना और कालिया दोनों बिल्कुल लड़खड़ा रहे थे...पता नहीं क्या क्या बोले जा रहे थे?ये देख उन दोनों लड़की ने उन्हें बेड पर सुलाने की सोची
...

एक लड़की रत्ना को सहारा दी जबकि दूसरी कालिया को...सहारा मिलते ही दोनों उठे और कुछ कुछ बोलते बेड की तरफ बढ़े जा रहे थे...बेड के पहुँच लड़की उन्हें बेड पर सुलानी चाही पर वो सो नहीं कर बेड के किनारे बैठ गए...

रत्ना,"हम्म्म्म्म..दोस्त आज कितने बाद बाद जब तुम्हारे साथ समय बिता रहा हूँ ना तो पता है...मुउउझे कितनाऽ अच्छा लग रहा है...शाला स्वर्ग में सीधाआआ पहुँच गया.."

कालिया,"बिल्कुलऽ...सही कह दोस्त....और तुम जैसे दोस्त हो नाऽ तो शाला....स्वर्ग भी कुछ भी नहीं....हाँ कुछ नहीं.....कुछ नहीं है शाला....."

रत्ना,"बिल्कुउउलऽ ठीक...." कालिया भी नशे में बोले,"स्वर्गऽ है ना अपने लोग का इधर ही है...उधर कुछ नहीं है...वो ऊपर...ऐ भगवान जी...देख..तेरा स्वर्ग इधर ले आया मैं...अब बोलो, क्या करोगे..हा..हा...हा..."

रत्ना,"यार, स्वर्ग में तो वो क्या कहते हैं सुंदर लड़की को...हाँ...अप्सरा...वो अपने लोग का ये दोनों है..."

कालिया,"गलत बात...बिल्कुलऽ गलत....ये दोनों किसी अप्सरा से कम सुंदर है क्या...मतलबऽ...ये अप्सरा....अप्सरा जी...कुछ हो जाए...गाना लगाओ और...."

रत्ना,"हाँ.....गाना लगाओ..." दोनों के बोलते ही वो दोनों लड़की थोड़ी मुस्कुराती हुईएक गाना म्यूजिक प्लेयर पर ऑन कर दी और फिर डांस करने लगी...वो भी सिर्फ छोटी सी कच्छी में...

आखिर रत्ना की रखैल जो थी...रत्ना जो कहता वो करती पर कभी भी रत्ना उसे जबरदस्ती नहीं करा था...औरों की तरह नहीं जो ना करे तो उसे टार्चर करे...बस प्यार से कह कह के सब कुछ करवा लेता और वो भी खुशी से राजी हो जाती...

ये देखते ही दोनों झूम उठे वाह वाह करते...माहौल पूरी तरह रंगमय हो चुका था...किसी बार की तरह सग रहा था...दो पी के टल्ली और दो लड़की डांस करती हुई...

कुछ देर तो गाना चली पर उसके बाद रत्ना के आपे से बाहर हो गया और वो दो तीन प्रयासों के बाद आखिर उठ ही गया...और आगे बढ़ लड़की के बीच जा झूमने लगा...

ये देख कालिया भला कैसे खुद कोरोक पाता...वो भी साथ हो लिया...रत्ना झूमने के साथ धीरे धीरे अपने कपड़े हटाने लगा...कुछ ही पलों में वो सिर्फ अंडरवियर में झूम रहा था...

दो तीन मिनट ही अभी झूमा कि रत्ना एक लड़की की बांह पकड़ा और अपने से चिपका लिया...इस दौरान अगर वो लड़की अपनी ताकत का इस्तेमाल ना करती तो दोनों जमीन पर ही होते...

बस रत्ना के साथ चिपकते ही लड़की समझ गई कि अब क्या करना है..वो अपने होंठ रत्ना के होंठ पर चिपका दी...ये देखते ही कालिया भी बर्दाश्त नहीं कर सका और वो भी अपनी साथ वाली लड़की को पकड़ स्मूच करने लगा...

दोनों लड़की पूरे मस्ती में स्मूच करती हुई खुद को बेड के पास पहुँचा लाई...ये बात उन दोनों को मालूम भी नहीं हुई...बेड के पास आ कुछ देर स्मूच की और फिर किस रोकती हुई उन्हें बेड पर बिठा दी...

किस रूकते ही दोनों के मुख से आहहहह निकल पड़ी...ये आह तड़प की थी...दोनों लड़की मुस्कुरा पड़ी और पुनः किस करने लग गई...कालिया को किस करती हुई वो अब उसके कपड़े खोलने लगी थी...

कालिया के सहयोग से लड़की ने कालिया को भी सिर्फ अंडरवियर में कर दी..और फिर दोनों एक साथ किस तोड़ती हुई दोनों के चेहरे पर अपनी जीभ चला मदहोश करने लगी...

रत्ना और कालिया मस्ती और नशे की दरिया में डूब सा गया और अपने हाथ लड़की की चुची पर रख दिए और मसलने लगे...अब बीच बीच में लड़की की भी सिसकी निकल पड़ती...पर वो अपने होठ और जीभ से उन्हें लीक करनी रोकी नहीं...

उसके चेहरे पर हर जगह लीक करने के बाद वो नीचे की तरफ बढ़ने लगी और दोनों के गर्दन से होती सीने पर किसेस की बौछार कर दी...बालों से ढ़की उनका चौड़ा सीना लड़की को भी मस्ती में सरोबार कर दिया था...

ज्यों ज्यों लड़की नीचे की तरफ बढ़ती दोनों पीछे की तरफ झुकते जाते ताकि लड़की को करने में ज्यादा तकलीफ ना हो...और लड़की भी पूरी मदहोशी में ऐसे प्यार लुटा रही थी जैसे वो उनकी रखैल नहीं, प्रेमिका हो...

कुछ ही पलों में लड़की नीचे अंडरवियर तक पहुँच गई और वहां पहुँचते ही दोंनों लड़की एक बार आपस में नजर मिला मुस्कुरा पड़ी और अगले ही पल बिना अंडरवियर उतारे लंडों को मुँह में भरने की कोशिश करने लगी...

ऐसा वार पड़ते ही दोनों दोस्त तड़प गए...कुछ ही पलों में दोनों अपना आपा खो दिए और तेजी से बैठते हुए लड़की के बाल पकड़ पीछे किए और बोले,"शाली, जान लेगी क्या?मेरी हालत खराब है और तुम हो कि लंड को सही चीज दे नहीं रही..."

इस पर दोनों की हंसी छूट गई...और फिर दोनों ने अपने अंडरवियर निकाल कर अपने लंड को उसके मुंह के सामने लहरा दिए...कालिया वाली लड़की के मुख से हल्की आवाज निकल पड़ी,"वॉव, आपका भी इनकी तरह ही सेम साइज की है..."

रत्ना,"हाँ , दोस्त हैं ना तो होगी नहीं...बचपन में सब काम एकसाथ करते थे चाहे अच्छी या फिर बुरी...चल अब तड़पाना बंद कर और चूस..."

रत्ना के कहते ही दोनों लड़की एक साथ गप्प से दोनों के काले नाग को मुंह में अंदर कर ली...इससे दोनों की चीख निकलते निकलते रह गई...दोनों लड़की पूरी तरह परिपक्व थी सेक्स में...हर एक चीज पूरी अदा से करती थी...

दोनों दोस्त का काला और विकराल दिख रहा लंड गोरी लड़की के मुख में अंदर बाहर हो रही थी...काफी उत्तेजक दृश्य लग रहा था...कालिया तो उत्तेजना के मारे बीच बीच में लड़की के बाल पकड़ लंड को आजाद कर देता था...

लंड छुटते ही लड़की अपने चेहरे पर खुशी जाहिर करती कालिया की आंखों में देख होंठो पर अपनी जीभ फिराने लगती, जैसे कह रही हो आपके लंड की स्वाद मुझे सबसे बेस्ट स्वाद लगी...

कालिया पागल सा हो जाता ऐसा करते देख और तेजी से वापस अपना लंड उसके मुंह में उतार देता...कई बार ये खेल कालिया के साथ होता रहा...शुक्र है कि उसने पी रखी थी वरना वो कबका झड़ गया होता...
कुछ ही देर की प्रोफेशनल तरीके से हो रही चुसाई से दोनों की सांसें साथ छोड़ने लगी थी...अब बर्दाश्त करना मुश्किल ही नहीं ,नामुमकिन सी हो रही थी...दोनों लंड को आजाद करवाते हुए तेजी से उठा...

और फिर लड़की के बांह पकड़ उठा...और यूं कर दोनों लड़की बेड पर धम्म से चित्त लेटी मुस्कुरा रही थी...रत्ना कालिया संग बेड पर चढ़ते हुए बोला,"शाली, अब बताता हूँ तुझे...मुझे तड़पाने की सजा क्या होती है..."

रत्ना और कालिया दोनों के हाथ लड़की के तन पर मौजूद छोटी सी कपड़े पर पड़ी जो बूर को अभी तक ढ़ँकी हुई थी..और एक तेज आवाज के साथ वो कपड़े चररररऽ के साथ फट गया...

अंडरवियर हटाने के साथ ही रत्ना अपने पैर लड़की की सिर तरफ कर लेट गया और लड़की के बदन के ऊपर पलटी मार दिया...जिससे रत्ना का लंड ठीक लड़की के मुंह के सामने आ गया और रत्ना का मुंह लड़की के बूप के ठीक ऊपर...

कालिया भी 6-9 की पोज में हो गया रत्ना की देखादेखी...और फिर चारों के होंठ एक साथ अपने अपने टारगेट पर काम करने शुरू कर दिए...सभी की तड़प उनके मचलन से साफ स्पष्ट हो रही थी...बस आवाजें बंद हो गई थी...

खुरदुरी जीभ और हल्की दांतों का दबाव लड़की सहन नहीं कर पा रही थी और वो कांप कांप के लंड चुसाई बंद कर देती थी और सिसकारी भरती हुई मचल सी जाती मछली की तरह....

शुक्र है कि दोनों ने उन पर दबाव बना रखे थे वर्ना मछली की तरह फिसल भी जाती...और तब दोनों उनकी बूर को पल भर के छोड़ लंड पहले उनके में उतार कर एक - दो हल्के शॉट मार देता और फिर अपना मुंह उसकी नाजुक पर धज्जियां उड़ाई हुई बूर पर रख कुरेदने लग जाता...

रत्ना तो ना जाने इन दोनों की कितनी मर्तबा पेल चुका होगा, पर लड़की की समझदारी और एक निश्चित अंतराल पर सेक्स की वजह से रत्ना इनकी बूर का अभी भी दिवाना था...

कुछ ही देर में दोनों मर्दों से कई गुना ज्यादा तड़प दोनों लड़कियों में आ गई और वो बदहवास सी हो गई...इस दौरान कई बार वो अपनी बूर से फव्वारे छोड़ चुकी थी...जब उनसे सहन नहीं हो पाई तो बस एक शब्द बोल पाई किसी तरह," "प्लीज......"

ये सुनते ही रत्ना और कालिया बूर के पानी से अपने चेहरे को सरोबार किए उठा और बेड के नीचे खड़े हो लड़की के दोनों पैर अपने कमर के साइडों में कर तेजी से खींच लिया...जिससे लड़की सरसराती हुई नीचे की तरफ आ गई जहां दोनों के विशाल लंड के सामने उनकी बूर फड़फड़ाती नजर आई...

रत्ना और कालिया अपने लंडों को हौले हाथ से पकड़ बूर पर रगड़ते हुए एक दूसरे की तरफ देख कर मुस्कुरा दिया...और मुस्कुराते हुए ही उसने अपने लंड का अगला सिरा उनकी बूर में फंसा दिया...दोनों लड़की के मुख से आहह निकल पड़ी...

और फिर दोनों के हाथ पतली कमर पर जम गई...पतली कमर भी हमले को सहने के लिए अपने हाथ से बेडशीट को भींच रखी थी...और अगले ही पल दोनों दोस्त ने एक करारा शॉट दे मारा...

खेली-खाई होने के बावजूद लड़की की नानी याद आ गई...अपने दांतों से होंठ दबाते हुए दर्द सहने की कोशिश करने लगी...रत्ना और कालिया तो इस बात का ही दिवाना था कि किसी भी बूर को पहला शॉट करारा दो...

नहीं तो बाद में एडजस्ट कर ली तो कितना भी जोर का धक्का दो पर लड़की उसे आराम में ही लेती...मर्द को मजा तभी आता है जब लड़की को चुदाई के वक्त दर्द में देखे...पर हाँ कुंवारी बूर में ये तरीका नहीं अपनाना होता है...

और फिर दोनों के कमर सुर लय के साथ चल पड़े सफर पर...कुछ ही शॉट में लड़की दर्द से उबर मस्ती के सागर में गोते लगाने लगी...कमरे में सबकी सिसकी-तड़प-वासना की मिली जुली आवाजें गूंजयमान हो गई...

बीच बीच में दोनों झुक के कभी लड़की के रसीले होंठ चूमते तो कभी निपप्ल को दांतों से भींच देते...ऐसे गैप लेने से मर्द की स्टैमिना काफी हद तक उनके वश में हो जाती है और वो लम्बे समय तक चुदाई कर सकता है...

यही तरीका दोनों अपना लड़की की बूर की धज्जियां उड़ाने के ख्याल में थे...उसने सोच रखा था जब तक लड़की बूर की दर्द से कुनबुनाई तब तक इसकी पेलाई करनी है...हर बार की गैप के बाद तेज तेज शॉट लगते थे...

कुछ देर तक इसी तरह करने के बाद कालिया ने पूरा लंड बाहर निकाला और लड़की को पोज बदल कर तैयार होने कहा...लड़की तेजी से डॉगी की तरह झुक गई और अपनी बूर कालिया की तरफ कर दी...

कालिया भी यूँ कर सही जगह पर बेड पर चढ़ कर पोजीशन लिया....और फिर झटके देते हुए जड़ तक लंड उतार दिया...तभी रत्ना भी दूसरी लड़की को भी इस पोज में कर लिया..वो भी इस तरह कि अब दोनों लड़की एक दूरे की तरफ मुंह कर रखी थी...

कालिया जिस बूर की बजा रहा था उसके बगल में सटी हुई रत्ना वाली लड़की कालिया के लंड को नजदीक से देख रही थी जबकि रत्ना के लंड को कालिया वाली लड़की नजदीक से अंदर बाहर होती लंड को निहार रही थी....

दोनों एक बार सटाक सटाक अंदर बाहर करने लगे और बूर से लगातार पानी झड़ झड़ के बह रही थी...दोनों लड़की मस्ती में बदहवास सी एक दूसरी की चूतड़ को जीभ से चाट रही थी...

वो पहुंचना तो लंड तक चाहती थी पर पहुँच नहीं पाती थी...तो मन मसोस कर चूतड. पर ही जीभ फिराने लगती...कुछ ही देर में अब दोनों के शॉट अनियंत्रित होने लग गए...

दोनों झड़ने के कगार पर जा रहे थे...लड़कियों तो ना जाने कितनी बार पानी बहा चुकी थी...और वो समय आखिर आ ही गया...दोनों की सीत्कार कमरे में गूंज पड़ी...

और दोनों तेजी से अपने लंड बाहल खींच लिए...बाहर आते ही लंड ने उल्टियाँ करनी शुरू कर दी...जिसे दोनों ने सीधा बगल की लड़की के चेहरे की तरफ कर दिया...दोनों लड़की अपने चेहरे पर पड़ी सुगंधित पानी की गंध से कुतिया की तरह एक कदम आगे खिसक ली और नजदीक से पानी अपने चेहरे पर लेने लगी...

पल भर में ही लड़की का चेहरा सफेद पानी से भर गया और दोनों दोस्त हाँफते हुए लुढ़क गए...लड़की भी बदन की थकावट को सह नहीं पाई और वो भी जस की तस धम्म से गिर पड़ी...सभी के सभी पसीने से लथपथ पड़े लम्बी लम्बी सांसे ले रहे थे...
शरीर की थकावट और नशे ने पल भर में ही कालिया और रत्ना पर हावी हो गया और वे दोनों जल्द ही नींद की आगोश में चले गए...बिल्कुल नंग-धड़ंग...वो दोनों लड़की भी सो गई थी वहीं पर....

उधर दूसरे कमरे में वो लड़की जैसे रोते हुए कमरे में घुसी थी, घुसते ही बिस्तर पर पसर गई और खूब रोई...उसे दूसरे कमरे में बज रही साउण्ड की आवाजें और चिढ़ा रही थी...वो रोती हुई ढ़ेर सारी गाली उन दोनों को दे रही थी...ढ़ेर सारी बददुआएं दे रही थी...

पर वो कमरे में साउण्ड की आड़ में जो वासना का नंगा नाच चल रहा था वो सुनाई नहीं पड़ रहा था...वर्ना वो पता नहीं खुद का ही सर नोच लेती...उसे यहां फंसा कर खुद मजे ले रहा है...

और कुछ देर तक यूं ही रोते रोते लड़की भी कब नींद की आगोश में चली गई,मालूम नहीं...

उधर एस.पी. फोन अब तक नहीं आ पाने से बौखला सा गया...उसका दिमाग शून्य सा हो गया था...वो क्या करे,कुछ मालूम नहीं पड़ रहा था...सघन छापेमारी के साथ हर एक गुंडे से किसी भी क्लू के लिए वो भरकस प्रयास में तो लगा ही था...

शहर के जितने भी सक्रिय गुंडे थे सब के सब पूछताछ में आ गए थे और किसी से कुछ हासिल नहीं हुआ...अचानक उसने अपने दिमाग पर हल्का जोर दिया और सोचना शुरू कर दिया....कुछ दिमाग में आते ही वो तुरंत चौकीदार को बुलवाता है...

चौकीदार के आते ही एस.पी. बोला,"देखो, अब तक जितने भी सक्रिय हरामी लोग हैं उनमें से सिर्फ कालिया और उसके साथी को छोड़कर सब पकड़े जा चुके हैं...मतलब ये काम भी उसी का है पर मेरी समझ में ये नहीं आ रहा है कि आखिर वो किस मकसद ये ऐसी हरकत की है..."

चौकीदार उनकी बात सुन "जी सर..." कह रहा था...एस.पी. आगे बोला,"खैर, मकसद उससे कोई सम्पर्क हो तभी मेरे समझ में आ सकता है कि वो चोरी के आरोप से बचने के लिए मुझे परेशान कर रहा है या फिर कुछ वो अपना काम को फैलाना चाहता है...अभी तुम एक काम करो कि कालिया के साथ शुरू से जितने भी आदमी साथी थे उनकी लिस्ट तैयार कर के लाओ.."

"और हाँ ध्यान से उन लिस्ट में किसी का नाम नहीं छूटना चाहिए..चाहे वो कोई हो...जाओ.." एस.पी. के कहते ही वो बाहर निकल गया...

करीब आधे घंटे में ही चौकीदार ने वो लिस्ट एस.पी को थमा दी...एस.पी. एक सरसरी निगाह डाली तो कई एक नाम तो ऐसे थे अभी भी सक्रिय थे बस उनका गैंग अलग था...और वो इधर आ भी चुका था पूछताछ में...

तो उसने उन नामों को हटा दिया...अब लिस्ट
में सिर्फ कालिया के फरार साथी के अलावा चार नाम और मात्र रह गए थे...उसने तुरंत अपनी एक टीम को बुला उन चारों को पकड़ कर लाने का आदेश दे दिया...

कुछ ही देर में चारों के चारों आ चुके थे...इनमें से दो वो भी आ गए जिसने कालिया को हेल्प की थी...एक जिसके घर पर कालिया रूका था और दूसरा ड्राइवर...

एस.पी. उसके पास आए और कालिया के बारे में पूछा तो सबका एक ही जवाब था..."सर, जब मैं उसके साथ रहता था तो वो मेरी नासमझी थी...उस वक्त सही गलत के मायने भी नहीं पता थे...जब पता चला तो मैंने उन गलती को सुधारा और कईक सालों हो गए उससे मतलब नहीं रखता..."

एस.पी. सुनते ही ताड़ गया कि सब कुछ नहीं बताने वाले हैं...फिर भी वो करीब एक घंटे तक हर एक चीज कालिया के बारे में पूछते रहे और ये चारों सब कुछ बताते रहे...बस एक चीज को छिपाकर कि इस कांड में दो साथी हम सब में से ही था...

उसके बाद एस.पी. ने उन चारों को छोड़ दिया जब कुछ सुराग हाथ नहीं लगा...पर उनके पीछे अपने गुप्त आदमी भी लगा दिए...कि इन चारों की हर गतिविधि पर नजर रखे...

अगर इनमें से एक भी हुआ तो वो जरूर कोई ना कोई गलती करेगा...उसका दिमाग अब नॉर्मल नहीं बल्कि परेशानी में चलेगा और परेशानी में तो गलत लोग अक्सर गलत कदम बढ़ा देते हैं...

उधर रत्ना के अड्डे पर...
करीब दो घंटे बाद जब एस.पी. की बेटी की भूख से नींद खुली तो वो उठ कर बैठी...फिर बाथरूम में हाथ मुँह धो बाहर निकली...जहाँ वो दोनों लड़की वहीं रत्ना के रूम के ठीक आगे बैठी बातें कर रही थी...

उन दोनों की नजर इस पर पड़ते ही वो चुप हो गई...एस.पी. की बेटी उसे चुप होते देख थोड़ी और आगे बढ़ पूछी,"वो..कालिया कहाँ है..?"

"वो तो सो रहे हैं...कोई काम है तो बोलिए.."उनमें से एक लड़की बोली..तो एस.पी. की बेटी बोली,"मुझे भूख लगी है...कुछ खाने को मिलेगा..?"

ये सुनते ही दोनों ही उठ गई और बोली,"आप रूम में जाओ...मैं अभी ले कर आती हूँ..." और फिर दोनों नीचे किचन की तरफ बढ़ जाने लगी कि तभी पीछे से एक बार फिर एस.पी. की बेटी बोल पड़ी...

"एक मिनट...पहले मैं नहाना चाहूंगी...वो कपड़े कहाँ हैं जो तुमने दी थी..."ये सुनते ही दोनों रूकी और वापस आती हुई मुस्कुराती हुई बोली,"अभी लाती हूँ..." कह कर एक वहीं पर रूक गई और दूसरी कपड़े लाने चली गई...

वो लड़की एस.पी. की बेटी से कुछ पूछने जानने के लिए रूकी थी पर उसकी हालत देख पूछ नहीं सकी...रोने से आँखें लाल हो चुकी थी....चेहरे पर बिल्कुल मायूसी छाई हुई थी...

तब तक कपड़े ला उसने दे दिए और कपड़े ले "आती हूँ ....." कह वो रूम में चली गई फ्रेश होने...वो दोनों लड़की भी वापस अपनी जगह पर आ बैठ गई और गप्पें लड़ाने लगी...
फ्रेश होने के बाद लड़की नंगी ही बाथरूम से बाहर निकली...बिल्कुल संगमरमर सी काया लिए...बालों से टपक रही पानी की बूंदे उसे और कयामत बना रही थी...तौलिया ली और पूरे शरीर को अच्छी तरह पानी पोंछी...

फिर पहनने के लिए टीशर्ट्स बेड से उठा ली... बड़ी मुश्किल से पहन पाई वो... काफी छोटी और कसी हुई थी टीशर्ट्स... उसे खुद महसूस हो रही थी जाने कब मेरी चुची टीशर्ट को फाड़ कर बाहर उछल पड़ेगी... इससे उसकी खुद की नजर बार बार ऊंची और कसी चुची पर चली जाती...

और नीचे नाभी को मुश्किल से छू रही थी... उसे काफी असहज महसूस हो रही थी.. आज तक कभी ऐसी ड्रेस नहीं नीचे थी... जिससे वो बार बार टीशर्ट को नीचे कर नाभी को ढ़ंकने की कोशिश करती पर नाकामयाब... बल्कि ऊपर से वक्ष-कटाव और दिखने लग जाती...

तंग आकर उसने छोड़ दी कि आज भर ही तो पहननी है... कल फिर अपनी ड्रेस पहन लेगी और फिर कल या परसों तक तो वापस चली ही जाएगी... फिर नीचे के लिए अब और मुश्किल... बिना कच्छी के ये छोटे से शॉर्ट्स कैसे पहनूँ... ब्रॉ-पैन्टी सब पसीने से बदबू कर रही थी तो उसे धो दी...

मन मसोस कर वो पहन तो ली पर वो अब खुद शर्म से गड़ी जा रही थी... उसकी गर्म A.C. में सनसनाती हुई बाहर की हवा जा रही थी... वो सिहर सी जाती जब वो सोचती कि वो नंगी है... वो सोच में पड़ गई कि क्या करें अब...

फिर पता नहीं उसे क्या सूझी... कमरे में लगी शीशे की तरफ बढ़ी और जैसे ही वो खुद को देखी हड़बड़ाती हुई हल्की चीख पड़ी... उसके हाथ आश्चर्य और शर्म से चेहरे को ढ़ँक ली... फिर कुछ देर बाद जब हौले आँखों से देखी तो उसे खुद पर यकीं नहीं हो रही थी कि ये मैं हूँ...

अंदर ही अंदर काफी खुश भी हो रही थी कि मैं ऐसे ड्रेस पहन ली तो ना जाने कितने पागल हो जाएंगे... क्योंकि जब वो खुद अपनी फिगर की कायल हो चुकी थी ऐसे ड्रेसेज में... फिर हिम्मत करती हुई अपने हाथ हटाई और मुस्काती हुई खुद को गौर से निहारने लगी...

कुछ देर तक कभी सीधी देखती तो कभी तिरछी...कभी झुक के देखती तो कभी साइड से...और हर एक अदा की वो खुद ही दिवानी होती जा रही थी...ना जाने क्यों वो इस ड्रेस को निकालने के ख्यालात छोड़ पहने रहने की सोचनी लगी...

तभी उसने दिमाग को झटकी तो नहीं, पहले कोशिश करती हूँ अगर उसके पास कोई जींस वगैरह हुई तो वो पहन लूंगी...टीशर्ट्स रहनेे दूंगी...तभी उसकी नजर खुद की निप्पल पर पड़ गई जो ब्रॉ नहीं रहने की वजह से टीशर्ट्स में अपनी आकार की नुमाइश पेश कर रही थी...

वो अपने हाथ बढ़ा निप्पल तक ले गई और हल्की चुटकी में निप्पल को रगड़ दी... ये जान कर की उसने या खुद हो गई.. पता नहीं, पर इसमें वो सिहर कर शर्मा सी गई..और फिर वो मटकती हुई दाएं-बाँए होती गेट तक पहुंची...

गेट की लॉक खोल हल्के से गेट खोली और हल्की सी खोली... बस इतनी कि जिसमें से वो सिर्फ अपनी गर्दन बाहर निकाल सकती... वो अपनी मुस्कुराहट चेहरे से गायब नहीं कर पा रही थी... पूरे तन को गेट के पीछे रख बाहर उन दोनों लड़की की तरफ झाँकी...

उधर देखते ही उनकी नजर आपस में टकरा गई... वो उसे इशारा कर अपने पास बुलाई तो वो दोनों उठ के तुरंत पास आते ही पूछी,"क्या हुआ.?"

"कुछ नहीं , बस एक प्रॉब्लम है..."चेहरे पर हल्की सिकन लाती हुई बोली जिसे सुन उन दोनों के भी चेहरे पर हल्की सिकन उतर आई और प्रॉब्लम जानने की उत्सुक दिखाई दी...

लड़की आगे बोली," वो दरअसल शॉर्टस में सहज नहीं लग रही हूँ तो सोची अगर तुम लोगों के पास कोई जींस,पैंट हुई तो प्लीज..." लड़की पूरी बात ना बोल पाई कि उनमें से एक लड़की बोल पड़ी...

"ओह सॉरी, अगर होती तो हम पहले ही दे देते... यहाँ सिर्फ छोटे छोटे ड्रेसेज ही हैं हमारे... अच्छा दिखाओ तो...जरा देखे तो इनमें तुम क्यों नहीं सहज लग रही हो..." अंतिम शब्द बोलने के साथ वो हल्की मुस्कुरा पड़ी और वो अंदर आने के लिए गेट पर हल्की दबाव दी...

"नहीं तुमलोग हंसोगी तो मुझे शर्म आएगी...प्लीज मैं अंदर ही रहना चाहूंगी...तब तक तुम मेरे कपड़े सुखाने की व्यवस्था कर दो..." लड़की मुस्कुराते हुए बोली जिसे वो दोनों तुरंत ताड़ गई कि इसका मूड अब थोड़ी ठीक है तो वो हंसती हुई प्लीज कह अंदर आने की जबरदस्ती दिखा दी...

ज्यादा उसे रोक नहीं पाई और वो अंदर दाखिल हो गई...जैसे ही उसकी नजर पड़ी उसकी आंखें फटी की फटी रह गई... वो लगातार ऊपर से नीचे निहारे जा रही थी... उसे ऐसे घूरते देख वो शर्म से लाल होती जा रही थी और हंसती जा रही थी...

दोनों उसे चारों तरफ घूर घूर कर निहारे जा रही थी... जब दोनों कुछ देर तक इसी तरह घूरती रही तो वो ज्यादा सहन नहीं कर सकी और आगे बढ़ एक का हाथ पकड़ ली और बोली...

"प्लीज, मुझे शर्म आ रही है... ऐसे घूरना बंद करो और मेरे कपड़े सूखने डाल दो...ताकि मैं जल्दी से वो ड्रेस पहन लूंगी..." लड़की की बात सुन वो थोड़ी बनावटी गुस्से में बोली...

"अजीब हो यार तुम... मॉडल को मैं इतने दिन से सिर्फ टीवी पर देख देख पक गई हूँ... आज पहली बार सामने देख रही हूँ तो तुम देखने नहीं देती..." इसकी बात खत्म होते ही दूसरी लड़की उसे पीछे से बांहों में जकड़ती हुई बोली...

"..और कसम से...आज तक हम लोग ना जाने कितने ड्रेस पहन ली कि किसी में हम मॉडल की तरह दिखूं पर नहीं... और ना ही कोई दोस्त... कसम से, काफी खूबसूरत लग रही हो... प्लीज यही पहने रहो जब तक यहां रहो हम दोनों के लिए... "पीछे की लड़की की बात खत्म होते ही आगे वाली लड़की घुटने पर हो ली...

और प्रपोज के स्टाइल में हो बोली," आई लव यू डियर..डू यू लव मी..?" और ये देखते ही हंसे बिना नहीं रह सकी और शर्म से अपनी आंखें बंद कर ली.. इस हंसी में पीछे वाली लड़की भी साथ हो ली...

"एक्सपेट कर लो मिस.... ऐ, तुम्हारा नाम क्या है?" पीछे वाली लड़की उसके कानों में बोलती हुई पूछी जिसे सुन उसके मुख से अपने आप "पुष्पा " निकल गई, पर उसकी आंखें अभी भी बंद ही थी खुशी और शर्म से...

"वॉव...पुष्पा...मैं डॉली और ये रिंकी...हाँ कह दो रिंकी को... लड़की काफी अच्छी है बस कुछ काम बुरी है... पर तुमसे काफी प्यार करेगी... ये मैं दावे से कहती हूँ... आज तक कभी लड़के को आई लव यू नहीं बोली है ये..."डॉली आगे की बात खत्म कर पुष्पा के गर्दन पर हल्की किस चिपका दी...
पुष्पा जब अपनी आंखें खोली तो सामने रिंकी उसी तरह बैठी उसके हां के इंतजार में बैठी थी... जिसे देख उसकी हंसी निकल पड़ी और वो बोली,"प्लीज यार, अब और मत सताओ नहीं तो मैं मर जाऊंगी... तुम लोग इतनी अच्छी फ्रेडली हो मैं सोच भी नहीं सकती..."

रिंकी,"नो, मैं फ्रेंड नहीं हूं तुम्हारी ...दिवानी हूँ और लवर बनना चाहती हूं... फ्रेंड तो डॉली है... और हां नहीं की तो मैं मर जाऊंगी प्लीज..." पुष्पा की तो हंसी रूक ही नहीं रही थी...रिंकी के हाथ पुष्पा की ओर बढ़ी थी...

डॉली,"यस माई डिअर फ्रेंड, अब हां भी कह दो...प्लीज" दोनों की ऐसी बातें सुन वो खुद को रोक नहीं पाई और पुष्पा बोली,"पहले मेरे कपड़े सुखने दे आओ..."

पुष्पा के बोलते ही डॉली बोली,"उफ्फ्फ्फ... ओके तुम हाँ कहो और मैं उधर गई...जल्दी करो..." पुष्पा उसकी बात सुन रिंकी की तरफ देखी जो मुस्कुरा रही थी... पुष्पा ने अपने हाथ उसके हाथ में रखती हुई मुस्कुराई और बोली,"आई लव यू टू रिंकी..."

पुष्पा को भला क्या दिक्कत होती... इतनी हंसमुख फ्रेंड जो मिल गई थी... और ये अगर सच में अच्छी फ्रेंड हुई तो जरूरत पड़ने पर काम भी आ सकती है...

पुष्पा के हां कहते ही डॉली कपड़े लेने बाथरूम की तरफ निकल गई जबकि रिंकी खुशी से उठती हुई पुष्पा से "थैंक्स.." कहती लिपट गई.. पुष्पा रिंकी की हर हरकत पर हंसे बिना नहीं रह सकती थी...

कुछ पल गले मिलने के बाद रिंकी थोड़ी सी पीछे हटी और बोली,"डिअर पुष्पा, अब मेरी गर्लफ्रेंड बनी हो तो कुछ हक तो बनता है ना..." रिंकी की बात सुन पुष्पा जब तक उसकी बात समझने की कोशिश करती तब तक रिंकी अपने होंठ पुष्पा के होंठ से चिपका दी....

पुष्पा की शरीर में तो मानों करंट लग गई... आज पहली बार किसी के होंठ उसके होंठ को टच की थी... वो बदहवास सी रह गई... जबकि रिंकी पुष्पा के अनछुई होंठो से रस चूसनी शुरू कर दी थी...

रिंकी हर पैंतरा जानती थी इस खेल में... जबकि पुष्पा बिल्कुल नादान... कुछ ही पलों में पुष्पा हार सी गई और खुद को रिंकी की बांहों में सौंप दी... रिंकी अपनी प्रेमिका को प्यार किए जा रही थी होठों से...

मदहोश हो चुकी पुष्पा को रिंकी ने कब उसे बेड पर लिटा दी, पुष्पा को मालूम नहीं... वो बस रिंकी की चुसाई में खोई थी... और वो अब रिंकी का भरपूर साथ भी दे रही थी... तभी पुष्पा चिहुंक सी गई....

रिंकी ने अपने हाथ उसकी चुची पर जो रख दी थी... पुष्पा ने तेजी से अपने हाथ बढ़ा उसके हाथ को पकड़ कर हटाने की कोशिश करने लगी और वो खुद को बेड पर लेटी पा सोच में पड़ गई कि वो बेड पर कब आई...

रिंकी को समझते देर नहीं लगी कि ये अभी तक अनछुई कुंवारी है... वो और गहरी और मदहोशी वाली किस करने लगी और अपने हाथ को पुष्पा की चुची से हटाने की बजाए और जोर से पकड़ बना दी...

पुष्पा छटपटाने लगी पर रिंकी से खुद को अलग नहीं कर पा रही थी...रिंकी के हाथ अब पुष्पा की चुची को हौले हौले मसलने लगी थी... पुष्पा बार बार छूटने की कोशिश कर रही थी... आखिर कब तक कोशिश करती... उसकी चूत जो मानने को तैयार नहीं थी... चूत से पानी रिसनी शुरू हो गई थी...

पुष्पा विरोध करना छोड़ अपने दोनों हाथ बाहर कर रिंकी की पीठ पर रख दी... नीचे पुष्पा प्रेमिका की तरह पड़ी थी और ऊपर रिंकी किसी प्रेमी की तरह चढ़ प्यार की बारिश कर रही थी... पुष्पा अब गरम हो चुकी थी तो उसने भी रिंकी की जीभ को चखने की कोशिश की...

रिंकी को जैसे ही ये महसूस हुई तो उसने झट से अपनी पूरी जीभ पुष्पा के मुंह में उतार दी और अपनी नई प्रेमिका को चूसने के लिए छोड़ दी...पुष्पा रिंकी की हरकत से शर्मा गई और नहीं चूसना चाहती थी पर रिंकी ने उसे पीछे हटने ही नहीं दी, जब तक कि वो स्वाद चखना शुरू नहीं कर दी...

पुष्पा को अंततः चूसनी ही पड़ी और पल भर में ही वो बड़े चाव से चटखारे लेनी शुरू कर दी... रिंकी बस यूं शांत रह अपनी जीभ चूसवाती रही और हौले हौले पुष्पा की चुची दबाती भी रही...और तभी दोनों के कानों में डॉली की आवाज पड़ी...वो तब तक कपड़े बाहर रख आ गई थी...

"डॉर्लिंग ,मैं भी हूं..."डॉली पुष्पा के बगल में पेट के बल लेटी सीधे पुष्पा के कानों में बोली... ये सुनते ही पुष्पा स्मूच रोक दी और बिना डॉली की तरफ देखे शर्माती हुई अपनी आंखों पर दोनों हाथों से पर्दा डाल मुस्कुराने लगी...

"ओए, ये मेरी गर्लफ्रेंड है...तेरी नहीं..चल जा अपना काम कर... " रिंकी ने अपने होंठों पर लगे प्याररस को पोंछती हुई बोली... ये सुनते ही डॉली तेजी से रिंकी के कान मरोड़ती हुई बोली,"शाली, और वक्त तो दोस्त का वास्ता दे हर काम में साथ कर लेती हो... तो अब क्यों नाटक कर रही हो... मैं कुछ नहीं सुनने वाली... हर चीज पर जब हम दोनों का बराबर हक है तो इस पर भी ये नियम लागू होगी तो होगी...."

अपनी बात कहती हुई डॉली आगे खिसक पुष्पा के चेहरे केे बिल्कुल समीप अपने चेहरे लाई और हाथों से पुष्पा को बेनकाब करने की कोशिश करने लगी... इस पर रिंकी हंसे बिना नहीं रह सकी और बिना कुछ कहे पुष्पा के शरीर से हट बगल में लुढ़क कर दोनों को देखने लगी...

डॉली जितनी जोर से पुष्पा के हाथ हटाती, पुष्पा उतनी ही ताकत से हाथों को चेहरे पर कस लेती... उसे देख रिंकी बीच बीच में चुटकी लिए जा रही थी... पुष्पा अपना चेहरा डॉली के किस की डर से नहीं ढ़ंकी थी, बल्कि वो तो शर्म से गड़ी जा रही थी...

काफी कोशिश के बाद भी रिंकी डॉली को नाकामयाब होती देखी तो वो रह नहीं पाई और अपने हाथ बढ़ा पुष्पा के कमर पर हल्की गुदगुदी बना दी... इससे पुष्पा उछल पड़ी और उसके दोनों हाथ गोली की रफ्तार से नीचे कमर की तरफ बढ़ गई...बस डॉली इसी पल का इंतजार कर रही थी...

वो तड़के ही पुष्पा के लबों पर टूट पड़ी... पुष्पा को किस से परहेज तो थी नहीं जो अब विरोध करती... एक से दो भली... यही सोच वो तुरंत ही डॉली को भी सपोर्ट करने लगी और डॉली किसी हवसी की तरह लगातार पुष्पा के होंठ को चूसती तो कभी हल्के से काटती... पुष्पा भी अब थोड़ी थोड़ी मस्ती में डूबकी लगाने लगी थी...
कुछ देर तक दोनों स्मूच करती रही... पुष्पा के लिए ये बिल्कुल अनोखे पल थे... जिंदगी की पहली किस लड़कियों के संग... पुष्पा अपनी आँख बंद की किस में पूरी तरह लीन थी... तभी पुष्पा जोर से उछलती हुई डॉली को झटके देती उठ बैठी...

डॉली गिरते गिरते बची बेड से... वो सोच में पड़ गई आखिर क्या हो गया इसे अचानक... सामने रिंकी खड़ी जोर से हंस रही थी... उसे समझते देर नहीं लगी कि रिंकी जरूर कुछ की है... वो रिंकी की ओर देखती हुई बोली,"कमीनी मैं तुझे डिस्टर्ब की थी जो मुझे कर दी...रूक बताती हूँ..."

डॉली,"ऐ मुझे थोड़े ही पता था कि इसके गहने छुऩे पर ये ऐसे भड़केगी... मैं तो और डबल इंज्वाय करने की सोच नीचे बस हाथ ही तो रखी थी... ही.. ही... ही.. "

रिंकी की बात सुन डॉली भी हंस पड़ी और एक दो गाली रिंकी को तोहफे में दे डाली... फिर वापस पुष्पा के बगल में बैठ गई और उसकी तरफ देखने लगी... पुष्पा जोर जोर से सांस लेती हुई शर्म से सर झुकाए मुस्कुरा रही थी... वो शर्मीली थी नहीं पर आज ये दोनों उसे शर्म की दुनिया से वाकिफ करवा दी थी...

डॉली उसे मुस्कुराते भांप पुनः मजे करने की सोच उसके कंधे पर हाथ रख चेहरा अपनी तरफ करनी चाही... पुष्पा चेहरा घुमाना नहीं चाहती थी अब... रिंकी बस हंसने में लगी हुई थी जबकि डॉली को संतुष्टि नहीं मिली थी... जब डॉली थोड़ी जोर दी तो पुष्पा उसके हाथ पकड़ ली और बोली...

पुष्पा,"प्लीज डॉली, अब नहीं होगी हमसे... बाद में कर लेना..." पुष्पा की बातो में रिक्वेस्ट थी पर कोई नाराजगी नहीं थी... चेहरे पर उसकी खुशी साफ झलक रही थी... डॉली उसकी बात को तुरंत काटती हुई पूछी,"क्यों यार, रिंकी की प्यास तो बुझा दी और मुझे प्यासी छोड़ देगी...प्लीज.."

फिर डॉली रिंकी की तरफ देखती हुई बोली,"और तुम ... देखना है तो शांति से बैठ के देखो वर्ना गेट उस तरफ है...समझी.." रिंकी भी पीछे कहां रहने वाली थी... वो आगे बढ़ पुष्पा के दूसरी तरफ से बैठी और पुष्पा को बांहों में जकड़ बेड पर वापस पलट गई जिससे डॉली भी साथ ही पसर गई...बीच में एक नाजुक सी फूल और दोनों तरफ दो भंवरे लिपटी...

रिंकी,"साली, मेरी गर्लफ्रेंड और हम ही को बाहर जाने कहती है... अब तुम्हें करना है तो करो वर्ना बाहर जाओ..." दोनों की बात सुन पुष्पा बीच में खुद पर होने वाली कहर को याद कर कांपती सी बोली...

पुष्पा,"हे प्लीज, मेरी बात सुनो... पहले मुझे भूख लगी है... मुझे खाना है... " पुष्पा की बात सुनते ही दोनों के मुख से एक साथ सॉरी निकली और दोनों पुष्पा से अलग हो गई और बाहर किचन की तरफ निकल गई... पुष्पा कुछ राहत की सांस ली पर इसमें उसकी सहमति तनिक नहीं थी... वो खुद मजे चाहती थी पर पेट की आग के सामने हार गई... आज उसे सबसे हसीं जिंदगी की महक जो लग गई थी...

दोनों के बाहर निकलते ही पुष्पा ऩठके खड़ी हो गई... बेचारी उसकी पूरी बूर रस से सरोबार हो चुकी थी... इस बार वो मैदान में आती तो उन दोनों को मालूम पड़ जाती कि मैं पेन्टी नहीं पहनी हूं और मस्ती में पानी छोड़ रही हूँ... वो यही सोच के मुस्कुराती हुई बाथरूम में घुस गई...

खुद को फ्रेश की और बाहर निकल आई... ठीक उसी वक्त वो दोनों भी हाजिर हो गई... नजर मिलते ही मुस्कुराए बिना रह ना सकी... पुष्पा आगे बढ़ते हुए दोनों से सवाल कर गई,"तुम लोग का घर कहाँ है..?"

रिंकी,"डॉर्लिंग, हम दोनों का घर यहाँ नहीं है... पड़ोसी जिले से हैं..."रिंकी बस उतनी ही बताई जितनी पुष्पा पूछी... पुष्पा मन में सोच रही थी कि दिखने में और स्वभाव से ये ऐसी लगती नहीं है फिर ये सब कैसे करती है... वो इस बात को जानने की उत्सुक हो गई....

पुष्पा,"..तो इधर कैसे आ पहुँची और ये सब क्यों कर रही.." पुष्पा खाना शुरू कर दी जबकि वो दोनों वापस बेड पर आ बैठ गई... रिंकी बैठते हुए बोली,"वो सब बेकार की और बीती हुई कहानी है तो उसे मत पूछो... बस इतना समझ लो मुझे शुरू से मस्ती करने की आदत थी जबकि इसे मजबूरी में करनी पड़ी..."

पुष्पा एक बारगी तो चौंक सी गई... आजतक तो मजबूरी की कहानी काफी सुनी थी पर आदत इतने गंदे काम की... वो पलट के रिंकी की तरफ देखने लग गई... रिंकी आगे बोली,"हमदोनों बचपन से ही बेस्ट फ्रेंड हैं... दो साल पहले डॉली के पापा का एक एक्सीडेंट में देहांत हो गया और इस सदमे से आंटी जी मतलब इसकी मम्मी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो गई... "

"तो फैमिली की पूरी जिम्मेदारी इस पर आ गई... तो ये जॉब के लिए चक्कर लगाने लगी... जहाँ जाती जॉब तो मिल जाती पर पाँ दस दिन में ही इसे असलियत मालूम पड़ जाती कि जॉब क्यों मिली इतनी आसानी से... बस फिर जॉब छोड़ देती..." रिंकी कही जा रही थी और पुष्पा खाते हुए सुन रही थी गौर से...

रिंकी,"उधर मैं शुरू से ही लड़के से अफेयर करती, मस्ती भी करती कुछ से फिर बॉय बॉय कह देती... बस एक दिन पता नहीं कैसे मैं खुद ब खुद इसके साथ जॉब के लिए निकल पड़ी और जॉब ले ली...दो दिन में हम दोनों को ऑफर मिल गई... रात भर मैं सोचती रही और अगले सुबह डॉली से बात कर हम दोनों हाँ कर दी... कुछ दिन तक तो शहर में ही की जिसमें एक दो घंटे लगते...पर अब दिन के हिसाब से काम करती हूँ... बस यही है कहानी..."

पुष्पा तब तक खाना खा ली और हाथ मुँह धो ली...डॉली बर्तन हटा दी और वापस आ पुष्पा के पास आ गई... पुष्पा डॉली के मंसूबे को समझते देर ना की वो पीछे हटती बोली,"प्लीज डॉली, अभी खाना खाई हूँ कुछ देर रेस्ट करने दो..."

तभी रिंकी पुृष्पा के ठीक पीछे आई और सीधे उसके दोनों चुची को जोर से जकड़त ली जिससे पुष्पा हंसती हुई जोर से चीख पड़ी...

रिंकी,"साली, अब हर वक्त नाटक करने की कोशिश करती है... पर हम इस नाटक को मानने वाले नहीं है... जब तक यहाँ हो तब तक मस्त करोगी हमें...बाद में सोची जाऑगी... समझी माई डिअर पुष्पा..." तब तक डॉली भी आगे से आ पुष्पा को जकड़ उसके होंठ के लिए बढ़ने लगी...

पुष्पा,"नहीं... नाटक नहीं कर रही... कुछ देर रेस्ट कर लेती फिर जो मन हो करना मैं मना नहीं करूँगी... बिलीव मी..."पुष्पा की बात सुन दोनों शांत पड़ गए... फिर रिंकी बोली,"पक्का ना...बाद में नाटक नहीं ना करेगी..."

ये सुनते ही पुष्पा गर्दन पीछे की तरफ की और रिंकी के होंठों पर एक छोटी चुंबन जड़ती हुई बोली,"प्रॉमिश..."जिस पर रिंकी मुस्कुराए बिना ना रह सकी...तभी डॉली बोली,"ठीक है पर हम जो करेंगे वो तो करने दोगी ना..."

पुष्पा हंसती हुई डॉली के होंठ चूमी और बोली,"हाँ बाबा, जो मरजी करना...सीख भी तो लूंगी ना कुछ...अब खुश..."

रिंकी,"हाँ मेरी सोन परी...खुश...अब तुम रेस्ट करो... नाइट में फुरस्त मिलते ही आ धमकूंगी...बस किल्ली खोलने में देर मत करना..." और फिर दोनों हंसती हुई बाहर निकल गई और पुष्पा रेस्ट करने बेड पर पसर गई....
शहर में एस.पी. परेशान कि अभी तक कोई कॉन्टेक्ट क्यों नहीं कर रहा है... आखिर मेरी बेटी किडनैप करने का मकसद क्या हो सकता है... उसे अब थोड़ी मायूसी जरूर होने लगी थी...

उसकी बीवी तो रो रोकर बुरा हाल कर ली थी... तुरंत ही बेहोश हो जाती... उसकी देखभाल में एक डॉक्टर तो 24 घंटे मौजूद रहते थे... रात में करीब 10 बजे एस.पी. के घर के फोन पर अचानक रिंग बजी...

एस.पी. तुरंत भागा लपक के फोन उठाया पर उसी पल फोन कट गई... एस.पी. हैलो-हैलो चिल्लाता रह गया... वो समझ गया कि ये उसी का फोन है... वो रिसीवर रख वहीं पर बैठ गया... करीब दस मिनट बाद एक बार फिर रिंग बजी...

एस.पी. तुरंत रिसीवर उठा बोला,"हैलो.." पर उधर से कोई आवाज नहीं... एस.पी. कई बार हैलो किया पर कोई जवाब नहीं... फोन अभी भी कटा नहीं था... वो कुछ देर तक यूं शांत हो गया और उसके बोलने का इंतजार करने लगा...

"अगर तेरी बेटी चाहिए तो भाई पर जो तूने लूट का केस किया है वो फाइल फाड़ के फेकना होगा और दोबारा कोई एक्शन नहीं लेने का... चालाकी नहीं करने को..." उधर से आवाज अचानक सुनाई पड़ी तो एस.पी. सुना और बीच में ही उसे रोकते हुए बोला...

"अरे, तुम्हें किसने कह दिया कि मैंने केस किया है... अभी तक सिर्फ सनहा दर्ज है जो कि अगर तुम चाहते तो यहीं से ये बात क्लोज हो जाती... बस मेरी बेटी के कुछ कागजात और सामान वापस कर देते तो... पर तुमने तो. ."एस.पी. बोल ही रहा था कि बीच में उसने लगभग चीख मार उसे चुप करा दिया...

"ऐ एस.पी., अब क्या किया मैंने..., शाले तु कुत्ते के माफिक पीछे पड़ गया था तो क्या करता... साला खुद तुमलोग लाख दो लाख एक बार गटकता है तो कोई बात नहीं और साला अपुन तेरे घर जब छोटा सा हाथ मारा तो फट गई... वो भी अनजाने में हो गया... पहचानता नहीं था ना इसलिए..." गुस्से से लबालब दूसरी तरफ से सटासट एस.पी. के कानों में पड़ी...

एस.पी. तो अभी किसी शिकार की तरह था वर्ना वो ऐसी जिल्लत कभी भी नहीं सह सकता था... अच्छे काम के लिए उसे आज तक हर साल अलार्ड मिले हैं और वो उस पर कीचड़ उछाल रहा है... अगर मैं पैसे खाता तो अपनी एकलौती बेटी को यहां नहीं पढ़वाता, विदेश भेजता... उसके अंदर तो क्रोध की ज्वाला भड़क उठी थी पर किसी तरह चुप रहने में ही भलाई समझी...

"देखो, तुम विश्वास करो मैं अभी तक केस नहीं किया हूँ... हाँ तुम मेरी बेटी और लूटे हुए सामान हाजिर कर दो मैं कुछ नहीं कहूँगा... " एस.पी. उसे लुभाने के लिए बिल्कुल एक मासूम बच्चा बन गया था, वो भी डरा हुआ बच्चा जो हर बात मानने को तैयार... पर उसके अंदर क्या चल रही थी ये कोई नहीं जानता था...

एस.पी. की बात सुन दूसरी तरफ से हंसी छूट पड़ी... और आवाज,"सामान, सॉरी सर वो यो हम सब ने बेच दिए तो सब खत्म... पर तुम्हारी बेटी अभी जिंदा है... बस मुझे वो केस की फाइल दो और अपनी बेटी..."

एस.पी. पुनः परेशान होते हुए बोला," ओफ्फ...कितना समझाऊं तुम्हें मैं कि केस नहीं हुआ है अभी... अगर विश्वास नहीं है तो ठीक है.. कल सुबह मैं केस फाइल कर दूँगा तुम सब पर...फिर तुम्हें वो फाइल दे दूंगा... तब फाइल के साथ जो करना होगा वो करना..."

एस.पी. की बात सुन दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया... कुछ देर बाद वो बोला,"सच कह रहे हो..?" एस.पी. इतना सुनते ही समझ गया कि ये बिल्कुल ही बेवकूफ है... ये सच में लफंगे चोर हैं जो आजतक बस चोरी ही किया है वो भी गंवार की तरह... एस.पी. तुरंत "हां.." कह दिया...

"ठीक है,मैं भाई से बात कर के कल फिर फोन करता हूँ..." और इतना कह उसने फोन काट दिया... आखिरी बात सुनते ही एस.पी. का माथा ठनक गया... मतलब ये वो नहीं उसका चमचा है... शाला फिर तो...शिट्...

फिर एस.पी. ने तुरंत उसी वक्त नम्बर का पता लगाया तो किसी दूसरे शहर के पब्लिक बूथ का था...अब तो उसे थोड़ा यकीं हो गया था कि मेरी बेटी इस शहर में नहीं,बल्कि दूसरे शहर में है... तो उसने रातोंरात ही अपने गुप्त टीमों को वहां भेज दिया और उस शहर के एस.पी. से बात कर मामला साझा कर दिया...

दूसरे शहर के एस.पी. पुलिस ने गुप्त तरीके से हर जगह निगरानी रखनी शुरू कर दी... अगर छापे मारता और उसकी बेटी नहीं मिलती तो सारा गुड़ गोबर हो जाता... बस उस फोन बूथ और उसके आसपास भी सारे फोन बूथ पर नजर रखने लगा...

रत्ना और कालिया की नींद करीब 10 बजे खुली तो दोनों पहले फ्रेश हुए... फिर उन्हें तेज भूख लगी... तो खाना मंगवाया और भर पेट खाया... फिर कालिया फोन घुमा कर अपने आदमी से एस.पी. के बारे में जानकारी लिया कि क्या कहा?

उसकी बात सुन दोनों का हंस हंस के बुरा हाल था... दोनों ये सोच के हंस रहा था कि एस.पी. हमें इतना बुद्धू समझ रहा है...कालिया हंसते हुए बोला,"साला... उसकी बेटी सही कहती थी कि मुझेे छोड़ेगा नहीं वो... जेल जाना ही होगा..." उसकी बात सुन रत्ना उसे समझाने की कोशिश की...

"देख भाई, अब भी कहता हूँ... तुम यहीं मेरे साथ रह जाओ... कोई दिक्कत नहीं है इधर... मानो अगर तुम सरेंडर कर भी देते हो या ये सब छोड़ भी देते हो तो आराम से नहीं रह पाओगे... जेल से बाहर आने के बाद जब भी क्राइम होगा या कोई पागल पुलिस वाला आया तो तुम्हें बेवजह परेशान करेगा और मनमानी करेगा तुम पर..."

कालिया कुछ सोचने लगा...उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें... उसे अब अफसोस भी हो रहा था कि बेकार ही तिल से ताड़ बना दिया...पहली बार पकड़े जाने वाला हूँ... पहले तो कभी पकड़ा ही नहीं गया क्योंकि हर शिकार बाहरी होता था... कोई थाने में केस भी करते तो कुछ ले दे के मामला को खत्म करवा देता था...

मगर इस बार मामला ही गड़बड़ हो गया... दूसरा शिकार होता तो इतनी टेंशन नहीं होती... एस.पी. की बेटी ही गले आ गई तो शाला कोई ले दे भी नहीं करेगा... अब तो यही उपाय है कि इधर ही डेरा जमा दूँ... उसने रत्ना की तरफ देख हामी भर दी और बोला,"..पर इस लड़की को ऐसे नहीं छोड़ूंगा भाई..."

रत्ना,"अबे तो मैं कहां ऐसे छोड़ने वाला भाई... कम से कम लड़की जो खाना खाती है उसका तो बिल करना ही होगा... एक दिन का बिल एक लाख फिक्स है इधर तो हिसाब लगा लो कितना दिन रखना है... अब कल किसी दूसरे को बता देना कि एस.पी. से पैसे लेना है...बाकी का काम मेरा आदमी कर देंगेे..."

कालिया,"ठीक है दोस्त, साले एस.पी. से कम से कम दस लाख की डिमांड तो होनी ही चाहिए...क्या कहते?" कालिया की बात सुनते ही रत्ना खुशी से झूमता उसे शाबासी दी गैंग में शामिल होने की...
फिर दोनों ने कुछ और बातें की, फिर डॉली और रिंकी की जबरदस्त चुदाई में भिड़ गए... देर रात तक लूम में धमाचौकड़ी मचाते रहे... इस धमाचौकड़ी में एक वो भी थी जो बिल्कुल अपनी कोरी जवानी को लिए सुलग रही थी... रिंकी और डॉली ने इसे सुलगा जो गई थी...

बेचारी करवट बदल बदल कर सोने की कोशिश करती पर नाकामयाब... रात के सन्नाटे में कभी कभी जंगली जानवरों की आवाज सुनाई देती पर उससे ज्यादा बगल के रूम से आती हुई मादक और वहशी भरी आहें... जो सीधी इसके दिल तक चली जाती और एक टिस सी उठती...

काफी कोशिश की समझाने की इस नादान दिल को पर वो खुद हार गई और बिस्तर से उठ आहिस्ते से गेट खोली और इधर उधर चोर निगाहों से मुआयना करने लगी... जब संतुष्ट हो गई कि कोई नहीं है इस वक्त तो बिल्ली पंजों से रत्ना के रूम की तरफ बढ़ गई...

ज्यों ज्यों गेट के पास पहुँचती जाती उसकी धड़कनें तेज होती जा रही थी... आखिर गेट के पास पहुँच ही गई तो गेट बंद थी... वो इत्मीनान से वहाँ खड़ी रहने की सोच गेट के बिल्कुल निकट चिपक गई और अपने कान गेट पर लगा दी ताकि अंदर की हर एक चीजें साफ सुनाई दे...

हालांकि पूरी तरह तो नहीं पर पहले से काफी स्पष्ट सुनाई पड़ रही थी... अंदर से आ रही सिसकियों के साथ रत्ना व कालिया की गंदी गंदी गालिया सुन वो तो सिहर गई पर खुद को अकेले सोच वो अलग नहीं हो सकी वरना वो एक पल भी गाली सुनना बर्दाश्त नहीं करती थी...

कुछ ही पलों में पुष्पा खुद को अंदर बेड पर महसूस करने लगी उन दोनों के साथ...अगले ही पल वो चौंकती हुई सर झटक ली और खुद को कोसने लगी कि छिः, किसके साथ तू अपनी जवानी मसलवाने चल दी पुष्पा... उन दो टके के चोरों से जो डर से छुपे फिरते हैं...

पर वो थोड़ी गरम भी हो गई थी और उसकी प्यास बढ़ती ही जा रही थी तो उसने किसी और के संग करने की सोची... हाँ मेरे कॉलेज को वो लड़का कितना हैंडसम है...उसके पीछे तो ना जाने कितनी लड़किया मंडराती रहती थी पर वो किसी को घास तक नहीं डालता था..और उसकी वजह सिर्फ वो खुद पुष्पा थी...

खैर वो कॉलेज की बात है... अभी तो फिलहाल मुझे अच्छी नींद मंगवानी है बस... वो उसी लड़के को जेहन में रख आंखें बंद की और फिर अंदर की बात सुनने लगी... उफ्फ्फ्फ... अदर से तो अब रिंकी और डॉली चीख रही थी और गालियां बकती हुई और चोदने की बात कह रही थी... पुष्पा अपनी कान पर यकीं नहीं कर रही थी कि कोई लड़की ऐसे कैसे कह सकती है...

वो और रोमांचित हो गई और अनायास ही उसके हाथ शार्ट्स के नीचे चूत तक चली गई और उसे आहिस्ते आहिस्ते मसलने लगी... वो जल्द ही मदहोशी में डूब गई और अपने होंठों को चबाती हुई तड़पने लगी... इस तड़प ने उसे जल्द ही चुचियों से भी नंगी कर दी और वो एक हाथ से अपनी चुची को बारी बारी रगड़ रही थी जबकि दूसरी हाथ बूर को शांत करने में लगी थी...

दो मिनट में ही जवानी की स्वाद कैसी होती है जानने वाली पुष्पा चरम सुख के करीब पहुँच गई और वो थोड़ी हट के दीवाल के सहारे हो ली और कसमसाती हुई जोर जोर खुद पर सितम बरपाने लगी... उसकी साँस उखड़ने लग गई थी और आंखों से हल्की नमी उभरने लगी थी चरम सुख की निकटता को देख...

और वो पल आ ही गई जब पुष्पा अपनी जिंदगी की पहली चरम सुख प्राप्त की... वो चीखती हुई थड़थड़ाती हुई धम्म से नीचे बैठ गई और अपनी बूर से पानी की बौछारें शुरू कर दी... वो उपर की तरफ मुँह किए हाणफ रही थी और पानी फर्श पर बिखेड़ी जा रही थी... उसकी हाथ पूरी भींग चुकी थी पर वो अभी भी हटाई नहीं थी...

कुछ पलों बाद जब वो शांत हुई तो कुछ देर यूं ही पड़ी रही...फिर जब उसे याद आई कि वो कहां है तो स्प्रिंग माफिक जम्प करती खड़ी हो गई और वो तुरंत अपने कान गेट पर लगा दी... ये क्या अंदर बिल्कुल शांत था बस सबकी तेज साँसें सुनाई पड़ रही थी... वो अब वहां रूकने की सोच भी नहीं सकती थी... उसके कदम अपने रूम की तरफ बढ़ा
रूख कर ली...

रूम में घुसते ही वो बाथरूम में घुस फ्रेश हो ली... फिर बिस्तर पर आ पसर ली और कुछ देर पहले की हरकत को याद करने लगी... सारा वाक्या नजरों के सामने घूमने लग गई जिससे वो खुद ही शर्मा गई और मुस्कुरा कर अपने मुँह तकिये में औंध कस के भींच ली... वो इसी अवस्था में ही नींद की आगोश में भी पहुंच गई...

सुबह गेट पर हो रही तेज नॉक से वो हड़बड़ा कर उठ कर बैठ गई... बाहर रिंकी बार बार पुष्पा-पुष्पा कह कर उसे जगा रही थी... उसने दीवाल घड़ी पर नजर डाली तो 9 बज रहे थे... वो अपने कपड़े की सही करती हुई "आ रही हूँ.." कहती हुई बेड से उतर गेट की तरफ बढ़ गई...

आँख मलते हुए गेट खोली तो सामने रिंकी और डॉली दोनों खड़ी थी जबकि उससे कुछ फासले पर खड़ा कालिया था... इन दोनों की तो सही थी पर कालिया पर नजर पड़ते ही वो पहले तो अवाक् रह गई...वो मुँह और आंखें एक साथ फाड़े उसे देखे जा रहा था...तभी उसे अपने ड्रेस पर ध्यान चली गई... ओहहह..तो ये बात है... जनाब ये भी मुझे देख हैरान रह गए...

फिर वो शरारत से हल्की मुस्कान बिखेड़ दी और वो सब पर एक नजर डाल पीछे मुड़ वापस बाथरूम की तरफ चल दी... पीछे पीछे रिंकी बोलती हुई घुस गई,"क्या मैडम जी, रात भर मेहनत हम सब किए और नींद आपकी नहीं खुल रही... इसकी वजह जान सकती हूँ..."

रिंकी की बात सुन पुष्पा बिना कुछ बोले सिर्फ मुस्कुरा कर रह गई और बाथरूम में घुस अंदर से लॉक हो गई... बाहर कालिया खड़ा मूक बना उसी तरह खड़ा था जैसे पुष्पा को देखा था इस ड्रेस में... अंदर जब दोनों लड़की चेयर पर जा के पसर गई तो उनकी नजर कालिया पर गई, जिससे दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ी...

तेज हंसी की गूंज से कालिया की तंगभद्रा टूट तो वो झेंप सा गया और आगे बढ़ उन दोनों लड़की के समीप मुस्कुराते हुए जा बेड पर पसर गया...
रिंकी,"क्या हुआ आपको..? आप ऐसे मुँह बना कर क्यों खड़े थे जनाब..." रिंकी कालिया की तरफ देख कर अपने दोनों हाथ गालों पर रख नीचे बेड पर केहुनी टिकाती हुई पूछी... कालिया उसकी बात सुन अपना चेहरा ठीक रिंकी के पास सोए हुए ही लाता हुआ बोला...

कालिया,"यार, सच कहूं तो मैं इसकी सुंदरता का दिवाना तो था ही पर अब इसे ऐसे कपड़ों में देख मैं पागल हो रहा हूँ...उफ्फ्फ्फ... क्या गजब की लगती है... हाय..." और फिर कालिया किसी मजनूं की तरह पुष्पा की हर एक अंगों ढ़ेरों व्याख्यां करनी शुरू कर दी...

रिंकी और डॉली तो सुन के हंस हंस के लोट पोट हो रही थी... वो जानती थी कि सच में अगर पुष्पा ऐसे कपड़ो में बाहर गई तो ना जाने कितने लड़के मजनूं बन जाएंगें.... और उधर इन दोनों के साथ पुष्पा भी अपनी तारीफ कान लगा कर सुन रही थी...

कालिया ये भूल ही गया था कि पुष्पा इसी रूम के बाथरूम में है... कालिया बिना वॉल्यूम डॉउन किए; बके जा रहा था... पुष्पा को गुस्सा आता पर कालिया उसकी तारीफ कर रहा था तो वो अपनी तारीफ सुन मंद मंद मुस्कुरा रही थी तो कभी कुछ तारीफ सुन शर्मा भी रही थी...

कालिया अनलिमिटेड बोले जा रहा था... डॉली को जब ध्यान आया कि बाथरूम में पुष्पा इतनी देर से क्यों है तो वो रिंकी को धीरे से बोली... जिसे सुनते ही रिंकी तेजी से कालिया के मुंह पर हाथ रख तेजी से बोली,"पुष्पा अंदर सुन रही है और कहीं गुस्सा हो कुछ कर ली तो...."

कालिया सुनते ही चौंक पड़ा अपनी बेवकूफी पर साला अब तो गया... ये तीखी मिर्ची मेरी खैर ले लेगी अच्छी से... फिर कुछ सोचते हुए रिंकी के हाथ हटा बोला,"रहने दो, सच कह रहा हूँ तो गुस्सा होके क्या कर लेगी..." फिर कालिया के साथ रिंकी और डॉली भी पुष्पा के प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगी...

जबकि अंदर तो कुछ और ही चल रहा था... पुष्पा अपनी तारीफ सुन उसकी दिल की घंटियाँ बज चुकी थी... वो हैरान रह गई कि अचानक कालिया क्यों चुप हो गया... कुछ और कहे... इसका काम बुरा है पर दिल का अच्छा है... कोई छलकपट नहीं... वो छटपटा कर रह गई...

फिर करीब आधे घंटे बाद कामक्रिया से निपुण हो वो अपने चेहरे को नॉर्मल करती हुई गेट खोलती हुई ऐसे बाहर निकली जैसे कुछ सुनी ही ना हो... पुष्पा सरपट तीनों पर नजर डाली और आगे बढ़ दूसरी तरफ आइने के समीप जा बालों को सही करने लगी...कालिया मंत्रमुग्ध हो उसकी हर एक हरकत को अपनी आंखों में कैद किए जा रहा था...

पुष्पा,"मुझे कब पहुँचा रहे हो घर... मुझे घर जाना है..." पुष्पा बिना पीछे मुड़े कालिया से सवाल पूछ बैठी... कालिया उसकी बात से हड़बड़ा सा गया और मुस्कुराते हुए बोला,"तेरा बाप जब पैसा दे दे..." ये सुनते ही पुष्पा गुस्से से कालिया की तरफ पलटते हुए बोली..

पुष्पा,"कमीने तुम नहीं सुधरोगे..?" पुष्पा की हर बात कालिया को सुरीली ही सुनाई पड़ती थी.. वो अपनी गलती को स्वीकारते हुए बोला,"क्या करें.? चमड़े की जबान है,फिसल जाती है..." जिससे पुष्पा हल्की सी मुस्कान बिखेड़ कर वापस पलट गई...

पुष्पा,"अब पैसे किस चीज के.."
कालिया,"मैडम बात कुछ बिगड़ गई है... तेरा बाप मुझे जेल भेजने की कसम खा ली है तो जब जेल जानी ही है तो कुछ माल पानी का बंदोवस्त कर ही लेते हैं...ताकि बाहर आने में जो खर्च आएगा वो कहीं से लेना नहीं पड़ेगा...समझी."

पुष्पा उसकी फिरौती की बात सुन ठिठक सी गई... वो एकटक शांत हो आइने में खुद को देखने लगी पर इस मर्तबा उसके चेहरे पर उदासी साफ नजर आ रही थी... कुछ पल कमरे में खामोशी सी छा गई...

पुष्पा,"साले , गलती करो तुम लोग और कीमत उसकी हम अदा करें... मेरे पापा इमानदार एस.पी. हैं और कोई भी फिरौती देने के पक्ष में नहीं होंगे..."

कालिया,"नहीं देंगे तो तुम भी नहीं जाओगी.."

पुष्पा गुस्से में पैर पटकती हुई कालिया के पास पहुँची और उसके कॉलर पकड़ती हुई बोली,"मैं तो जाऊंगी ही और साथ ही तुम्हें भी नहीं छोड़ूंगी..." और फिर कॉलर छोड़ कालिया को पीछे की तरफ धकेल दी... ये तेवर देख रिंकी और डॉली तो अवाक रह गए पर कालिया इन सब से थोड़ी बहुत परिचित था तो वो हंस पड़ा...

कालिया खुद को संभाल बेड से खड़ा हुआ और एक ही झटके में अपने हाथ आगे बढ़ा पुष्पा की कमर पर रख अपने से चिपका लिया... पुष्पा के मुख से हल्की चीख निकल पड़ी पर इस चीख में दर्द कम मस्ती ज्यादा झलक रही थी... पुष्पा मर्द स्पर्श पाते ही सिहर गई... वो छूटने की कोशिश ना कर कालिया की आँखों में झांकने लगी...

कालिया,"जैसा बाप,वैसी बेटा... कान खोल के सुन ले अगर तेरा बाप पैसे नहीं दिया तो मैं भी तुम्हें नहीं पहुंचाने वाला... और तुम अगर ज्यादा दिमाग लगाने की कोशिश की तो यहाँ या तो जंगली जानवर तुम्हें नोंच डालेंगे या फिर जंगल में फैले रत्ना के आदमी... सोच लेना.."

पुष्पा उसकी बात सुन डर से कांप गई और बूत बनी अपनी आंसूं को रोकनी कि कोशिश करने लगी... कालिया उसे ऐसे देख एक बार फिर भावुक हो परेशान हो गया और खुद को मन ही मन गालियां देने लगा... वो परेशान हो पुष्पा को समझाने की कोशिश करने लगा...

कालिया,"हे पुष्पा..तुम भी ना... अरे मैं तो यूं ही कह रहा था.... रोना नहीं..पुष्पा..." कालिया अब दोनों हाथों से उसके चेहरे को पकड़ अपनी तरफ कर बोले जा रहा था पर पुष्पा की आंखों से जख्म निकल रही थी शांति से...

कालिया,"ओके,ओके... मैं दो दिन तक देख लेता हूँ... पैसे मिले या ना मिले पर तुम्हें पक्का वापस शहर छोड़ आऊंगा..अब खुश.. हे तुम रोती बिल्कुल अच्छी नहीं लगती हो...अब चुप हो जाओ.."

पुष्पा बिना आंसू पोंछे कालिया की आंखों में झांकने लगी...कालिया उसे अपनी तरफ देख फिर से प्रॉमिस पर प्रॉमिस करने लगा... जिसे वो बस सुने जा रही थी... जब पुष्पा काफी देर तक कुछ नहीं बोली तो कालिया भी चुप हो गया और उसकी आँखों में देखने लगा...

दोनों की नजरें आपस में रंगरलियां मनाने लगी... तब से कालिया समझ रहा था कि वो तो बस यूँ ही देख रही थी पर जब उसकी आंखों की गहराई में उतर के देखा तो अंदर ढ़ेर सारा प्यार ही प्यार था... बुरा ही सही पर पुष्पा ने पढ़ ली थी कि वो उसे कितना चाहता है... उसकी आंखों में एक बूंद भी आंसूं वो देखना नहीं चाहता था...

एक बारगी तो वो सोच भी ली थी कि इस कमजोरी से वो यूं घर जा सकती है पर उसके बाद उसे ये कभी मिल पाएगा... इतना केयर करने वाला कभी मिल पाएगा... जो एक बूंद आंसू पर भी परेशान हो जाता है... दोनों बेफिक्र हो खड़े थे...कमरे में रिंकी और डॉली भी है वो शायद भूल ही गई थी.... अभी तक इस प्यार की पहल किसी ने नहीं की थी... इतनी हरी झंडी पर तो अंधा भी इजहार कर देता पर ये तो..................!!!!!!!
कुछ देर तक दोनों यूँ ही खड़े रहे... फिर कालिया ने कुछ सोच बिना नजर हटाए अपने हाथ से रिंकी और डॉली को बाहर जाने का इशारा किया... इशारा मिलते ही दोनों मुस्कुराती हुई बाहर निकल गई... ये बात पुष्पा को मालूम भी नहीं पड़ी...

फिर कालिया ने थोड़ा और निकट अपने चेहरे को कर लिया... अब पुष्पा के होंठ बिल्कुल कालिया के होंठ के समीप हो गई... अब तक पुष्पा बस कालिया को देखे जा रही थी... तभी कालिया आहिस्ते सेबोला,"मैडम, आप रात में बाहर क्या कर रही थी.."

कालिया की आवाज कानों में पड़ते ही पुष्पा आश्चर्य से भर गई... अब भी वो कालिया को घूर रही थी पर अब परेशानी से लबालब नजरें थी... वो जवाब देना चाहती थी पर क्या, ये नहीं सूझ रही थी... और कुछ ही पल में पुनः सूख रहे आंसूं के रास्ते फिर से भरने लगी...

कालिया इस बार बिना चुप कराए अपने सर को पुष्पा के सर से सटाते हुए बोला,"हे... ये क्या बात हुई... तुम्हें हंसना भी आता है या नहीं... मैं तो यूं ही पूछ रहा था... और इसमें रोने की क्या बात है... चढ़ती जवानी में ये सब नहीं होगी तो क्या बुढ़ापे में होगी..."

"पर हाँ, तुम रूम में भी तो कर सकती थी... अगर मेरी जगह कोई और होता तो पता है क्या होता?" कालिया मुस्कुराते हुए बिल्कुल अपनेपन की भाव से बोले जा रहा था... पुष्पा खुद पर काफी गुस्से हो रही थी कि मैं क्यों इतनी एक ही दिन में बहक गई...

"कोई और लड़की होती ना तो मैं भी नहीं मानता उस वक्त और बजा डालता पर तुम.... तुमसे मुझे प्यार हो गया है तो मैं सोच भी नहीं सकता... "कालिया कहते कहते भावुक सा हो गया... पुष्पा उसकी बात से बुत से बन कर रह गई... ये क्या सुन रही हूँ...

कालिया अपने दिल की बात तो कह दिया था पर पुष्पा क्या सोचेगी ये वो सोचा ही नहीं था... क्या पुष्पा ऐसे रिश्तो को कबूल कर सकेगी... अचानक कालिया का दिमाग ऐसे ही सवालों से भर गया... वो तो अभी तक सिर्फ दिल की सुन रहा था, दिमाग से तो कुछ सोचा ही नहीं था...

वो कुछ ही देर में बौखला सा गया और सर को झुंझलाते हुए तुरंत ही पुष्पा को छोड़ एक कदम पीछे हट गया... और किसी तरह अपने पर काबू पाते हुए बोला,"मैडम जी, हमें माफ कर देना... पता नहीं क्या से क्या बोल दिया... मैं आपके साथ तो पहचान वाले लायक भी नहीं हूँ तो ये दोस्ती,प्यार तो दूर है..."

कालिया,"मेरी तो चांदी निकल जाएगी पर आप.... आप की इज्जत,मान-मर्यादा का तो तबाड़ा हो जाएगा... कहां पढ़ी लिखी, सुंदर, नेकदिल और पता नहीं क्या-क्या हो आप पर मैं साला अनपढ़, गंवार, चोर वगैरह वगैरह..." कालिया इसी तरह ढ़ेर सारी बातें कहता चला जा रहा था और पुष्पा बस सुनी जा रही थी...

अंततः कालिया का दिल काम नहीं कर सका और वो सिसक गया... उसने हाथों से एक बारगी अपने आंसू पोंछे और तेज कदमों से बाबर निकल गया... पुष्पा उसे जाते हुए देखती रही... इस वक्त तो इसकी दिल दिमाग कुछ काम ही नहीं कर रही थी...

उसके जाते ही पुष्पा धम्म से बेड पर बैठ गई और गहरी सोच में डूब कालिया की बात याद करने लगी... कुछ देर बाद रिंकी भी वापस आ गई और पुष्पा को ऐसे सोच में देख चुपचाप उसके बगल में आ बैठ गई... कुछ देर बाद वो धीरे से बोली,"पुष्पा, स्नान कर लो, फिर मैं खाना लाती हूँ..."

पुष्पा उसकी बात सुन गहरी सोच से बाहर आई और बोली,"भूख नहीं है..." पुष्पा की बात सुन रिंकी ज्यादा बहस करना मुनासिब नहीं समझी और बोली,"ओके तोकम से कम नहा कर फ्रेश हो लो...चलो उठो..." ऱिंकी की बात पर कोई जवाब दिए बिना वो अपने कपड़े ले बाथरूम में घुस गई... उसके दिमाग में कौतूहल मची हुई थी...

उधर शहर में एस.पी. जब फिरौती कीबात सुनी तो उसका पारा चढ़ सा गया... वो बिना किसी परवाह के साफ मुकर गया और बोला जो करना है कर ले, मैं एक पैसे भी नहीं देने वाला... और मेरी बेटी को कुछ हुआ तो तुम सब को नहीं बख्सूंगा... एक एक कर जिंदा गाड़ दूंगा...

कालिया उसकी बात सुन मुस्कुराए बिना रह नहीं सका... रत्ना कुछ कहना चाहता था जब उसे याद आया कि ये तो उसके प्यार में पड़ गया है तो कुछ भी बोलूंगा ये सुनेगा ही नहीं... रत्ना चुप रह कालिया की बस हरकत को देखता रहा... कालिया रूम से बाहर निकल एक कुर्सी पर पसरकर आंखें बंद कर सोच में पड़ गया...पर ये सोच उसके प्यार की थी...

अंदर करीब एक घंटे बाद पुष्पा नहा कर बाहर निकली... रिंकी अभी भी बैठी थी... वो भी रिंकी के बगल में बैठ गई... रिंकी ने पुष्पा को उसी तरह सोच में देख बोली,"क्या हुआ? कालिया कुछ उल्टा पुल्टा बोले हैं क्या?" पुष्पा रिंकी की बात सुन फफक पड़ी... रिंकी उसे गले से लगा बात को जानने की कोशिश करने लगी...

पुष्पा कुछ बाद चुप हुई और कालिया की बात को कह डाली...बस एक बात कह ना सकी वो थी रात में अपनी जिस्म की गरमी शांत करने वाली बात... रिंकी एक अच्छे दोस्त की तरह हर शब्द को गौर से सुनने लगी... और सारी बात सुनने के बाद रिंकी,"हम्म्म्म... तो जनाब को इश्क हो गया...तो तुम अभी किसी बात का जवाब मत देना वर्ना ये साले लोग अपनी हार बर्दाश्त नहीं करना जानते... तुम पर जुल्म या दरिंदगी भी कर सकते हैं...ठीक है...अगर जबरदस्ती करे तो मुझे कहना मैं संभाल लूंगी..."

रिंकी की बात सुन पुष्पा थैंक्स कहती हुई उसके गले लग गई... पर सच्चाई तो ये थी कि पुष्पा अभी तक खुद सोच नहीं पाई थी कि वो क्या करे...? उसके अंदर कालिया के प्रति प्यार भी थी और वैर भी... रिंकी की बात को ही मान ली ताकि उसे सोचने के लिए वक्त भी मिल गई...

रिंकी उसके मूड को बदलने के लिए बोली,"जानू,टॉफी खाएगी...?" रिंकी की बात सुन पुष्पा रिंकी से अलग होती हुई रिंकी की ओर देखती हुई हां में सर हिला दी... रिंकी अपने मुंह में रखी टॉफी दांतों तले दबा दिखाती हुई लेने का इशारा की... पुष्पा टॉफी देखते ही मुस्कुरा पड़ी और अपने हाथ बढ़ा रिंकी की बांह पकड़ी और बेड पर लेट गई...

पुष्पा नीचे लेटी थी और रिंकी ऊपर .... दोनों के चुची आपस में भिड़ चुके थे... दोनों मुस्कुरा रही थी... अगले ही पल पुष्पा रिंकीके सर को पकड़ हौले से अपनी तरफ दबा दी जिससे रिंकी के होंठ अगले ही पल पुष्पा के होंठों से चिपक गई और फिर बारी बारी से दोनों एक ही टॉफी अपने मुंह में डाल के चूसने लगी और तब तक चूसती रही जब तक टॉफी खत्म नहीं हो गई...
इसी तरह चलती रही मस्ती दोनों की... कालिया अब रिंकी या डॉली में से किसी के पास नहीं जाता था... जब भी दोनों रत्ना के पास जाती तो कालिया बाहर निकल जाता और पुष्पा से कुछ कुछ बातें करता...पर प्यार-व्यार की बातें कभी कोई बात नहीं होती थी... पुष्पा भी धीरे धीरे नॉर्मल हो गई शायद वो भी यही चाहती थी...

एक दिन दोपहर के वक्त पुष्पा बाहर ही खड़ी रिंकी से बात कर रही थी... उसी वक्त रत्ना रिंकी को आवाज दिया... पुष्पा बात को समझ रिंकी की तरफ देख मुस्कुरा दी... रिंकी "आ रही हूँ " कह चली गई... पुष्पा जान गई कि अब कालिया बाहर आएगा...

कालिया अगले ही पल पुष्पा के बगल में था... पुष्पा उसकी तरफ देख हल्की मुस्कुरा दी और पूछी,"अब मन नहीं करता क्या.." कालिया उसकी बात सुन हंस पड़ा और बोला,"करेगा क्यों नहीं... पर... छोड़ो ये सब वर्ना कहीं मैं फिर से बहक गया तो तुम बेकार की नाराज हो जाओगी..."

पुष्पा के दिल में एक टीस सी उठ पड़ी... वो सुनना चाहती थी शायद वो भी चाहने लगी थी कालिया को पर हिम्मत नहीं होती थी कहने की...कह भी दी तो पता नहीं क्या सोचेगा... वो कालिया की तरफ देख वापस सामने की तरफ मुड़ गई...

कालिया,"अच्छा, तुम अब भी बाहर ही करती हो या अंदर...."कालिया को पता नहीं क्या सूझा वो उस रात वाली बात को छेड़ दिया... पुष्पा शर्म से लाल हो गई पर नाराज नहीं हुई... वो मंद मंद मुस्कुरा कर दूसरी तरफ मुंह फेर ली... कालिया उसके ऐसे बर्ताव से खुश हो गया और एक बार फिर बोलने कह दिया...

पुष्पा दूसरी तरफ मुंह करती हुई ही बोली,"...अब देखने की कोशिश नहीं करते क्या." पुष्पा की बात सुनते ही कालिया चहकते हुए बोला,"ओए, मैं उस दिन भी देखने नहीं निकला था... वो तो थोड़ा रिलैक्स होने के लिए बाहल निकल रहा था कि तुम दिख गई और मैं दबे पांव वापस हो गया... रत्ना तो बेहोश सा सो गया वर्ना उसे शक जरूर होता कि मैं बाहर क्यों नहीं गया..."

पुष्पा उसकी बात सुन के मुस्कुरा रही थी..कालिया आगे बोला,"कसम से उस दिन तुम्हें देख के तो मेरा मूड खराब हो गया था और मन तो किया कि तुम्हें यहीं पर..." कहते कहते कालिया अपने शब्दों को आधा ही बोल रूक गया जिसे पुष्पा अच्छी तरह समझ चुकी थी और वो कालिया की तरफ पलट गई...

कालिया उसे अपनी तरफ देख थोड़ा नर्वस हुआ पर गुस्से में ना देख तुरंत ही बोल पड़ा,"सच्ची कह रहा..अगर तुम्हारी जगह कोई और रहती ना तो मैं छोड़ने वाला नहीं था..." कालिया की बात सुनते ही पुष्पा शरारत से आँख नचाती हुई हौले से बोली....

पुष्पा,"..तुम्हारी कोई दीदी रहती तो भी..." और ये कहते ही पुष्पा खिलखिलाती हुई अंदर रूम की तरफ भाग ली... कालिया जब उसकी बात समझा तो आश्चर्य से देखा और उसकी इस शरारत पर उसे मारने के लिए मुक्का बना उसके पीछे दौड़ पड़ा...

पुष्पा उसे अपने पीछे आते देख हंसती हुई बोली,"..मजाक कर रही थी..." और वोरूम की तरफ भागने लगी... कालिया बात को सुना तो पर रूके बिना उसकी तरफ उसकी तरफ बढ़ता गया...गेट के अंदर जा जब तक पुष्पा गेट बंद करती तब तक कालिया उसके निकट पहुँच गेट को पकड़ लिया...

पुष्पा के लिए गेट लॉक करना नामुमकिन थी...वो उसे छोड़ अंदर बाथरूम की ओर भागी... कालिया ये देख तेजी से उसके पीछे भागा और जब तक पुष्पा बाथरूम तक पहुँचती उससे पहले ही कालिया उसकी बांह पकड़ खींच लिया... और पुष्पाके दोनों हाथ पकड़ उसे पीछे की तरफ धकेल दीवाल से चिपका दिया और उसके दोनों हाथ ऊपर कर बोला...

कालिया,"अब बोल, क्या बोल रही थी..."

पुष्पा हंसी जा रही थी...फिर अपनी हंसी पर काबू करती हुई बोली,".मजाक कर रही थी.. तुम बोले ना कि कोई भी तो मैं पूछ ली..."अपनी बात कहती हुई पुष्पा पुनः हंस पड़ी...कालिया भी उसकी बात सुन हंस पड़ा और हंसते हुए बोला,"अच्छा, तो और कुछ नहीं मिला पूछने को..."

पुष्पा हंसते हुए ना में सर हिला दी...कालिया पुष्पा की इस खुशी और ऐसे चिपके रहने के बाद भी कितनी नॉर्मल लग रही थी ये सोच वो खुद दंग रह गया... कालिया अब थोड़ा और जोर से चिपक गया जिससे पुष्पा पूरी तरह दब गई थी... वो अब हिल भी नहीं पा रही थी...बस हंसी जा रही थी...

कालिया उसकी हंसी से और कुछ सवाल किए बिना बस उसकी तरफ देखने लगा... मोती जैसे दांतों को निहार रहा था...कुछ देर तक हंसने के बाद थोड़ी शांत हुई तो कालिया को अपनी तरफ देख वो अपनी भौंहे ऊपर की तरफ उचका दी... जिसके जवाब में कालिया ना में सर हिला दिया...

पुष्पा को अचानक नीचे नाभी के पास कुछ गड़ती हुई फील हुई... वो नीेचे की तरफ देखी और देखते ही समझ गई कि वो क्या है... वो शर्मों-ह्या से लालें-लाल हो गई... फिर अपनी नजर ऊपर करती हुई अपनी कलाई छुड़ाने के लिओ जोर लगाती हुई कसमसाने लगी... जिसे देख कालिया हँस पड़ा...

कालिया को हँसते हुए पुष्पा पछतावे और परेशानी में बोली,"उफ्फ्फ्फ... प्लीज छोड़ो ना...हाथ दुख रही है..."उसकी बात सुन कालिया बिना किसी हरकत के बस मुस्कुराता रहा... पुष्पा एक बार फिर छोड़ने बोली तो कालिया ना में सर हिला दिया...पुष्पा अब सिर्फ मुंह से छोड़ने कह रही थी जबकि उसकी अंतर्आत्मा तनिक भी छूटने की नहीं कह रही थी...

पुष्पा,"...तो फिर से बोलने लगूँगी नहीं तो छोड़ो..." उसकी आवाज में हंसी और शर्म दोनों घुली हुई थी... जिसे सुन कालिया बोला,"अब मार भी खाओगी..."

पुष्पा,"नहीं छोड़े तो मैं बोलूंगी ही..." पुष्पा और कालिया दोनों के होंठ अब बिल्कुल ही पास आ गए थे बस कुछ ही इंच की दूरी रह गई थी... इस वजह से दोनों की साँसे आपस में टकरा रही थी... कालिया पुष्पा की इस तरह की हरकत से काफी हद तक समझ गया था कि इसके अंदर भी कुछ चल रही है वर्ना अब तक तो किसी तरह छूट ही जाती...

पुष्पा मुस्कुराती हुई रही पर कुछ बोली नहीं... दोनों के अंदर ढ़ेर सारी कौतूहल हलचल मचा रही थी... इसी कौतूहल में दोनों के होंठ कुछ ही पलों में आपस में सट गई... कालिया का तो होश ही उड़ गया... इतनी रसीली और कामुक होंठ जो सिर्फ छुअन भर से सिहर गया...पुष्पा उफ्फ्फ करती हुई अपनी होंठ पीछे कर दूसरी तरफ मुँह कर ली और लम्बी लम्बी सांसे लेने लग गई... मर्द की पहली छुअन उसे करंट जैसी लगी...

कालिया तुरंत होश में आया और उसके होंठ का पीछा अपने होंठों से करने लगा...मंजिल तक पहुँचते ही कालिया अपने होंठ से उसके पकड़ने की कोशिश की पर पुष्पा छिप ली... दो तीन बार की कोशिश में वो होंठों के साइड की थोड़ी सी भाग पकड़ में आ गई जिसे पकड़ कालिया अपनी तरफ खींचा...

पुष्पा अब ज्यादा सहन नहीं कर पा रही थी जिससे वो कालिया के साथ हो ली और वो जिधर चाहता था उधर कर दी...और कालिया बिना कोई पल गंवाए हल्की पकड़ को पूरी पकड़ में तब्दील कर दिया...कालिया के इस प्रहार से पुष्पा बिखर सी गई और बेजान सी दीवाल में सर सटा कर शांत हो गई... जबकि कालिया कालिया हौले हौले उसके होंठो का रसपान करने लगा...
कालिया खुद को किसी जन्नत में पहुँच गया था... इतनी रसभरी,इतनी गर्म, इतनी मिठास सब तरह की स्वाद मिल रही थी पुष्पा के होंठो से... पुष्पा नई नवेली थी इस खेल में तो वो जल्द ही झड़ने के कगार पर पहुँच गई... वो इतनी उत्तेजित हो गई थी कि तड़प उठी और सुबकने लगी... कालिया ये देखते ही उसके दोनों हाथ को आजाद कर दिया...

हाथ आजाद होते ही पुष्पा सहारे के लिए कालिया के कंधे पर हाथ रख दी... उसके पांव थरथराने लगे थे... अचानक पुष्पा बिजली की तरह उछली और दोनों हाथों से कालिया के गर्दन जकड़ ली... और उत्तेजनावश उसने अपने दांत कालिया के होठों पर गड़ा दी...

पुष्पा झड़ रही थी... उसकी बूर से पानी निकल पेन्टी को भिंगो रही थी... होठों के दर्द से कालिया तड़प सा गया पर वो थोड़ा विचलित नहीं हुआ... उसके होठों से खून निकल कर बाहर की तरफ बहने लगी थी... जब तक पुष्पा झड़ी तब तक वो यूँ ही हरदर्द को सह पुष्पा को थामे हुआ था...

पुष्पा पूरी तरह जब झड़ गई तो वो निढ़ाल हो कालिया के बाहों में झूल गई... कालिया हर गम को भुला खुशी से उसे कस के थामा और गोद में उठा लिया... पुष्पा के होंठ भी खून से रंग गए थे... वो अपनी आँखें बंद किए कालिया की पीठ पर हल्की पकड़ बना दी ताकि कालिया को कुछ सपोर्ट मिले...

कालिया उसे ले आहिस्ते से बेड पर सुला दिया मानों कोई टूटने वाली चीज हो... पुष्पा मुस्कुरा रही थी और आराम से लेट गई... पुष्पा को लिटाते ही कालिया भीउसकी बगल में लेट गया और अपने आधे शरीर से उसे ढ़क दिया... फिर उसे गौर से निहारने लगा और साथ ही मुस्कुरा भी रहा था....

वो अपनी खुशी को छुपा नहीं पा रहा था और खुशी से उसके आँखें भी नम हो गई थी... पहली बार किसी से प्यार हुआ था और वो प्यार आज उसकी बांहों में थी... ऐसे किस्मत किसी किसी को ही नसीब होती है...पुष्पा की भी खुशी उसके चेहरे से साफ झलक रही थी...

अगले ही पल कालिया नीचे झुका और पुनः पुष्पा के होठों से अपने होंठ मिला दिए.... खून से भरी दोनों के होंठ एक बार भिड़ गए... इस बार पुष्पा भी सहयोग दे रही थी... ना जाने कब तक करते रहे दोनों... आखिर में जब किस टूटी तो कालिया के होंठ से खून बंद हो गई थी और दोनों के होंठ पर से भी सभी रक्त गायब...

दोनों काफी थक चुके थे... थकान की वजह से कालिया पुष्पा के बगल में ही पसर गया... दोनों तेज तेज सांसें ले रहे थे जो पूरे कमरे में गूंज रही थी... करीब दस मिनट तक दोनों यूँ ही पड़े रहे... फिर कालिया अपनी आँख खोली तो पुष्पा अभी आँखें बंद की हुई थी...

कालिया अपनी एक उंगली बढ़ा पुष्पा के गालों पर छुआते हुए हल्के से सरकाने लगा... उसकी उंगली आगे बढ़ पुष्पा के नाजुक होठों पर रेंगते हुए नीचे की तरफ बढ़ने लगा... पुष्पा उंगली की दिशा से विचलित हो कसमसाने लगी... उंगली उरेजों पर जैसे ही पहुँची पुष्पा लपक के कालिया की उंगली पकड़ ली...

कालिया अपनी उंगली रूकते देख अपने होंठो को आगे कर दोनों चुचियों की घाटी तक पहुंचा चिपका दिया... पुष्पा कराह उठी और वो कालिया के बाल को पकड़ कर सुबकती हुई बोली,"प्लीज्ज्जऽ" कालिया समझ गया कि झड़ने के बाद ये पुनः गरम हो चुकी है...

कालिया मुस्काराता हुआ अपने सर को ऊपर कर ऊपर की तरफ सरक के पुष्पा के गालों को चूमते हुए बोला,"पुष्पा, मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूँ...और मैं अब वादा करता हूँ कि आगे से मैं ये प्यार तुम्हारे सिवा किसी से नहीं बाटूंगा..." पुष्पा उसकी बात सुन हल्के से अपनी आँखें खोली...

पुष्पा तिरछी नजरों से देखी तो कालिया औंधें मुँह उसकी जुल्फों में अपना सर छिपाए हुए था... पुष्पा अपने कांपते हाथ बढ़ा हल्के से उसके सर पर रख सहलाने लगी... कालिया जिस जवाब के लिए अपनी बात बोला, उसका जवाब पुष्पा ने इशारों में कह दी...कालिया पुष्पा के हाथों से सुनहरे सपनों में खो गया...

अचानक कालिया अपना सर ऊपर किया और पुष्पा को देखने लगा... पुष्पा अब कालिया से नजर नहीं मिला पा रही थी... पर इस वक्त कालिया के अचानक उठने से वो मुंह छिपाती उससे पहले ही कालिया अपने दोनों हाथ से उसके चेहरे को पकड़ कर सामने कर रखा... विवशतापूर्ण पुष्पा मुस्कुरा कर कालिया की आँखों में आंखें डाल दी...

कालिया,"पुष्पा, क्या खाती हो जो तुम्हारे होंठ इतने मीठे,रसीलें और पता नहीं क्या क्या कहते हैं; वही हैं... पल पल इसकी स्वाद बदलती रहती है और हर स्वाद में एक अलग ही नशा होती है..."

पुष्पा आश्चर्य से कालिया की तरफ देखती हुई मुस्कुराती हुई बोली,"कुछ स्पेशल पर तुमकों नहीं बता सकती..." पुष्पा के बोलते ही कालिया तुरंत ही "क्यों.." कहते हुए सवाल कर दिया...

पुष्पा,"क्यों बताऊं, खाने को मिल रही है तो बस खाने से मतलब रखो... पेड़ मत गिना करो.." पुष्पा इठलाती हुई कालिया को जवाब दी जिसे सुनते ही कालिया दांत पीसते हुए बोला,"शाली, अभी बताता हूँ तुम्हें..." कालिया कहते हुए पुनः पुष्पा के गालों से होता हुआ गर्दन पर टूट पड़ा जिससे पुष्पा खिलखिला कर हंसती हुई बोली...

"ऐ गाली नहीं , नहीं तो सर फोड़ दूँगी..."पुष्पा उसके बाल पकड़ उसे रोकती हुई बोली... जिससे कालिया हंसे बिना नहीं रह सका...

तभी गेट पर आहट हुई... दोनों एक साथ उधर नजर दौड़ाए तो "ओहहह शिट्ट्ट.." मस्ती के चक्कर में गेट खुली ही रह गई...हड़बड़ा कर जब तक दोनों अलग होते तब तक तो रिंकी अंदर आ चुकी थी और दोनों को ऐसे देख आश्चर्य भरी नजरों से देखने की कोशिश करने लगी... क्योंकि उसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रही थी...
रिंकी कुछ ही देर में सारा माजरा समझ गई... और वो अपने पूरे शरीर को सांप की तरह टेढ़ी मेढ़ी करती मुस्कुराते हुई हौले से पुष्पा की तरफ बढ़ने लगी... कालिया भी शर्म से भर गया था... वो उठा और रिंकी की तरफ मुक्का दिखाते हुए बाहर निकल गया....

कालिया के जाते ही रिंकी बेड पर जम्प लगाती हुई पुष्पा को दबोच लुढ़क गई जो कि दूसरी तरफ मुंह किए मुस्कुरा रही थी... रिंकी हंसती ढ़ेर सारे सवाल पूछने लगी पर पुष्पा बस मुस्कुराती रही मुंह छिपाती हुई... कोई जवाब ना पा रिंकी कुछ सोची और अपने होंठ पुष्पा के होंठ पर रख रसपान करने लगी...

कुछ ही पल में पुष्पा शर्म से थोड़े परे हुई तो रिंकी बस होंठ को छोड़ थोड़ी ऊपर हुई और पूछी,"क्यों मैडम, ये चक्कर है कोई या इसने जबरदस्ती की है..?" पुष्पा उसकी बात अपनी आँखें खोल जवाब दी,"आपको क्या लगता है.."

रिंकी,"आपके हाव-भाव से तो जबरदस्ती नहीं लगती है फिर भी आपसे सुनना चाहती हूँ... " जवाब देती हुई रिंकी मुस्कुरा पड़ी... पुष्पा भी उसकी बात सुन मुस्कुराए बिना ना रह सकी और बोली,"चक्कर....ऽ आई लव कालिया..." और पुष्पा अपनी आँखे शरारत से नचा दी...

रिंकी सुनते ही अपने एक हाथ से पुष्पा की एक चुची जकड़ी और जोर से रगड़ते हुए बोली,"साली लंड देखते ही मुझसे कट्टी कर ली... अब तो तू नहीं बचने वाली..." इस रगड़ से पुष्पा हिनहिना गई और उसकी गूँज पूरे कमरे में गूंज पड़ी पर रिंकी को अब कोई फिक्र नहीं थी...

पुष्पा,"उफ्फ्फ्फ.... प्लीज यार धीरे करो ना...काफी दर्द हो रही है... लग रहा कि फट के खून निकल जाएगी..." पुष्पा कराहती हुई बोली जिस पर रिंकी तपाक से बोली,"बेबी, अब तो ये दर्द बरदाश्त करना सीख लो... लंड वाले ऐसी चीख सुनते ही जोश से भर जाते हैं और तुम्हें और दर्द देंगे... समझी कुछ..."

पुष्पा उफ्फ्फ करती हुई बोली,"तुम कितना गंदा गंदा बोलती हो... " तभी से रिंकी अपनी दूसरी हाथ नीचे बढ़ा सलवार के ऊपर से ही पुष्पा की बूर पर रख दबाती हुई बोली,"लंड और बूर को उसके नाम से ना कहूँ तो क्या कहूँ..." पुष्पा रिंकी की इस हरकत से चिहुंक गई और तुरंत रिंकी के हाथ को हटाने की कोशिश की पर रिंकी के हाथ तो मानो जम गई हो...

कुछ देर तक दोनों बल प्रयोग करती रही... आखिरकार रिंकी बोली,"प्लीज यार,करने दे ना... लंड चख लेगी एक बार फिर तो हाथ लगेगी नहीं देगी और मैं भी जाने वाली हूँ कल..." रिंकी की बात सुनते ही पुष्पा शांत पड़ गई और उदास सी हो बोली,"फिर मैं कैसे रहूँगी अकेली..."

"क्यों, तुम्हारे मिस्टर साहब तो हैं ना... और अभी की तरह कोई डिस्टर्ब भी नहीं करेगा...24 घंटे पैक रहना..." रिंकी शरारत भरी शब्दों से पुष्पा की उदासी दूर करनी चाही पर कर ना पाई... पुष्पा अंदर से रो रही थी अपने इस नई दोस्त से बिछड़ने की सोच...

रिंकी पुष्पा को यूं देख धीरे से बोली,"हे... क्या हुआ... मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकती यार... मैं अपना नं० दे दूँगी... तुम घर जाते ही कॉल करना... मैं भागी आ जाऊंगी...प्रॉमिश.. अब ऐसे मुंह मत बनाओ और जल्दी से चटनी खिला दो..."

रिंकी की बात सुनते ही पुष्पा हल्की सी मुस्कुरा पड़ी और अगले ही पल उसकी बाँहे रिंकी के गर्दन को दबाती हुई अपनी तरफ खींच ली... पुष्पा की हिचक अब बस नाम मात्र की रह गई थी जिस वजह से बेड की चरमराहट साफ सुनाई दे रही थी...

कुछ देर तक किस करने के बाद रिंकी जबरदस्ती अलग हुई और पुष्पा के ऊपर से हट उसे उठाने लगी... पुष्पा रिंकी की तरफ कामुकता की नजरों से देखे जा रही थी... अगले ही पल रिंकी पुष्पा की कमर से उसकी ड्रेस (समीज) को ऊपर की तरफ उठाने लगी...

पुष्पा एक बार भी ना नुकुर ना की औरउसे निकालने दी... चंद मिनटों में ही पुष्पा सिर्फ ब्रॉ में बैठी बस रिंकी की आँखों में खोई थी... वो टॉपलेस में आज पहली बार किसी और के सामने हुई थी... अगर वो अपनी तरफ नजर करती तो शर्म से लाल हो जाती पर वो तो रिंकी को देखी जा रही थी...

फिर रिंकी बगल से सरक कर सीधे पैर कर बैठी पुष्पा के दोनो जांघो पर दोनों तरफ पैर कर बैठ गई और बैठने के साथ ही पुष्पा की पाजामी(सलवार) के नाड़े को खोल दी... और फिर पुष्पा की तरफ हल्की झुकती हुई अपने दोनों हाथ उसकी पीठ तक ले गई...

और पुष्पा के माथे को चूमती हुई ब्रॉ की हुक खोल दी... पुष्पा को मालूम हुई या नहीं पता नहीं... पर वो मस्ती में काफी डूबी लग रही थी... रिंकी पुष्पा को पीछे की तरफ धक्के दे दी जिससे पुष्पा धम्म से पीछे गिर पड़ी और साथ में रिंकी भी पुष्पा के ऊपर चादर बन कर सो गई...

रिंकी एक बार फिर पुष्पा को स्मूच करने लगी और पुष्पा भी लालायित हो खुद को रिंकी के हवाले कर चुकी थी.. दो मिनट के ही स्मूच के बाद रिंकीअपने होंठ को नीचे बढ़ाने लगी जहाँ उसके दोनों हाथ पुष्पा की दोनों चुचियों को ब्रॉ के ऊपर से ही ढ़के थी...हर किस हर बाइट पर पुष्पा रिंकी के सर को दबा कर सहलाने लग जाती....

रिंकी कुछ ही पलों में पुष्पा के उभारों को भिंगों रही थी... ऐसी सुडौल वक्ष देख रिंकी के मुंह से पानी खुद-ब-खुद बह रही थी...पुष्पा अब रिंकी को जोर से दबाती हुई "आहहहह...रिंकीईईई...और तेज चूसोऽ काट लो ना प्लीज.." पुष्पा की मादक आवाज सुनते ही रिंकी अगले ही पल हाथ से ब्रॉ को हाथों से खींच दी....

पुष्पा को नंगी चुची पर रिंकी के दांत महसूस होते ही कराह उठी...उसने रिंकी के सर को जोरों से जकड़ चुची पर दबा दी... ऐसा करते देख रिंकी अपनें मुंह में निप्पल घुसेड़ ली और हल्की दांत गड़ाते हुए खींचने लगी और दूसरी निप्पल को अंगूठे से मसलने लगी... पुष्पा तो हवा में उड़ने लगी... वो समझ ही नहीं पा रही थी क्या करूँ...

इतनी अधिक उत्तेजना में रिंकी को रोकना चाहती थी ताकि वो रिलैक्स हो पर शरीर रिंकी को अलग नहीं करने देती थी... इसी चुसम-चुसाई में पुष्पा अचानक से चीख पड़ी और रिंकी की पीठ को नोंचती हुई झड़ने लगी... नाखून के दर्द से रिंकी भी कराह उठी पर वो स्खलन से भली भांति वाकिफ थी तो वो समझ सकती थी पुष्पा की हालत...

झड़ने के पश्चात पुष्पा बेजान सी निढ़ाल हो हांफने लगी...रिंकी उसके चेहरे को अपने हाथों में थाम चुम्मी की बरसात कर दी... अचानक रिंकी की दिमाग कौंधी और वो झट से उठ गई...पुष्पा अभी भी आँखें बंद की बिना ब्रॉ की पड़ी थी.... चुची से ऊपर पूरी रिंकी की थूक से गीली थी जो चमक रही थी...

रिंकी तेजी से गेट तक आई और गेट लॉक कर दी जो कि खुली थी अब तक... गेट लॉक कर वापस आ बेड पर चढ़ी और अपनी ब्रा को खोल नीचे फेक दी...फिर अपनी चुची को दोनों हाथों से पकड़ किस की और मुस्कुराते हुए इस तरह लेटी कि उसकी चुची सीधी पुष्पा के मुंह पर जा लगी...
पुष्पा अपने मुँह पर नरम नरम चुची का एहसास पाते ही मुस्कुरा पड़ी और बंद आँखों से ही अपने मुँह खोल दी... अगले ही पल रिंकी अपनी निप्पल उसके मुँह में घुसेड़ दी और लद गई... जिससे चुची काफी अंदर तक धंस गई पर पुष्पा निप्पल को बिना छोड़े अपनी सांस रोक हल्के दांतो से काटने लगी...

और पुष्पा अपने दूसरे हाथ बढ़ा रिंकी की दूसरी चुची को सहलाने लगी... रिंकी को तो इन सबकी आदत थी पर पुष्पा जैसी लड़की की सोच वो कामोत्तेजना से भर गई और वो पुष्पा के सर को अपने चुचियों पर जोर से रगड़ने लगी... पुष्पा रिंकी के ऐसे बर्ताव से सिहर गई...

वो कसमसा गई और खुद को अलग करने की सोची ऐसे दरिंदगी से पर रिंकी भला छोड़ती तब ना... जब कुछ नहीं सूझी तो वो भी वहशीपन की सोच अपने मुँह को पूरा खोली और जितनी चुची आ सकती थी अंदर की और जोर से काट ली...साथ ही दूसरी चुची को भी जोर से रगड़ दी...

अब तो रिंकी किसी शिकार की तरह छटपटाने लगी और जोर से आहें भरने लगी पर छूटने की कोशिश तनिक भी नहीं की... और फिर रिंकी की पकड़ ढ़ीली पड़ते ही पुष्पा रिंकी को बेड तरफ गिरा खुद उसके ऊपर आ गई और रिंकी को नीचे दबा जोर जोर से रगड़ने लगी...

रिंकी इसी की आदी थी जिससे वो तुरंत गर्म हो गई और अपने एक हाथ नीचे अपनी बूर पर रख पेंटी के ऊपर से ही रगड़ने लगी... पुष्पा अब और जोर से रिंकी की प्यास को शांत करने की कोशिश करने लगी... कुछ ही पलों में रिंकी काफी गर्म हो गई और इस गर्मी से उसकी पूरी पैंटी भींग गई...

तभी अचानक रिंकी पुष्पा को पुनः नीचे की और झटके से उट गई और तेजी से पुष्पा की कमर के पास गई और बिजली की रफ्तार से खुली सलवार को पकड़ नीचे सरका दी... इस दरम्यान पुष्पा भी गरम हो गई थी तो वो भी अपनी गांड़ को ऊपर कर नंगी हो गई...

अगली वार रिंकी ने पुष्पा की गीली पेंटी पर की और अपने दांत को पेंटी के ऊपर से ही बूर पर रख हल्की हल्की बाइट करने लगी... पुष्पा के लिए तो हर अनुभव बिल्कुल नई थी... वो इसे सहज नहीं ले सकी और बैठते हुए रिंकी के सर को पकड़ दबी चीख से हटाने लगी पर रिंकी तो किसी चुंबक की तरह चिपक गई थी...

पुष्पा की ताकत को कम करने के लिए रिंकी ने अपने हाथ पुष्पा की तरफ कर उसकी चुची को पकड़ ली और सख्त-कड़क चुची को मसल कर ढ़ीली करने लगी... इस दोहरे वार को पुष्पा सहन नहीं कर पाई और इससे रिंकी फायदे में रही कि पुष्पा कू ताकत कमजोर पड़ गई...

बस इसी मौके का फायदा रिंकी ने उठाई और दूसरे हाथ घुसा पुष्पा की पेंटी खींच दी... पेंटी सरकते ही रिंकी की होंठ सीधी पुष्पा की नाजुक अनछुई बूर पड़ चिपक गई जो ना जाने कब से रो रही थी... सेकेंड भर में ही रिंकी का चेहरा पानी से भींग गया...

पुष्पा तो मानो इतनी में ही बेहोश हो गई और वो पीछे धम्म से गिर गई... रिंकी ताजे बूर की ताजी रस चपड़ चपड़ कर चाटने लग गई... वो अपनी जीभ अंदर करना चाहती थी पर उसकी जीभ में इतनी ताकत नहीं थी कि बंद बूर की छेद को खोल सके...

रिंकी की जीभ लगातार हार रही थी... पुष्पा उत्तेजना से तड़प कर अपने सर को पटकने लग गई थी जल बिन मछली की तरह... पुष्पा की ऑछटपटाहट से रिंकी को कभी कभी दिक्कत भी हो जाती थी....

रिंकी पुष्पा को काबू करने के लिए तुरंत 6-9 पोज में हो गई और अपने जांघों से पुष्पा के सर को कैद कर ली... पुष्पा के नाक में रिंकी की बूर की सुगंध पाते ही पुष्पा मदहोश हो गई और कुछ शांत हो सूंघने लगी....

रिंकी इधर अब पुष्पा की बूर की फांक को उंगली से हटा जीभ अंदर करने की कोशिश करने लगी... जब बात नहीं बनी तो उसने अपनी अंगुली बूर के मुहाने पर रख दबा दी...
रिंकी की आधी उंगली गप्प से अंदर घुस गई पर पुष्पा इतने में ही चीख पड़ी और पुष्पा की कमर को कस के पकड़ ली....

इस दरम्यान पुष्पा को रिंकी की बूर की रस सीधी मुंह में चली गई... पुष्पा पानी के स्वाद से थोड़ी बिदक गई पर नीचे हो रहे हमले उसे भुना दिए... रिंकी पुष्पा की स्थिति देख कुछ देर तक अपनी उंगली यूं ही शांत रखी रही... कुछ ही पल में रिंकी को अपनी पेंटी पर पुष्पा की जीभ महसूस हुई...

रिंकी को हरी झंडी मिल गई... रिंकी अपनी अंगुली को हल्के पर ताकत से खींचनी पड़ी और फिर जब अंगुली बाहर निकलने को हुई तो वापस पूरी ताकत से...खच्च्चाकऽ...पुष्पा एक बार उछल पड़ी और इस बार वो उछलने के साथ ही रिंकी की बूर को पूरे मुंह में भर ली...रिंकी अपनी पूरी अंगुली अंदर कर दी थी...

फिर रिंकी अपनी बूर पर हुए हमले से कराह उठी और वो किसी तरह खुद पर काबू कर पुष्पा की बूर को जीभ से खुरेदने लगी... रिंकी ऐसे जीभ चला रही थी मानो पुष्पा की बूर में अंगुली नहीं कोई लंड हो... बिल्कुल अपने अंदाज में चटकारे ले पुष्पा को मस्त कर रही थी...

पुष्पा अब बर्दाश्त करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थी और उसने अपनी अंगुली रिंकी रिंकी की पेंटी में फंसाई और सराक से पीछे की तरफ कर दी जिससे रिंकी भी पूरी नंगी हो हो गई.... टप्प.... रिंकी की बूर से टप्प की आवाज करती पानी की बूंद सीधी पुष्पा की होंठों पर पड़ी...

पुष्पा बूर के रस से अनजान थी पर सुगंध मिलते ही वो तो पागल हो गई थी अब... उसने छिपकली की तरह जीभ बाहर की और अपने होंठों पर पड़ी पानी को चट कर गई और फिर रिंकी की बूर को अपने होंठों से सटा अपनी प्यास मिटाने लगी...

जहां एक तरफ रिंकी कितनी मेहनत से पुष्पा की बूर में सिर्फ अपनी एक अंगुली डाल पाई थी, वहीं उसकी बूर में पुष्पा की पूरी की पूरी मुंह नाक घुस जा रही थी... पुष्पा तो होटल की तैयार खाना खाने में मग्न थी पर असली आनंद तो खुद बना कर खाने में थी जो कि रिंकी कर रही थी...

रिंकी अब अपनी अंगुली धीरे धीरे अंदर बाहर करने लगी थी... और अंगुली जब बाहर निकलती तो अपनी जीभ अंगुली में चिपका कर पूरी रस गटक कर जाती... पुष्पा इसी अंगुली की चुदाई में ही इतनी गरम हो गई थी कि कभी सोची भी नहीं थी बूर चाटने की वो आज बिना कहे कर रही थी...

करीब दस मिनट की इस चुदाई चुसाई के बाद दोनों एक साथ अकड़ी और दोनों एक दूसरी की बूर को लपक के मुंह में भर झड़ने लगी...जितनी संभव हो सकी दोनों पानी गटक ली बाकी बची से बिस्तर को गीली होने दी.... और एक दूसरे से हट दोनों नंगी अपनी उखड़ी सांसों व थकान पर काबू करने की कोशिश करने लगी...
फिर रिंकी पुष्पा को उठाई और हल्की-फुल्की शरारती बातें करती हुई बाथरूम ले गई और दोनों फ्रेश हो गई... पुष्पा की ड्रेस एक बार फिर गंदी हो गई तो मजबूरन रिंकी की ही ड्रेस पहननी पड़ी... पर इस बार पुष्पा बिना ना नुकर के बिकनी पहन ली... पर वो रूम से बाहर नहीं निकली...

उधर शहर में एस.पी. जब फिरौती की बात सुना तो उसका खून खौल गया पर बोल कुछ नहीं सका... उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था... कहावत है ना जब मुसीबत अपने सर पे आती है ना तो महसूस होती है कि मुसीबत क्या बला है? दूसरे की मुसीबत तो मजाक ही लगती है पहले...

खैर, वैसे एस.पी. अपनी बेटी की वापसी के लिए वैसे तो भरकस प्रयास कर चुका था... रात भर नींद हराम कर एस.पी. सोचता रहा... सुबह पैसे पहुंचाने की जगह और आखिरी समय दोनों सुनने जो थे... और ये बात खुलेआम हुई थी तो पूरे शहर में आग लगी थी कि अब देखते हैं ना ये एस.पी. कितना इमानदार है...

मतलब और समय तो गलत कामों के लिए हर वक्त कहता था कि फिरौती,घूस ये सब अपराध को बढ़ावा देना है... अब अपनी बेटी के लिए क्या करते हैं सबके लिए खास खबर बन रही थी...

सुबह से ही एस.पी. के घर कुछ मीडिया वाले आ धमके थे... आखिर क्यों ना आए, ऐसी धांसू न्यूज से उनके चैनल की टी.आर.पी. जो बढ़ रही थी... एस.पी. जल्दी तैयार हो बाहर निकला और घर के लॉन में कुर्सी लगा बैठ गया जहाँ पहले से कुछ बड़े ऑफिसर,नेता,पुलिस इस केस को हल करने के लिए मंथन कर रहे थे....

पर असली जिम्मेदारी तो खुद एस.पी. की थी... आखिर वो एक बाप भी था... एस.पी. के आते ही वहाँ सन्नाटा पसर गया... कोई कुछ बोल नहीं रहा था... हर कोशिश तो नाकाम हो गई थी... अब कहने के लिए कुछ बचा भी नहीं था...

अचानक सबके रोंगटे खड़े हो गए जब एस.पी. के फोन घनघनाने लगी... एस.पी. गौर से देखने लगा स्क्रीन पर... अनजान नम्बर था... उसने कॉल रिसीव करने के साथ ही लॉउडस्पीकर ऑन कर दी...

एस.पी. के हेलो कहते ही उधर से आवाज आई,"आज शाम 5 बजे शहर के...." वो अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि एस.पी. बीच में ही गुस्से से गरजते हुए बोला,"अबे तेरी मां की.... तू किधर है ये बता फिर देखना... साले मां की साड़ी में छुप के बैठा रहता है..."

"एक बाप की औलाद है तो सामने आ..." एस.पी. अपना गुस्सा निकालना शुरू ही किया था कि उधर से ठहाके के साथ हंसी गूँज पड़ी... ये देख सब आश्चर्य से भर गए कि ये क्या कर रहे हैं... ऐसे बर्ताव से हानि उस बेचारी लड़की को हो सकती है जो अभी ठीक से जिंदगी देखी भी नहीं है...

हंसी के बाद आवाज आई,"अबे गाली किसे सुना रहा है एस.पी... मैं तो इसी शहर में हूँ पर तेरी बेटी किधर है वो बता भी दूँ ना तो तू कुछ नहीं उखाड़ पाएगा...जानता है क्यों...?"

एस.पी. के बोलने के लिए उसने कुछ पल के अपनी आवाज रोक दी पर एस.पी. कुछ बोला नहीं... बस कान लगा हर एक बात को सुन रहा था...

"..क्योंकि कोई उसका पता जानता ही नहीं है... हा... हा... हा..." अपनी बात कह उसने एक बार फिर हंस दिया... एस.पी. का तो पारा एक बार फिर चढ़ गया...

एस.पी.,"बहन के लौड़े, तू बोल तो पहले फिर तुम सबको की गांड़ में मिर्चि लगा के डंडे ना घुसेड़ा तो कहना...." एस.पी. की बात सुनते ही वो बोल पड़ा,"रत्ना.... नाम सुना है या नहीं... इसी के पास है तुम्हारी बेटी... जा जाके ले आ अपनी बेटी... तू मिर्ची लगाने के बाद मेरी गांड़ सुलगाएगा मैं बिना मिर्ची के ही सुलगा दिया...ही...ही...ही...."

रत्ना का नाम सुनते ही सबके पसीने छूट गए... इसके नाम और कारनामे तो सब जानते थे पर कोई इसे ढ़ूंढ़ नहीं पाया था कि ये है कहाँ... एस.पी. तो बूत बन के रह गया था... उसके मुँह से आवाज निकलनी ही बंद हो गई थी... क्योंकि सिर्फ रत्ना का ही पता लगाने में सब असमर्थ था तो वो क्या कर सकता था...

"हाँ तो एस.पी. साब, जल्दी बोलिए एड्रेस बताऊं या फिर..."इतना कहते ही वो चुप हो गया क्योंकि पुलिस सायरन एस.पी. के फोन पर भी सुनाई दे रही थी... एस.पी. पूरी तैयारी कर चुका था पर उसे ये मालूम भी नहीं था कि उसे कुछ मिलने वाला नहीं है....

उधर से हंसी के साथ आवाज आई,"एस.पी. साब, आप तो मुझे फंसा दिए जी... आपके रिश्तेदार घेर लिए हैं मुझे... वैसे रत्ना का पता मुझे भी नहीं पता पर आप तो मानोगे नहीं... अब ससुराल तो जाना ही पड़ेगा जहाँ आप किस्त दर किस्त मेरी सेवा करोगे... तो उससे बेहतर एकमुश्त ही रहेगी...और हां अब आपकी बेटी शायद ही वापस आएगी...जिंदा या मुर्दा.... गुड बाय.."

बात खत्म होते ही धांय की आवाज आई और उस आदमी की कराह एस.पी. के फोन में गूँज उठी... एस.पी. के साथ साथ सब चौंक के खड़े हो गए...

उसी पल वहीं बैठे एक ऑफिसर के फोन पर मैसेज आया कि इसने गोली मार कर खुदकुशी कर ली... वो बस सुन के रह गया... सब खेल तो वो सुन ही रहा था... एस.पी. असहनीय अंदरूनी दर्द से लिप्त चुपचाप अंदर की तरफ रूख हो लिया... किसी के पास कुछ पूछने कहने की थी ही नहीं...

धीरे धीरे सब अपने अपने मंजिल की तरफ रूख कर लिया....
रिंकी पुष्पा की कोरी जवानी का स्वाद ले उसकी दिवानी हो चुकी थी तो वहीं पुष्पा पहली बार ऐसी चीज का अनुभव पा उसकी भूख और बढ़ गई थी... पांच मिनट भी अकेली नहीं रह पा रही थी... रिंकी उसकी गोद में सर रख लेट गई और प्यारी प्यारी कुछ खट्टी-मीठी यादें सुनाने लगी...

जबकि कालिया दूसरे रूम में बार बार इधर उधर भाग रहा था... वो जल्द से जल्द पुष्पा से बाकी बचे खेल खेलने को उतावला था... वो चाहता तो रिंकी को यूँ हटा देता पर पहली बार की सोच वो कुछ नहीं कर पा रहा था... कहीं पुष्पा उसके ऐसे जल्दबाजी को बुरा मान गई तो फिर शायद ही दुबारा वो उससे बात भी करेगी...

शाम हुई, फिर रात हुई पर बात नहीं बनीं... कालिया अपने लंड पर बर्फ के टुकड़े डाल डाल कर शांत करने की कोशिश करता पर वो मानता तब तो... रत्ना उसकी हरकत देख हंसते हंसते पगला गया था... वो उसे चिढ़ाने के लिए डॉली की घुमा घुमा के बजा रहा था...

कालिया अंततः रह नहीं पाया और कड़ी वाली दो चार पैक लगा अपने लंड को दोनों हाथ से पकड़ सो गया... पुष्पा भी इधर कई बार झड़ गई थी... रिंकी की कहानी सुन वो गरम हो जाती फिर रिंका को ही बेशरमो की तरह जकड़ झड़ जाती... ऐसे करते हुए कब दोनों की आँख लगी मालूम नहीं...

सुबह जब पुष्पा की नींद खुली तो रिंकी नहीं थी... वो उठ कर बैठी तो बाथरूम से आवाज आ रही थी... शायद रिंकी फ्रेश हो रही थी... कुछेक देर में रिंकी बाहर निकल गई और कपड़े पहन कर रेडी होने लगी... पुष्पा बस उसे निहार कर सोच रही थी कि ये तो सच में जा रही है...

फिर पुष्पा भी फ्रेश हुई और उसने साथ ही नाश्ता की... फिर पुष्पा को अपना नं0 दे विदा ली और चल दी वापस... पुष्पा वापस रूम में आ सो गई... कालिया उसी वक्त पुष्पा से मिलना चाहता था पर रूम लॉक देख इंतजार करना ही ठीक समझा...

शाम तक पुष्पा सोती रही फिर जब उठी तो बाहर निकली जहाँ कालिया बैठा था... कालिया की नजर पुष्पा पर पड़ते ही उसकी बाँछें खिल गई... पुष्पा भी बदले में एक शर्मीली मुस्कान रिटर्न कर दी... कालिया उठा और उसके निकट आ पूछा,"तबीयत ठीक है ना...?"

पुष्पा,"हम्म्म्म..." पुष्पा बस हामी भर दी... जिसे सुन कालिया पूछ बैठा,"..तो इतनी देर क्यों सो रही थी..." कालिया की बात सुन पुष्पा उसकी तरफ देखते हुए बोली,"कोई काम था क्या..?"

कालिया सवाल सुनते ही हड़बड़ा गया और हकलाते हुए बोला,"हाँ...ना...हाँ...तुम इतनी देर सोई तो तबीयत खराब हो जाएगी तो मुफ्त में मुझे टेंशन हो जाएगी..." कालिया की बात सुन पुष्पा मुस्कुरा कर मुँह दूसरी तरफ करती हुई बोली,"क्यों..."

कालिया,"क्योंकि.... पता नहीं...छोड़ो वो सब...सीधा प्वाइंट पे आता हूँ...मुझे ये लैला मजनूं की तरह बातें करना नहीं आता... बहुत देर से तड़प रहा हूँ प्लीज एक चुम्मी दो ना..." कालिया की बात सुनते ही पुष्पा हंसे बिना ना रह सकी...

पुष्पा,"सॉरी, मुझे तो नहीं हो रही है... जब होगी तो कह दूँगी..."और कहने के साथ ही पुष्पा वापस रूम की तरफ पलट गई... जिसे देखते ही कालिया उससे रिक्वेस्ट करता हुआ पीछे हो लिया...

पुष्पा उसे अपने पीछे आते देख अपने कदम तेज की मगर कालिया भी उसी रफ्तार से पीछा करता रहा...और फिर पुष्पा रूम के अंदर दाखिल हो गेट लॉक करनी चाही पर कालिया रोकते हुए प्लीज...प्लीज... करने लगा जिससे पुष्पा हंसी रोक नहीं पाई और हंसती हुई गेट छोड़ कर भागी...

अंदर घुस बेड के चारों तरफ हो खुद को कालिया से दूर बचने की कोशिश की मगर कब तक.? कालिया बेड पर चढ़ अगले ही पल पुष्पा को अपने बाँहों में कैद कर लिया... पुष्पा खिलखिलाकर हंसने लगी... कालिया अब उसे चूमने की कोशिश कर रहा था पर बार -2 पुष्पा उसे ठेंगा दिखा देती...

अंततः कालिया उसे उठाया और बेड पर हंसता हुआ पटक दिया... और चढ़ गया ... अब पुष्पा कुछ कर भी नहीं सकती थी... वो बस हंसे जा रही थी... जोश से भरा कालिया अगले ही क्षण पुष्पा के होंठों पर वार कर उसकी हंसी को शांत कर दिया...

फिर दोनों किस में खो से गए... दोनों के होंठ एक दूसरी की होंठों से अठखेलियाँ करने लगी... कालिया जब पुष्पा की जीभ को पकड़ चूसता तो वो गनगना सा जाता... पुष्पा अपनी जीभ की रगड़ाई हो सह ना सकी और बूर से पानी बहाती अकड़ने लगी थी... उसने अपनी बाँहें कालिया के पीठ पर कस ती थी...

तभी पुष्पा किसी तरह पल भर के होंठ को छुड़ाती हुई बोली,"गेट..." गेट एक बार फिर खुली रह गई...कालिया उसे आजाद कर दिया पर हटा नहीं...

कालिया,"भागेगी भी..." पुष्पा मुस्कुराती हुई ना में सर हिला दी... जिसे देखते ही कालिया झट से उठा और "खटाक...ऽ"...वापस पुष्पा की बुर पर अपने लंड को स्थित कर लेट गया और किस करने लगा... पुष्पा अब तो और गनगनाती हुई स्वर्ग की सैर कर रही थी... ऊपर किस और नीचे लंड का एहसास...

कालिया कुछ ही देर में बूर की गरमी से बेकाबू सा होने लगा... वो बिना किस रोके अपने हाथ पुष्पा की एक चुची पर रख दिया... पर पुष्पा तो खुद अनियंत्रित थी तो भला वो क्या कुछ करती... उसकी कोई रिएक्शन ना देख कालिया चुची को हौले से मसलने लगा...

तिहरी वार से पुष्पा की बूर तो झरने की तरह झड़ झड़ बर रही थी जिससे उसकी पेंटी भींग कर सलवार को गीली कर रही थी... पुष्पा जब सहन ना कर सकी तो उसने कालिया के दूसरे हाथ को भी अपनी दुसरी चुची पर ला कर रख दी... कालिया तो खुशी में बावला सा हो गया और लगा मर्दानगी निकालने...

पुष्पा मर्द की इस रगड़ से विचलित हो गई और वो कराह उठी पर अलग नहीं की... उसकी खाज जो अब हल्की हल्की कम हो रही थी पर वो ये नहीं जानती थी कि ये तो और आग को बढ़ा रही थी... कालिया चुचि को मसल तो रहा था पर उसे संतुष्टी नहीं मिल रही थी...

उसने किस को रोक उठा और उसकी समीज निकालने के इरादे से पुष्पा को बिठा दिया ... कालिया कमर के पास पकड़ आहिस्ते से समीज ऊपर की तरफ करने लगा... पुष्पा अपनी साँसें पर बेकाबू सी हो अपने हाथ ऊपर कर दी और अगले ही पल वो सिर्फ ब्रॉ में थी... उसकी नजरें नीचे हो चली थी...

कालिया भी बड़ी अदा से उसे अपने बाँहों में भींच आहिस्ते से बेड पर लिटा दिया... और फिर वापस किस करते हुए उसकी चुची पर हाथ चलाने लगा... कुछ ही पलों की किस के बाद कालिया ब्रॉ के हुक को खोल दिया...ब्रॉ खुलते ही कालिया अपना हाथ ब्रॉ के अंदर कर चुची मिसने लगा...
पुष्पा की आग और भड़क गई... वो अब किस ना कर सीधी काटने लग गई थी... उसकी खुद पर नियंत्रित नहीं हो पा रही थी... पर कालिया बड़ी संजीदा से उसके हर वार से बच बस किस कर रहा था... कालिया को जब लगा कि ये काफी गरम हो चुकी है तो उसने उसके होंठों को छोड़ पूरे चेहरे को चूमना शुरू किया और अपना हाथ धीरे धीरे नीचे सरकाने लगा...

सलवार को खोलने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी और उसके हाथ पुष्पा की पेंटी पर घूमने लगी... पेंटी को छूते ही उसके हाथ गीले हो गए... दो चार बार हाथ फेरने के बाद हाथ को अंदर घुसा दिया... पुष्पा छुअन भर से ही बिदक पड़ी और सिसकती हुई कालिया को कस ली...

पुष्पा इतनी कस के जकड़ी थी कालिया कुछ कर ही नहीं पा रहा था... कुछ देर तक यूँ पड़े रहने के बाद कालिया पुष्पा के गालों के पास चूमते हुए बोला,"पुष्पा, मैं तुमसे अब एक पल भी अलग नहीं रहना चाहता हूँ... पूरी जिंदगी साथ रहना चाहता हूँ...साथ दोगी..."

पुष्पा उसकी बात सुन थोड़ी स्थिर हुई और मना कर दी...पुष्पा की ना से ही कालिया आहत सा हो गया... वो अचानक से टूट के बिखरने लग गया... कालिया की समझ में कुछ आ ही नहीं रहा था कि वो क्या बोले,क्या करे... जब कुछ नहीं सूझी तो वो पुनः पूछा पर जवाब वही मिला...

कालिया के तो जैसे हाथ पांव बंध गए... वो तो ना जाने कितने ख्याली पुलाव बना चुके थे... जिसे पुष्पा ने एक ही झटके में तहस नहस कर दी थी... जब पुष्पा को महसूस हुई कि कालिया में कोई हरकत नहीं है तो वो आश्चर्यपूर्ण रूप से आँख खोली तो सामने कालिया आँखों में आँसूं लिए बस उसे ही निहार रहा था...

पुष्पा को तो जैसे शॉक लगा... वो तो बस कालिया के दिल को टटोलना चाहती थी... वो बस सुनना चाहती थी कि कालिया क्या कहता है... वो तो ये चाहती थी कि थोड़े नखरे करूँ ताकि कालिया उसे मनाए...और इस मनौवल की यादें जो होती है ना वो सबसे हसीं और मनोरंजक होती है...

पुष्पा तुरंत ही अपने हाथों से कालिया के चेहरे को पकड़ पूछी,"क्या हुआ..." कालिया की आँखें डबडबा गई... जिसकी बूँदे सीधी पुष्पा के चेहरे पर पड़ी... पुष्पा ये देखते ही भावुक हो उसे अपने सीने से लिपटा खुद भी सुबकने लगी और "सॉरी.." बोलने लगी...

नंगी लड़की पड़ी हो और पानी लंड की बजाए आँखों से निकले, अजीब दृश्य थी... पुष्पा तुरंत ही अपनी बात बता दी कि वो तो बस तुम्हें परखने के लिए बोली थी कि तुम भी औरों की तरह मजे लूट के निकल जाओगे या फिर साथ रहोगे.... पर कालिया को अब भी विश्वास नहीं हो रहा था...

वो अपने आँखों को साफ किया और भरी आवाजों में कह दिया,"नहीं, तुम झूठ बोल रही हो... कसम से, अगर तुम नहीं मिली ना तो मैं मर जाऊंगा... तुम्हें मैं ये सुनने का मौका नहीं दूंगा कि इसका पति गुंडा,चोर है... अभी से सब खत्म...ये जिंदगी अब यहीं तक थी..."

कालिया अपनी सफाई में और कुछ कहना चाहता था पर पुष्पा उसे बीच में ही रोक दी... और कसम वादें करती हुई उसे गले से लगा ये तसल्ली दे कर चुप हुई कि वो उसे कभी नहीं छोड़ेगी... कुछ देर तक दोनों यूँ ही एक दूसरे को बाँहों में कैद किए पड़े रहे...

अचानक कालिया अपनी बंद आँखें झटके से खोल कुछ समझने की कोशिश करने लगा... उसके सोए लंड पर कुछ रेंगती हुई महसूस हो रही थी... जब लंड पर कुछ पकड़ होती हुई महसूस हुई तो वो सर उठा के पुष्पा की तरफ देखा तो पुष्पा हंस पड़ी... वो अपने हाथ बढ़ा नीचे कालिया के लंड को जगा रही थी...

पुष्पा को हंसते देख कालिया भी हंस पडया और दबोचते हुए वो पुष्पा की चुची पर अपना मुंह दे मारा...पुष्पा ईस्ल्स्स्ससस कर कराह पड़ी... कालिया अपने जीभ से तो कभी दांतों से निप्पल को छेड़ते हुए चूस रहा था और दूसरा हाथ दूसरी चुची को मसल रहा था...

पुष्पा एक बार फिर मचलने लगी थी...वो वासना से लंड को कस के मसल रही थी और दूसरे हाथ से कालिया के सर को दबा रही थी... कमरे में पुष्पा की सिसकारी गूंजने लग गई थी जिससे कालिया जोश से भर रहा था... कुछ ही देर में कालिया का लंड भी पूरे ताव में आ गया और पुष्पा के हाथ को ही ठोकरे मारने लगा...

कालिया अब चुची बदल बदल कर चूसने लगा... दो मिनट भी नहीं हुआ कि पुष्पा चीख पड़ी... लंड की गरमी अपने हाथ और बूर के पास सह नहीं सकी...कालिया पुष्पा के झड़ते ही चुची को चूसना छोड़ उसके होंठ चूसने लगा ताकि कुछ नॉर्मल हो...

जबकि कालिया का लंड अब नॉर्मल की स्थिति में रहना नहीं चाहता था...कालिया घुटने पर हो अपने लंड को आजाद कर दिया...पुष्पा को कालिया की हरकत से महसूस हो गई कि कालिया अब नंगा हो रहा है...

लंड को नंगा कर कालिया पुष्पा के गालों को होंठ से सहलाते हुए बोला,"पुष्पा, कमर को ऊपर करना थोड़ा.." कालिया पुष्पा के शरीर से हट पुष्पा की सलवार पेंटी सहित पकड़ नीचे खिसकाने लगा... पुष्पा अपनी कमर थोड़ी उचकाई ही थी कि कालिया की ताकत ने पल भर में उसे नंगा कर दिया...

कालिया चमकती बूर देख आपा खो दिया...वो किसी चुंबक की तरह बूर की ओर खींचता चला गया और उसने अपने होंठ उस पर जमा दिए...होंठों की गर्मी पाते ही पुष्पा फौरन कालिया के बाल पकड़ मचल गई... कालिया किस कर चूसने लगा... पुष्पा असहनीय तड़प से उसके बाल नोचने लगी...

कालिया के इतने से ही पुष्पा पुनः गरम हो गई... कालिया अब रूकना ठीक नहीं समझा क्योंकि अब उसका लंड खुद जवाब देने लगा था... उसने सर को ऊपर किया और एक तकिये को पुष्पा की कमर के नीचे घुसा दिया... फिर वो पुष्पा की सलवार पूरी बाहर कर खुद उसके बीच आ गया और अपने लंड को पोजीशन में ला लेटने लगा...

पुष्पा अपनी बूर पर नंगे लंड को महसूस कर सिहर गई और कालिया की पीठ पर पकड़ बनाते हुए बोली,"प्लीज, आराम से करना...." कालिया कुंवारी बूर की हालत देख हामी भर दिया और अपने लंड को पकड़ उसे बूर के मुहाने पर सेट करने लगा...

बूर इतनी कसी हुई थी कि कालिया को सही स्थिति मालूम ही नहीं पड़ रही थी... वो एक ओर हो गया और बूर को अपने अंगुली से खोल कर देखने लगा... बुर खुलते ही उसे काफी छोटी छिद्र नजर आई... वो होने वाली स्थिति को भांप एक बारगी सोच में पड़ गया...मन ही मन बुदबुदाने लगा शाली अंगुली भी तो करती ताकि छेद ठीक से नजर आती...

वो लंड को बढ़ा अपने अंगुली के पास ले गया और खुली जगह में डाल अंगुली खींच लिया... अंगुली हटते ही बूर की फांक लंड को जकड़ ली... बूर की कसावट देख कालिया तो दंग रह गया... वो सावधानी से खुद को पुष्पा के ऊपर लाया और सुपाड़े को फंसाने के लिए हल्का दबाव दिया...

दबाव पड़ते ही पुष्पा तड़पने लगी... शुक्र था कि कालिया का लंड थोड़ा भी इधर उधर नहीं हुआ... लंड का सुपाड़ा पूरा लॉक हो गया... पुष्पा इतनी में ही दर्द से बिलखने लगी... कालिया पूरी ताकत से लंड को यथावत किए रहा... रास्ता मिल जाए तो पीछे मुड़ना ठीक नहीं था... वो पुष्पा को स्मूच कर उसे शांत करने लगा...
पुष्पा कुछ ढ़ीली पड़ी तो कालिया स्मूच तोड़ धीरे से बोला,"दर्द ज्यादा है.." तो पुष्पा ने हां में सर हिला दी... कालिया जवाब सुन निकालने की ना सोच उसे दिलासा देते हुए प्यार से बोला,"पहली बार दर्द होता ही है...थोड़ा सा बचा है बस हल्का दर्द और सह लो फिर आराम से मस्ती करेंगे...ठीक है.."

कालिया की बात सुन पुष्पा हल्की मुस्कान बिखेड़ हां में सर हिला दी और बर्दाश्त करने के लिए दांत भींच कर खुद को तैयार कर ली... जबकि कालिया का 8 इंची हथियार पूरा का पूरा बाहर ही था जिसे पुष्पा देखी नहीं थी...

कालिया मुस्काते हुए पुष्पा को कस के पकड़ा और आँखें बंद कर जितनी ताकत से हो सकता, झटका देते हुए लंड को धांस दिया...पुष्पा झटके के साथ ही चीख पड़ी जिसे कालिया तुरंत अपने हाथों से उसके मुंह बंद कर दिया...

पुष्पा की आँखें बाहर निकल रही थी और आँसू की फव्वारे बह निकली थी... बेहोश होने से कैसे बच गई ये सोच वो खुद हैरान थी... ऐसी असहनीय दर्द वो आज पहली बार महसूस की थी...

कालिया लंड पर कोई हरकत ना होने दे रहा था और पुष्पा की चुची को तेजी से पर आरामदायक तरीके मसल रहा था...कुछ देर बाद उसने किसेज शुरू कर दी... कुछ देर बाद जब पुष्पा थोड़ी हरकत में आई तो कालिया उसे चूमते हुए बोला,"अब हो गया जो होना था वो... दर्द कुछ देर में कम हो जाएगा..."

पुष्पा की आँखें अभी भी आंसूं बहा रही थी...फिर भी पुष्पा किसी तरह बोली,"प्लीज निकाल लोऽ... बाद में कर लेना... मैं मर जाऊंगीईईईसससस...." कालिया नीचे महसूस किया तो पाया शाला अभी तो आधा ही गया है...

अगर पूरा डालूं तो ये सच में मर जाएगी... उसने मन मसोस कर सोच लिया कि बेटा जितना मिल रहा आज उतना ही खा ले... बाकी बाद में खा लेना... वो "ठीक है.." कह लंड अपना पीछे करने लगा...

लंड के बाहर खींचने से भी पुष्पा दर्द से कराहने लगी... जब सिर्फ सुपाड़ा बचा तो कालिया रूका और पुष्पा से पूछा,"दर्द कम है...?" तो पुष्पा के हाँ कहते ही कालिया पुनः धक्का दे दिया... कालिया कुछ बेरहम बनने की सोच लिया था...

पुष्पा सोच रही थी कि अब निकाल लेगा पर हुआ कुछ और... ताकत से धक्का देने के बावजूद आधा लंड ही जा पाया... पुष्पा दर्द से बिलबिलाने लगी और कालिया की पीठ पर मुक्के जमाती हुई "कुत्ता, कमीना, वगैरह-वगैरह..." गालिया बकने लगी...

कालिया देखा कि पहली शॉट की अपेक्षा इस बार पुष्पा की हालत ठीक है तो उसने मार खाते हुए भी लंड को खींच पुनः घुसेड़ देता पर गति मंद ही थी...कुछेक धक्के के बाद ही पुष्पा स्थिर हो गई और वो अब धक्के पर बस झटके खाने लगी...

कालिया का लंड पर ऐसा महसूस हो रहा था मानों किसी ने रस्सी से बाँध रखा है... वो अपने लंड को पूरी ताकत से अंदर करता और बाहर खींचता... अगर थोड़ी भी ताकत कम पड़ती तो लंड जस की तस रह जाती... उसके लंड में छिलन की जलन महसूस हो रही थी पर वो रूका नहीं...

लगातार धक्के लगाए जा रहा था... दर्द काफी कम हो गई थी जिससे पुष्पा कमर ऊचका कर जाहिर करने लगी थी... कालिया अगर चाहता तो अब पूरा लंड डाल सकता था परअब उसमें अब इतनी पावर नहीं थी कि जड़ तक पेल पाता...

उसने स्पीड बढ़ाने लगी थी और पुष्पा भी अब उसकी कमर को पांवों से लपेट और अंदर करने की कोशिश करने लगी... बीच बीच में वे किस भी कर रहे थे... पर कालिया अब बर्दाश्त करने लायक नहीं था...

अगली दो चार धक्के के बाद ही वो अकड़ने लगा और हुंकार भरते हुए चीख पड़ा... कालिया आज हार गया था पहली बार... बूर में डालने के बाद आज पहली बार बूर से पहले झड़ा था... वो झटके खाता हुआ अपना सारा पानी बूर के अंदर ही उड़ेलने लगा...

लंड के पानी पड़ते ही कुंवारी बूर भी सह नहीं पाई और पानी की गरमी से वो भी अपनी नदी को नियंत्रित नहीं कर पाई...चुदाई से तो नहीं झड़ी थी. ..पुष्पा कालिया के कंधों पर दांत गड़ाती हुई कमर उचकाती हुई झड़ने लगी...

कालिया के झड़ते ही पुष्पा की बूर ने लंड को धक्के दे बाहर कर दी... कालिया हांफता हुआ पुष्पा के बगल में लेट गया... दोनों पसीने से तरबतर हो गए थे...पुष्पा के चेहरे पर असीम खुशी झलक रही थी...

पुष्पा जब शांत हुई तो कालिया की ओर देखी जो अभी भी लम्बी सांसे खींच रहा था... वो मुस्काती हुई कालिया के सीने को चूमती हुई उस पर सर रख सो गई... कालिया भी आंख बंद में ही अपने हाथों से उसके गालों को सहलाने लगा...
शहर में हर तरफ एस.पी. के इस रवैये से वो चर्चा में आ गया था... सब इसी सोच में थे कि अब क्या होगा? अगर एस.पी. अपनी बेटी के लिए फिरौती देता तो इस शहर के साथ साथ अगल बगल के शहर के लोग और सदमें में आ जाते...

जब एस.पी. ही झुक गया तो और जनता किस खेत की मूली होता... एस.पी. की हिम्मत की जहाँ वाहवाही मिल रही थी तो वहीं उसकी बेटी पुष्पा सबके लिए चिंता भी बनी थी... बेचारी की गलती कुछ नहीं थी और नाहक ही मुसीबत में फंस गई...

जब औरों के दिल किसी अनहोनी की सोच दहल जाता तो उसके मां बाप पर क्या बीत रही होगी, सोचना मुश्किल...! अब सबकी नजर बस एस.पी. पर ही थी... उनका अगला कदम क्या होगा और इसका निदान क्या करते हैं.... सब यही दुआ कर रहे थे कि अब बस, लड़की सही सलामत वापस आ जाए...

दोषी को सजा मिलनी चाहिए पर पहले पुष्पा को वापस लाना ठीक रहेगा...फिरौती के लिए आए आदमी के सुसाइड करने से सुरक्षा विभाग हिल गई थी... जब वो बात ना करने के लिए जान गंवा सकते हैं तो उसके पीछे पड़ने पर वो पता नहीं क्या सब कर डालेंगे....ये चिंता का विषय था...

रातों रात एक विशेष टीम एस.पी. से मिलने आ पहुँची, जिसकी भनक किसी को नहीं लगी... और काफी देर तक विचार विमर्श हुआ... नतीजन सुबह होते ही एस.पी. ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और पब्लिक से अपने काम को इमानदारी से ना करने की माफी मांग ली...जब खुद सुरक्षा नहीं कर सकता तो आप लोगों की सेवा कैसे कर सकता हूँ...

एस.पी. गुप्त टीम के साथ रत्ना के ठिकानों का पता लगाने के लिए हाथ धो के पीछे पड़ गया...एस.पी. स्टेट के उन शहरों में शिफ्ट हुआ जहां रत्ना सबसे ज्यादा क्राइम करता था... वहां ज्यादे क्राइम होते हैं मतलब उसका आदमी निश्चित वहां ज्यादा होंगे... और कोई तो जरूर मुंह खोलेगा...

पद से इस्तीफा देने के बाद वो शहर भी छोड़ दिया फैमिली के साथ और दूसरे शहर में शिफ्ट हो गया... ऐसी घटना से उसे अब कहाँ के लोग नहीं पहचानते थे पर इस शहर में किसी से बातचीत नहीं थी तो वो आराम से अपने काम में लगा रहा....

उधर पुष्पा नंगी ही कालिया के संग काफी देर तक सोई रही... जब कालिया उठा तब जाकर वो भी हटी... फिर दोनों बाथरूम घुस तरोताजा हो लिए पर दोनों की एक जैसी प्रॉब्लम आ गई थी... पुष्पा की बूर सूज गई थी तो कालिया के लंड पर छाले पड़ गए थे...दोनों दर्द से कराह रहे थे और एक दूसरे को देख हंस भी रहे थे...

दो दिनों तक तो कालिया का लंड खड़ा भी नहीं हुआ...तीसरे दिन जब राहत हुई तो उसके साथ ही खड़ा भी हो गया... पर वो इतनी जल्दी फिर से छाले नहीं पड़वाना चाहता था लंड पर... हंसी मजाक, चुगलबंदी, अच्छी-बुरी बातें इत्यादि दोनों हर वक्त करते रहते थे...

इन दो दिनों में ही दोनों पूर्णतया एक दूजे को हो लिए थे... पहले तो दिल से,फिर तन से और अब दिमाग,मन सब से... दोनों एक दूसरे की हर बात सुनते थे, सुनाते थे... इस तरह रहना नसीब वालों को ही मिलती है...

कभी कभी रत्ना की नजर इन दोनों पर पड़ जाती... पहले तो रत्ना दोस्त समझ के मुंह फेर लेता पर जब रात में बेड पर जाता तो उसके जेहन में ये बात घूमने लगती... दोनों के भविष्य की सोच वो कांप सा जाता... अगर ऐसा हुआ तो वो कहीं अनजान जगह जा शरीफों की तरह रहने लगेगा और फिर बच्चे होंगे तो ये परिवार वाला होगा जो कि इसके और कुछ तो नहीं कह सकता पर नाम का जरूर वारिस होगा...

कई दिनों तक रत्ना दिमाग पर काबू करते रहता पर कहते हैं ना बद चीज जल्द हावी होती है... यही बात रत्ना के साथ हुई... मजबूर हो रत्ना अपने दोस्त से बहाने कर गया कि उसे सूचना मिली है कि पुलिस हाथ धो के उसके खोज में जुटी है...तो अब तुम लोग का इधर रहना ठीक नहीं है...

कालिया को उसकी बात में सच्चाई नजर आई... वो अब हर वक्त पुष्पा के साथ बिताना चाहता था... पुलिस नाम से अब उसे पकड़े या मारे जाने का डर नहीं लगा बल्कि उसे तो अलग होने का डर लग गया..वो तुरंत हामी भर दिया...

अगले ही दिन कालिया पुष्पा को ले वहां से निकल गया... रत्ना उसे नदी किनारे तक छोड़ने आया था... कालिया नदी पार ना होकर कुछ सोचा और नदी के रास्ते ही बढ़ गया... पीछे रत्ना खूब रोया अपने दोस्त के बारे में सोच कर...

कितना कमीना हो गया था.... आज एक दोस्त की विश्वास का कत्ल होने जा रहा था... लानत है तुझ पर ... और ना जाने कितनी खरी खोटी सुनाई खुद को... कालिया अब बिल्कुल नए और अनजान जगह जाना चाहता था... बिल्कुल अनजाना...

पुष्पा इस सफर में कई बार रोई पर वापस जाने पर होने वाले अंजाम को सोच मन मसोस कर रह गई... कालिया से काफी अंदर तक जुड़ गई थी... वो भी एक पल भी अलग नहीं रहना चाहती थी... कालिया उसे नए और बदले कालिया की कहानी सुना उसे ढ़ाढ़स बंधा रहा था...

वो जानता था कि ये मुश्किल जरूर है पर नामुमकिन नहीं... पर ये सोच कर जोश से भर जाता कि पहले तो कोई नहीं था पर अब पुष्पा है ना हर कदम पर साथ देने वाली तो टेंशन किस बात की... बिन मंजिल के वो कई दिनों तक सफर पर चलता रहा...

आखिर उसे एक जगह जहां सब नए चेहरे थे, जगह अनजान, हवा अनजान, मौसम नया ... सब कुछ नया नया.... उसने वहीं अपने सफर को रोक दिया... अब उसने रहने के लिए ठिकाने ढ़ूँढ़ने थे... पहली जगह ही उसे बड़ी समस्या आ गई...

मुंह बनाए वो वापस पुष्पा के पास आते ही बोला,"इधर की भाषा तो समझ में ही नहीं आती... शाले बुड्ढ़े ने क्या बोला मालूम ही नहीं..." उसकी बात सुनते ही पुष्पा जोर से हंस पड़ी...

आगे से पुष्पा पता करनी शुरू की... वो अंग्रेजी अच्छी जानती थी... कई प्रयासों में उसे एक जगह मिल ही गई... रूम मालिक छोटे फैमिली वाला था... पति पत्नी और एक बेटा... दोनों वहीं ठहर गए...

उसके रूम मालिक ने पूछताछ की तो पुष्पा प्यार वाली बात सच सच बता दी... किडनैप की बात नहीं बता पाई नहीं तो प्रॉब्लम हो जाती... वो मुस्कुरा के रहने की इजाजत दे दी क्योंकि संयोगवश वो भी इसी तरह भागा था और अभी तक वापस नहीं गया था... तो लाजिमी है कि वो प्यार के हर दर्द को अच्छी तरह जानता था.... साथ ही उसने कालिया को काम भी दिलवा दिया अपना रिश्तेदार बता कर...
एस.पी. जल्द ही व्यवस्थित हो अपने काम में जुट गया...10 दिन तक कुछ हाथ नहीं लगा... वो अब कुछ ज्यादा ही अपसेट होने लगा था... वो अपसेट कम करने के लिए बियर बार जा पहुँचा...

वो नजर दौड़ाता हुआ आगे बढ़ एक कोने में बैठ गया...अंदर काफी बढ़िया व्यवस्था की हुई थी... झूमने वाले झूमे, बैठने वाले बैठ के मजे ले... एक बियर ऑर्डर कर वो बैठा... उसकी आँख बंद हो गई थकान से... बंद आँखों में वो पुष्पा की यादें आने लगी...

वेटर बियर देकर चला गया. . वो अभी दो घूंट ही पिया था कि बगल के कुर्सी पर तीन आदमी आ कर बैठ गए... एस.पी. एक नजर डाल पुनः पीने लगा... तीनों अभी आए ही थे... वे पहले मूड बनाते फिर झूमने जाते शायद...

तभी उन तीनों की बातचीत सुनते ही एस.पी. के कान खड़े हो गए...एक आदमी दूसरे से संयोगवश पुष्पा की ही बात कर रहा था... तभी उसमें से एक बोल पड़ा कि भाई, उस लड़की को तो मैं ही नदी किनारे तक छोड़ने गया था गाड़ी से...

उसने फिर कहा,"वो मेरे मामा हैं ना वो यही सब करते हैं तो उन्होने ही फोन कर कहा कि तुम बस उसे जहाँ तक कहे पहुँचा दो, मैंने पहुँचा दिया... भाई मैं ऐसे काम तो नहीं करता पर जब कोई अपना कह दे तो साले मैं कुछ भी करने का जिगर रखता हूँ..."

एस.पी. की आँखें चौंक गई कि बेटा, तेरा दिन खराब हो गया अब... नहीं करता है तो नहीं करना चाहिए था ना... एस.पी. तुरंत अपने साथी से कांटेक्ट किया और उस पर नजर रखने लगा...

कुछ ही पलों में उसके साथी बार के बाहर आ धमके... एस.पी. आराम से उससे सहायता मांगा कि बेटा, बाहर गाड़ी तक हमें छोड़ आओ... कुछ ज्यादा चढ़ गई है तो जाने में.... एस.पी. जैसे सभ्य पुरूष देखते ही वही ड्राइवर खड़ा हो सहायता करने लगा अच्छे बच्चों की तरह...

एस.पी. इसके गिरफ्तारी की भनक नहीं लगने देना चाहता था... इसी वजह से वो उसे बहाने से बाहर लाया... बाहर एस.पी. अपने गाड़ी के पास पहुँचा कि उसी वक्त एक साथी ने पीछे से उसके कमर पर गन लगा दी और चुपचाप अंदर बैठने को कहा...बेचारा क्या करता.. ?

एस.पी. के साथ ही बैठना पड़ा और गाड़ी तेज गति से निकल गई... पीछे से उसके साथी भी सादी लिबास में आ रहे थे...उस लड़के की समझ में कुछ नहीं आ रहा था... वह एक बार पूछा भी कि मुझे क्यों और कहाँ ले जा रहे... तुम लोग कौन हो..?

पर बंदूक की नोक उसे आगे से कोई सवाल ना करने पर मजबूर कर दिया बिना जवाब सुने...अपने जगह पर पहुँच उसे पहले तो उल्टा लटका दिया और 10-12 मोटे डंडे ला उसे दिखा दिखा कर मजबूती चेक करने लगा...

बेचारा, देख के ही उसकी पैंट गीली हो गई और सारा पानी उसके सर से टपकने लगा... वो रोने लग गया और हर बार बस छोड़ने की गुहार लगाने लगा... एस.पी. अपने साथी को इशारा कर खुद कुर्सी पर बैठ गया... उसके साथी उसके पास आ उसे रौबदार आवाज में बोला,"तुम्हारे एक बार ना कहने पर ये एक डंडे टूट जाएंगे...सो तुम अपनी खैर चाहने के लिए खुद फैसला कर सकते हो..."

वो रोता रहा पर बोल कुछ नहीं पाया... तभी वो पुलिसवाला पूछा,"एस.पी. साहब हैं ये... जिनकी बिटिया का किडनैप हो गया है..." उसके इतना कहने से ही वो आदमी सारा माजरा समझ गया और बियर बार में कही बात याद आने लगी... वो अब चाह कर भी मुकर नहीं सकता था...

वो पुलिस वाले की बात बीच में काटते ही सारी कहानी पट पट उगल दी कि कैसे उसके मामा ने उसे फोन पर बताया,फिर वो कालिया और पुष्पा को गाड़ी से छोड़ने गया था नदी किनारे तक... फिर रत्ना बोट से उसे रिसीव कर ले गया.. उसके बाद वो कुछ नहीं जानता..

उसकी बात खत्म होते ही एस.पी. आँख तरेरता उठा और डंडे से मारने दौड़ा कि वो जोर से चिल्लाते हुए मां बाप और ना जाने कितनों की कसम खाने लगा और रोते हुए कह रहा था कि साब मैं सच कह रहा हूँ...एस.पी. को अगर उसके साथी बीच में ना पकड़ते तो वो सच में उसे तोड़ देते...

फिर सभी ने एस.पी. साब को शांत कर बाहर ले आए और उसे यूं ही टंगा छोड़ दिया...बाहर निकल एस.पी. ने तुरंत हेडक्वाटर फोन मिलाया और सारी बात कह स्पेशल फोर्स की मांग कर दी...

ऊपर वाले ऑफिसर भी मामले को गंभीरता से ले हामी भर दी और सुबह तक स्पेशल फोर्स की टीम पहुँचने की बात कही... एस.पी. अब जल्द से जल्द सुबह होने का इंतजार कर रहा था...उसे बेचैनी से नींद कोसो दूर भाग रही थी... उसने वहीं कुर्सी पर बैठ सुबह होने का इंतजार करने लगा...

सुबह की पहली किरण निकलने से पहले ही स्पेशल टीम आ पहुँची थी...एस.पी. और उसके साथी तैयार तो थे ही... उसके आते ही सब बिना समय गंवाए चल पड़े... रास्ते में ही पूरी प्लानिंग हो गई कि कैसे मिशन को कम्प्लीट करना है...

धूप निकलने तक सब नदी किनारे तक आ गए जहाँ बोट उनका इंतजार कर रही थी... बोट में सभी सैनिक सवार हो चल पड़े... सब जल्द से जल्द पहुँचना ताहते थे...सुबह होने और इतनी जल्दी पूरी तैयारी होने से किसी को भनक लगने की भी उम्मीद नहीं थी... कोई रत्ना का खुफिया भी होता तो वो शाम से सुबह के बीच क्या सब हुआ, कुछ नहीं पता होगा...

बोट में ही एस.पी. ने सभी जवानों को अपनी बेटी की तस्वीर दिखा दी... काफी देर नदी में सफर करने के बाद सब मंजिल तक पहुँच गए... बोट से उतर सबने अपने हथियार संभाल आगे बढ़ने लगे... सबके सब चौकन्ने थे... और जंगलों की ओर जाने वाली गाड़ी के पहिए के निशान की ओर बढ़े जा रहे थे...

रास्ते तो थे नहीं...उन तक पहुँचने का उन्हें बस यही निशान मिला था जो कि इन सब के लिए काफी था... कुछ दूर चलने के बाद इन्हें एक तरफ से कुछ आवाज आई... सब जड़वत रूक गए... एक टुकड़ी तुरंत हट आवाज की ओर बढ़ गई... झाड़ी के पीछे दो लोग बैठ अपनी बंदूक का मुआयना कर रहे थे...

शायद सुबह की वजह से वे अभी आए ही थे और अपनी पोजीशन के लिए तैयार हो रहे थे... अचानक उन पर जवानों ने चाकू निकाल तेज वार कर दिया; दोनों ढ़ेर...बाहर निकल इशारे से सबको बात कह दी... सब तुरंत ही कई टुकड़ियों में बंट गए और फूंक फूंक कर आगे बढ़ने लगे...

ऐसे ही झाड़ी के पीछे तो कोई पेड़ पर,तो कोई गड्ढे में वगैरह जगहों पर मिलते रहे और सबको जवानों ने कोई मौका दिए मौत के घाट उतारते गए...अभी तक जवानों ने बंदूक का इस्तेमाल नहीं किए थे...

सारे जवान ऐसे बढ़ रहे थे कि रत्ना के ठिकाने तक पहुँचते पहुँचते सब के सब उस घर के चारों तरफ हो गए... पर किसी को घर दिखाई दे नहीं रहा था... सब अपने अगल बगल देखे तो सब जवान ही नजर आए... मतलब रत्ना के आदमी उसके ठिकाने के चारों ओर से घिरे थे...

तभी जवान के कैप्टन ने अपना दिमाग दौड़ा दिया और पलक झपकते ही वो सब समझ गया... फिर बगल के जवानों को इशारों से कह दिया कि सबको कह दो, झाड़ी के अंदर जाना है... ठिकाना यही है...
सभी जवान अपने बिल्ली के पंजों के माफिक कदम बढ़ाने लगे... जब कुछ ही फीट की दूरी रह गई थी एक जवान और एक डाकू की नजरें आपस में टकरा गई... नतीजन घांय... और फिर चली पड़ी अंधाधुंध फायरिंग...

चारों तरफ से घिर चुकी रत्ना के साथी भागने की तो सोच नहीं सकते थे... लड़ना ही एक विकल्प बच गई थी उनके लिए...इन तड़ातड़ की आवाज से रत्ना की नींद खुली तो उसके माथे पर परेशानी की लकीर साफ नजर आने लगी...

वो तेजी से रूम से बाहर देखने भागा...सामने की तरफ देखा तो उसके कुछ आदमी बाहर की तरफ ओर बढ़ते हुए फायरिंग कर रहे थे तो कुछ डर से फायरिंग करते अंदर की ओर भी आ रहे थे...

कुछ पल में अंदर आने वालों की संख्या बढ़ने लगी... मतलब बाहर वाला भारी पड़ने लगा... तभी रत्ना के एक आदमी रत्ना को कहते हुए भागता है कि भाई, पुलिस हमला कर दिया है...

अब तो रत्ना को सांप सूंघ गया... उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था... उसके दिमाग में सभी की तस्वीरे स्लाइडशो की तरह चलने लगी कि आखिर किसने खबर दी पुलिस को...एक बार तो उसके दिमाग में कालिया व एस.पी. की बेटी भी आ गई... पर वो दिमाग से इस बात को हटा बचने की सोच नीचे की तरफ दौड़ पड़ा...

अभी वो भागकर आधी सीढ़ी ही उतर पाया था कि तभी उसके पांक के ठीक पास धांय की आवाज हुई... वो डरते हुए सामने देखा तो एक जवान उसकी तरफ फायरिंग के लिए निशाने लगा रहा था...

वो अगली फायरिंग के लिए स्ट्रिगर दबाता कि उससे पहले ही जवान जमीन पर लुढ़क गया... रत्ना की नजर होने वाले फायरिंग की तरफ गया तब तक उसका वो आदमी भी नीचे तड़प रहा था...रत्ना अब नीचे उतरने की सोच भी नहीं सकता था क्योंकि सभी जवान अंदर घुसे जा रहे थे...

वो वापस छुपने के लिए भागा और इस दौरान कई फायरिंग उस पर भी हुई पर वो बचता हुआ अपने रूम में घुस लॉक हो गया...कुछ ही पलों में फायरिंग कम हो गई पर बीच बीच में होती तो बस आहें ही निकलती...

रत्ना की आँखों के सामने मौत अपना नाच शुरू कर चुका था... वो किसी पत्ते की तरह टूटता हुआ दीवाल के सहारे नीचे बैठ रोने लग गया... पल भर में सब तबाह हो गई थी... वो इसका जिम्मेदार बस एस.पी. की बेटी को ठहरा ढ़ेर सारी गालियाँ निकालें जा रहा था...

करीब दस मिनट बाद जाकर वहाँ फायरिंग बंद हुई... रत्ना के अब पसीने निकलने शुरू हो गए थे... उसे लगने लगा था कि शायद सब मारे गए...और ये सच भी थी... सब खत्म.. एक दो डर के मारे सरेंडर करने की सोची तो एस.पी. किसी पागल कुत्ते की तरह उसे अपने निकट ला लाकर उसके मुँह में गन घुसेड़ कर खत्म कर रहा था....

सब के सब निर्दय और हैवान बन चुके थे... आखिर करीब दस सालों से परेशान पुलिस अपना गुस्सा निकाल रही थी... पुलिस के साथ साथ ना जाने कितने निर्दोष व्यक्ति को ये सब अपना शिकार बनाए थे... जब सब जवानों को लगा कि सब खत्म हो गए तो सबने अपनी पोजीशन ले ली अंदर ही...

क्योंकि कैप्टन ने एक को रूम में घुसते देखा था और वो अनुमान कर लिया था कि रत्ना यही है... वो एस.पी. और जवान की एक टुकड़ी को ले ऊपर बढ़ गया... और रूम में चेक किया तो कोई नहीं मिला... मतलब सब वफादार थे रत्ना के... अब बस ओक ही रूम बचा था...

जवान गेट के इर्द-गिर्द पोजीशन लिए और तब कैप्टन ने कुछ सोच रत्ना को सरेंडर करने की आवाज दी... अभी तक किसी ने पुष्पा को नहीं देखा था तो पुष्पा कहाँ है ये भी जानना जरूरी था... आवाज सुन रत्ना क्या जवाब दे कुछ सोच नहीं पा रहा था...

एस.पी. आगे बढ़ गेट तोड़कर अंदर जाने की सोचा पर कैप्टन उसे रोक लिए... पुनः कैप्टन ने दिलासा देते हुए बोला कि अगर वो सरेंडर कर दे तो उसे कुछ नहीं होगा... बस पुष्पा कहां है बता दो...फिर कानूनी तरीके से तुम्हें जेल जरूर जानी होगी पर वादा करता हूँ कि सजा कम से कम दिलवाऊंगा...

जान पर जब बात आती है तो आदमी किसी भी बात पर विश्वास जल्द कर लेता है.... रत्ना के साथ भी यही हुआ और वो कांपते हाथ से गेट खोल वहीं जमीन पर बैठ गया... गेट खुलते ही दो जवान फुर्ती से आगे हुए और गेट को चौकन्ने हो खोलने लगे...

सामने कुछ नजर नहीं आया तो बगल की तरफ गन घुमाकर घुसा तो एक तरफ रत्ना पसीने से नहाया रोनी सूरत में पड़ा था... उसने तुरंत उसके सर पर गन तान कर खड़ा हो गया...इतने में एस.पी., कैप्टन सब धड़धड़ाता अंदर आ घुसा...

अंदर घुसते ही कैप्टन उससे पूछा,"पुष्पा कहाँ है..?" रत्ना बिना कुछ बोले ना में सर हिला दिया... ये देख एस.पी. का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया... उसने वहीं रत्ना के सर पर जूते की एक जोरदार किक दे मारी... रत्ना चीखता हुआ लुढ़क गया...

उसके सर पर चोट जोर की लगी थी...उसने सर पर हाथ रख बोला,"सच कह रहा हूँ मुझे नहीं पता कि वो कहाँ है... " उसकी बात सुन तमतमा कर एस.पी. पुनः गरजा,"वो कुत्ते का पिल्ला तो मेरी बेटी को तेरे ही अड्डे पर लाया था ना..." एस.पी. के बोलते ही रत्ना हाँ में सर हिलाते बोला...

"हाँ पर वो कल ही यहाँ से निकल गए...अब कहाँ गए कुछ मालूम नहीं... "रत्ना की बात खत्म होते ही कैप्टन बोला,"देख सीधे बता दे कि वो कहाँ है वरना मुझे मजबूर मत करो... मैं अपनी बात से नहीं मुकरा हूँ तुम खुद आफत मोल ले रहे हो..."

रत्ना अब गिड़गिड़ाने लगा,"सच कह रहा हूँ साब... कहाँ गए मुझे नहीं पता है... पर एक बात है कि आपकी बिटिया खुद गई है... दोनों प्यार करने लगे हैं... " उसकी बात सुनते ही सबके चेहरे पर आश्चर्य से हवाइयाँ उड़ने लगी..

"साब, मेरा पता किसने बताया..."रत्ना उठ के बैठते हुए बोला... रत्ना को थोड़ा महसूस हुआ कि ये बात इन्हें सच लगी... हालांकि पुलिस वाले अपराधी की किसी बात का यकीं जल्द नहीं करते...

एस.पी. उसकी बात का जवाब उसके सामने बैठ दिया," पता देने वाला कौन है ये जान के अब क्या करेगा... वैसे मेरी बेटी अभी तक नहीं मिली तो वो बता नहीं सकती... तो जाहिर है कोई तेरा ही अपना है... पर हाँ, वो तुम्हारा वफादार नहीं है इन सबकी तरह... बेचारा ये सब काला काम नहीं करता है... फिर भी तुम्हें उस पर गुस्सा तो जरूर आ रहा होगा... और बात कुछ ऐसा है कि मैं उसे मरते नहीं देखना चाहूँगा... मुझे विश्वास है कि उसे समझा दूँगा तो वो गलत काम के लिए साथ देना छोड़ देगा..."

एस.पी. अपने गन की स्ट्रिगर पर उंगली दबाते हुए बोला,"अब तेरा काम खत्म है और तुझे अंदर डाल मैं बोझ नहीं बढ़ाना चाहता देश पर... तेरे जैसे को मर जाना ही बेहतर होगा लाखों लोगों के लिए..." उसकी बात का जवाब देने हैरानी से रत्ना मुँह खोला ही था कि उसका मुँह खुला का खुला रह गया...

गन की गोली रत्ना के माथे के बीच में घुस गई...रत्ना लहूलुहान वहीं लुढ़क गया... कैप्टन तुरंत सभी जवानों को इतल्ला कर आगे कानूनी कार्रवाई में एस.पी. के साथ जुट गया...
कालिया अब सोच लिया था कि आगे से कोई ऐसी वैसी काम नहीं करूँगा... जो भी करूँगा पूरी लगन और इमानदारी से करूँगा... पुष्पा जब उस पर पूरी विश्वास कर ली है तो उसे कभी ठेस नहीं पहुँचाऊंगा... मेहनत से दो रूपए कम भी कमाया तो कभी नाराज नहीं होगी... उससे शादी कर एक जिम्मेदार पति बनूंगा,फिर पापा....

काम पर पहुँचते ही कालिया ने वहीं एक साथी से सुना कि रत्ना का एनकाउंटर हो गया... उसके पैरों तले जमीं खिसक गई... वो एक पल तो सहमा सा रह गया कि ये क्या हो गया... फिर वो एनकाउंटर की दास्तां जाना तो उस पर तो पहाड़ गिर गया...

शाला ये ससुर तो तीस मार खां निकला... नहा धो के ही पीछे पड़ गया... अब सीधा मतलब था कि उसका अगला टारगेट मैं हूँ... वो लंच टाइम में ही तबीयत खराब का बहाना बना घर चल दिया... हालांकि कालिया की तस्वीरें भी न्यूज में थी पर कालिया की खुशकिस्मत थी कि तस्वीर काफी पहले की थी तो कोई पहचान नहीं पाया था...

अब वो बन ठन के साफ सुथरा रहता था... पहले तो वो नहाता भी था तो नलका भी आश्चर्य में पड़ के रूक रूक पानी देता था कि बेटा ,सच में नहाने आए हो कि बस मुँह हाथ धोने थे....

घर पहुँचते ही पहले तो पुष्पा को एक जबरदस्त किस दिया... फिर सारी बात एक ही साँस में कह डाला... पुष्पा तो अपने पापा को अच्छी तरह जानती ही थी तो उसे ज्यादा अचरज नहीं हुई... वो तो ये सोचने लग गई कि अब कालिया को कैसे बचाया जाए...

दोनों बस गुमशुम हो सोचते सोचते शाम कर दी, फिर रात... जब रूम मालकिन इनके रूम में ये देखने आई कि आज दोनों इतने चुप चुप क्यों हैं तब जाकर इन्हें आभास हुआ कि रात हो गई...पुष्पा उन्हें बहाने बना दी कि बस घर की याद आ रही है और इनकी तबीयत खराब है...

तभी रूम मालकिन ने पुष्पा की तरफ न्यूज पेपर दिखाते हुए बोली,"नाटक मत करो,तुम दोनों इसलिए परेशान हो ना..."पुष्पा जब न्यूज पेपर पर नजर डाली तो अनायास ही उसकी आँखें डबडबा गई... पुष्पा को रोती देख वो उसे गले से लगाती बोली...

"अरे, इसमें रोने वाली क्या बात है... हर समस्या का निदान होता है तो ये कौन सी बड़ी बात है... मैं भी इस दौर से गुजरी हूँ तो जानती हूँ कि क्या बीत रही होगी तुम पर..." उसने पुष्पा की आँखों से आँसू पोंछती जा रही थी...

कुछ देर बाद जब पुष्पा नॉर्मल हुई तो सारी बात सच सच कह डाली... रूम मालकिन तो सुन के आश्चर्य में पड़ गई थी कि यार ये रिअल है कि किसी मूवी की स्टोरी... वो बिना कोई आहट किए बस सुने जा रही थी...पुष्पा की बात खत्म हुई तो गेट की तरफ से आवाज आई...

"हाँ तो सिम्पल सी बात है अब... तुम दोनों कोर्ट में शादी कर लो... फिर आपके पापा क्या, दुनिया का कोई भी तुम्हें कुछ नहीं बिगाड़ सकता... और अगर आपके पापा अपनी बेटी से प्यार करते हैं तो वे थोड़े गुस्से के बाद जरूर मान जाएंगे..."रूम मालिक अंदर आते हुए बोले जो अब तक गेट पर ही खड़े सारी बात सुन रहे थे...

उनके जवाब में उनकी मोहतर्मा भी हाँ में हाँ मिला दी...

"वैसे मैडम दी, आपकी लव स्टोरी बड़ी जबरदस्त है... मन तो कर रहा कि पकड़ के..के..."वो मुस्कुराते हुए शरारत से बोलते हुए अपनी बात बीत में रोक दिए... पर पुष्पा आगे की बात समझ शर्मा के मुस्कुरा दी... उनकी बात से उनकी पत्नी गुस्से से उनकी तरफ देखी वो कोई फिल्मी धुन गाते पतली गली सरक लिए...

फिर वो हंसती हुई बोली,"ये काफी मजाकिया हैं तो बुरा मत मानना...चलो खाना खा लो और आराम करना... मुझे पता था ये सब तो मैं तुम दोनों का भी खाना बनाई हूँ...चलो.."

पुष्पा और कालिया कुछ बोल नहीं पा रहे थे... इनके इस अपनेपन ने दोनों को अंदर तक हिला कर रख दी थी... दोनों बिना कोई सवाल किए गए और खाना खा सोने आ गए... पुष्पा खाना खाते ही सोच ली थी कि अब यही एक उपाय है तो ज्यागा सोचना नबीं है...

कोर्ट मैरिज कर लेंगे... फिर पापा को किसी तरह मनाने की कोशिश करेंगे... थोड़े नखरे जरूर करेंगे पर पुलिसिये आदत के अनुसार कुछ शर्ते रख देंगे... वैसे पापा उतनी मुश्किल भी शर्ते नहीं रखते कि ना मान सकूँ... पर कालिया की समझ में अब भी कुछ नहीं आ रहा था... उसके दिमाग में अभी भी रत्ना की विभिन्न शक्ल लहूलुहान नजर आ रही थी...

पुष्पा कालिया के चेहरे पर डर साफ देख रही थी... खाना खाते वक्त तो कुछ नहीं बोली... बस उसे देख रही थी... रूम मालकिन अब अपनी कहानी शुरू कर दी थी... खाना खत्म होते ही कालिया अपने रूम में चला गया और लेट गया... पीछे पुष्पा भी गुड नाइट बोल आई और कालिया को सोते देख मुस्कुरा पड़ी...

पुष्पा कालिया के बगल में लेट गई और कालिया के शरीर पर चढ़ती हुई कालिया के होंठो को चूसने लग गई... कुछ देर तक चूसने के बाद भी कालिया कोई हरकत नहीं किया तो पुष्पा किस तोड़ती हुई बोली,"इतना क्यों सोचते हो.."

कालिया पुष्पा की बात सुन उसकी आँखों में लाचार की तरह देखने लगा...पुष्पा हालात को समझ तुरंत ही बोल पड़ी,"हे, ज्यादा सोचना नहीं है... मैं वादा करती हूँ जब तक मेरी साँस रही, तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगी... मैं पापा को मनाने की कोशिश करूँगी...ओके.."

कालिया की आँखें नम हो गई थी... ये नमी डर से थी या पुष्पा के प्यार की, मालूम नहीं... वो आँखें मलते हुए पुष्पा को बाँहों में भींच लिया...पुष्पा भी लता की तरह कालिया से लिपट गई...

कुछ पल लिपटी रहने के बाद पुष्पा कालिया के कान में फुसफुसाहट से बोली,"हे...मन कर रहा है.." कालिया के कानों में पुष्पा की बात पड़ते ही वो अंदर ही अंदर मुस्कुरा दिया... वो फिर भी पता नहीं क्या सोचा वो बात को बहलाते हुए बोला,"क्या मन कर रहा है..."

पुष्पा उसकी बात सुनते ही तुरंत समझ गई कि ये अब शायद नॉर्मल हो जाएंगे तो वो बात को आगे बढ़ाती हुई बोली,"कुछ कुछ करने का..."

कालिया,"कुछ-कुछ...ये क्या होता है.."
पुष्पा,"कुछ कुछ... कुछ कुछ होता है..."
कालिया उसकी बात सुन मुस्कुराते हुए कुछ पल चुप रहा और फिर बोला,"मुझे नहीं मालूम कुछ-कुछ..."

पुष्पा भी मुस्कुराती हुई बोली,"बता दूँ.." कालिया भला क्यों मना करता...वो हामी भर दिया... इशारा मिलते ही पुष्पा अपने हाथ नीचे ले जाकर कालिया के अकड़े लंड को पकड़ती हुई बोली,"ये चाहिए..."

कालिया तो कपड़ो के ऊपर से छूने पर भी हवा में उड़ने लगा... वो अंदर ही अंदर तड़प सा गया... कुछ बोलने के लायक नहीं बचा... वो अगले ही पल पुष्पा को कस के पकड़ नीचे कर दिया और खुद पुष्पा के ऊपर आ उसे बेतहाशा चूमने लगा...

चंद मिनटों में उसने पुष्पा के तन पर हजारों किस की बौछार कर दी... पुष्पा मूड में तो थी ही, वो भी जल्द ही कामुक हो कालिया को भी प्यार देने लगी...
किस की बरसात जब थमी तो कालिया पटापट पुष्पा के कपड़े खोलने लगा और पलक झपकते ही वो नंगी शरमाई बेड पर आँख बंद की मुस्कुराती हुई लेटु पड़ी थी... कालिया भी नंगा हो गया...

फिर वापस लेट पुष्पा के होंठो को चूमते हुए उसकी चुचियाँ मिसने लगा...पुष्पा कठोर हाथ से कराह पड़ी... उसके मुख से कामुक स्वर कमरे में गुंज रही थी... कालिया उसके होंठों को छोड़ अब नीचे बढ़ने लगा... और उसने मंजिल तक पहुँचने में देर नहीं लगाई...
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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